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कामगार अब भी असुरक्षित : व्यावसायिक स्वास्थ्य को लेकर देशव्यापी अभियान तेज

“सभी के लिए स्वास्थ्य – सभी नीतियों में स्वास्थ्य” और “सभी के लिए साथ मिलकर” का उद्दघोष

7 अप्रैल। विश्व स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर जन स्वास्थ्य अभियान भारत (JSAI ) द्वारा 1 से 7 अप्रैल 2026 तक देशव्यापी व्यावसायिक एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य पर एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अभियान आयोजित किया गया। इस अभियान के अंतर्गत देशभर में जागरूकता कार्यक्रम, बैठकें और जन-संवाद आयोजित किए गए, जिनमें बड़ी संख्या में नागरिकों, कामगारों और संगठनों ने भाग लिया साथ ही उक्त मुद्दों पर एक व्यापक हस्ताक्षर अभियान 26 राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों  चलाया गया, जिसमें अभी कुल 1751 लोगों ने भाग लिया। इस व्यापक राष्ट्रीय अभियान में संकलित हुए हस्‍ताक्षरित मांगें राष्ट्रपति महोदया और प्रधानमंत्री जी को JSAI द्वारा पत्र  के माध्‍यम से भेजी जाएगी।

प्रो. ऋतु प्रिया ने अभियान की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हुए बताया कि इस पहल का उद्देश्य कामगारों और समुदायों के स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाना और उन्हें नीति-निर्माण के केंद्र में लाना है।

जगदीश पटेल ने कहा कि भारत में ईएसआई अधिनियम और वर्कर्स कम्पनसेशन एक्ट होने के बावजूद केवल लगभग 3 करोड़ कामगार ही ESI के दायरे में आते हैं, जो बहुत कम है। उन्होंने बताया कि श्रम कानूनों को चार कोड में बदलने के बाद भी बड़ी संख्या में कामगार सामाजिक सुरक्षा से वंचित हैं।

उन्होंने कहा कि इस अभियान का उद्देश्य व्यावसायिक खतरों से प्रभावित कामगारों की पहचान करना, उनके अनुभवों को सुनना और उनके स्वास्थ्य की स्थिति का दस्तावेज़ीकरण करना है। उन्होंने यह भी बताया कि भारत में पहली बार इतने बड़े स्तर पर व्यावसायिक एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय अभियान चलाया गया है।

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उन्होंने वैश्विक स्तर पर व्यावसायिक कारणों से होने वाली मौतों के पुराने अनुमान (लगभग 48 हजार प्रति वर्ष) का उल्लेख करते हुए कहा कि अद्यतन और विश्वसनीय डेटा की आवश्यकता है। उन्होंने कामगारों के साथ दो-तरफा संवाद पर जोर दिया, ताकि उनके काम और स्वास्थ्य के बीच संबंध को समझा जा सके।

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) (स्थापना 1919) और उसके कन्वेंशन 155 (1981) का उल्लेख करते हुए कहा कि यह व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कन्वेंशन है, जिसे भारत सरकार को जल्द से जल्द अनुमोदित (ratify) करना चाहिए। इससे कामगारों की सुरक्षा और देश की आर्थिक प्रगति दोनों को मजबूती मिलेगी।

उन्होंने यह भी कहा कि आज भी कई कामगार किसी भी स्वास्थ्य सुरक्षा व्यवस्था के दायरे में नहीं आते। उन्होंने सरकारी अस्पतालों में व्यावसायिक स्वास्थ्य केंद्र (Occupational Health Centres) स्थापित करने की मांग की और सभी से इस दिशा में मिलकर काम करने का आह्वान किया।

कैलाश मीणा ने JSAI को इस पहल के लिए बधाई देते हुए कहा कि स्वच्छ हवा और सुरक्षित पेयजल आज सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। उन्होंने कहा कि विकास की किसी भी योजना में स्थानीय संसाधनों, विशेषकर पानी और पर्यावरण का संरक्षण सुनिश्चित करना आवश्यक है।

उन्होंने जयपुर का उदाहरण देते हुए बताया कि शहर की बढ़ती आबादी के कारण अब 180 किमी दूर स्थित बिसलपुर बांध से पानी लाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अरावली से निकलने वाली कई नदियां—जैसे शाह जोजरी और कसामती—अब समाप्त हो चुकी हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि लगभग 700 किमी लंबी अरावली पर्वतमाला का 25% से अधिक हिस्सा नष्ट हो चुका है।

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मेधा पाटकर ने कहा कि “हर दिन स्वास्थ्य दिवस है” और स्वास्थ्य, पर्यावरण और आजीविका के गहरे संबंध पर जोर दिया। उन्होंने वनों की कटाई, घटती कृषि उत्पादकता और खाद्य असुरक्षा पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने जल, जंगल और जमीन की रक्षा को जीवन का आधार बताते हुए उनके संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।

सुश्री पाटकर ने कहा कि सीवेज और खनन के कारण जल प्रदूषण बढ़ रहा है, जो सीधे लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। उन्होंने श्रम कानूनों के कमजोर होने और निर्माण श्रमिकों सहित कई कामगारों के अधिकारों के क्षरण पर चिंता जताई।

सुश्री पाटकर ने कहा कि कामगारों के लिए उपलब्ध वित्तीय संसाधनों का पर्याप्त उपयोग नहीं हो रहा है। उन्होंने स्वास्थ्य पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को रेखांकित करते हुए वैकल्पिक, न्यायपूर्ण और टिकाऊ विकास मॉडल अपनाने की आवश्यकता बताई।

उन्होंने कहा कि पहले के श्रम कानून लंबे संघर्षों का परिणाम थे, लेकिन अब उन्हें चार कोड में बदलकर कमजोर किया गया है। उन्होंने बढ़ती असमानताओं, खराब कार्य परिस्थितियों और अधिकारों के हनन के खिलाफ जमीनी स्तर पर संघर्ष को मजबूत करने की आवश्यकता बताई।

सुश्री पाटकर ने चर्चा के दौरान सभी कामगारों के लिए ESI सेवाओं के विस्तार, खाद्य सुरक्षा कानून की सीमाओं की समीक्षा, न्यायालय के आदेशों के अनुपालन और त्रिपक्षीय समझौतों के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया।

सभी वक्ताओं ने मिलकर कहा कि व्यावसायिक और पर्यावरणीय स्वास्थ्य सभी नीतियों का केंद्रीय मुद्दा होना चाहिए और इसे “वन हेल्थ” दृष्टिकोण के तहत देखा जाना चाहिए, जिसमें मानव, पशु और पर्यावरण के स्वास्थ्य को एक साथ जोड़ा जाता है।

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अभियान का समापन सामूहिक आह्वान के साथ हुआ“सभी के लिए स्वास्थ्य – सभी नीतियों में स्वास्थ्य” और “सभी के लिए साथ मिलकर।”

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