बेहतर स्वास्थ्य के बिना कठिन है जीवन में आनंद

लेखक की फोटो

विश्व स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि क्या केवल रोगों की अनुपस्थिति ही स्वास्थ्य है, या शारीरिक, मानसिक और सामाजिक संतुलन ही वास्तविक सुख का आधार है। बढ़ती जनस्वास्थ्य चुनौतियों के बीच स्पष्ट है कि बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था, संतुलित जीवनशैली और सामाजिक जिम्मेदारी के बिना सच्ची खुशी संभव नहीं।


World Health Day April 7th

परशुराम तिवारी

जीवन के लिए अच्छा स्वास्थ्य और खुशी (आनंद), दोनों ही मूलभूत आवश्यकताएँ हैं। प्राचीन भारतीय ग्रंथ अष्टांग हृदयम् के अनुसार निरोगी जीवन हमारी दिनचर्या, आहार तथा त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के संतुलन पर निर्भर करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भी स्वास्थ्य केवल बीमारी या दुर्बलता की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्ण स्वस्थ होने की अवस्था है। संक्षेप में, यह वह स्थिति है जहाँ शरीर, मन और आत्मा में संतुलन और सामंजस्य स्थापित हो। यदि यह संतुलन बना रहे, तभी मनुष्य वास्तविक सुख का अनुभव कर सकता है।
सरल शब्दों में, स्वास्थ्य केवल रोगों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की पूर्ण अवस्था है।

स्वतंत्रता के दशकों बाद भी हम अनेक जनस्वास्थ्य चुनौतियों से घिरे हुए हैं। सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ और अधिक जटिल हो गई हैं।

रासायनिक उर्वरकों से उत्पादित खाद्यान्न, प्रसंस्कृत एवं डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों का बढ़ता उपयोग, और सूचना क्रांति के माध्यम से प्राप्त भ्रमित एवं अपूर्ण जानकारी—ये सभी हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) का अनियंत्रित उपयोग भी कहीं न कहीं हमारी मौलिक सोच और जीवनशैली को प्रभावित कर रहा है।

See also  "सबके लिए स्वास्थ्य, सभी नीतियों में स्वास्थ्य" की मांग के साथ जन स्वास्थ्य अभियान-इंडिया की कार्यशाला सम्‍पन्‍न

विचारणीय प्रश्न यह है कि—क्या हम गरीबी, टीबी, डेंगू, मलेरिया, दस्त, मधुमेह, हृदय रोग, कैंसर, उच्च रक्तचाप और साइलेंट हार्ट अटैक जैसी गंभीर समस्याओं से प्रभावी रूप से निपटे बिना “विश्व गुरु” बनने का दावा कर सकते हैं? जब सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था कमजोर हो, निजी अस्पतालों का खर्च आम नागरिक की पहुंच से बाहर हो, और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता निरंतर गिर रही हो—तब क्या समाज का बड़ा वर्ग वास्तविक खुशी या आनंद का अनुभव कर सकता है?

खुशी या आनंद क्या है?

रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने आनंद का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है-“परहित सरिस धरम नहि भाई, पर पीड़ा सम नहि अधमाई॥” अर्थात, दूसरों का कल्याण करना सबसे बड़ा धर्म है और दूसरों को कष्ट देना सबसे बड़ा अधर्म। व्यावहारिक जीवन में भी यह देखा गया है कि सच्ची खुशी त्याग, सेवा और परोपकार से प्राप्त होती है। जब हम दूसरों के जीवन में आनंद लाते हैं, तभी हमें वास्तविक संतोष और खुशी का अनुभव होता है।

इस प्रकार खुशी केवल क्षणिक सुख नहीं, बल्कि जीवन के प्रति संतोष, अर्थपूर्णता और मानसिक संतुलन का अनुभव है। स्वास्थ्य और खुशी के बीच गहरा संबंध है। अच्छा स्वास्थ्य खुशी को बढ़ाता है और खुशी बेहतर स्वास्थ्य को सुदृढ़ करती है। इस प्रकार बेहतर स्वास्थ्य के बिना जीवन में आनंद की राह कठिन हो जाती है।

समाज में आनंद हेतु प्रयास

समाज में आनंद के स्तर को समझने और बढ़ाने के लिए अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। मध्यप्रदेश देश का एकलौता राज्य है जहाँ विगत 10 वर्षों से राज्य आनंद संस्थान इस हेतु सक्रिय है। संस्थान का मानना है कि- “नागरिकों की खुशहाली और परिपूर्ण जीवन के लिए आंतरिक एवं बाह्य संतुलन आवश्यक है। केवल भौतिक प्रगति से स्थायी प्रसन्नता संभव नहीं है। राज्य का समग्र विकास नागरिकों की मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक उन्नति तथा प्रसन्नता पर निर्भर करता है।”

See also  'जनता संसद' में स्वास्थ्य सेवा का अधिकार की मांग उठी, स्वास्थ्य प्रस्ताव पारित

इस उद्देश्य से संस्थान ने अब तक हजारों आनंदक (वालंटियर) और प्रशिक्षकों को तैयार किया है तथा इस हेतु समय-समय पर विविध गतिविधियाँ भी आयोजित की जाती रही हैं। तथापि, इन प्रयासों के ठोस परिणामों और प्रभावों का समग्र आकलन अभी अपेक्षित है।

मैदानी हकीकत क्या है?

भारत में खुशहाली के ठोस संकेतक अभी भी स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि, हाल ही में जारी वैश्विक हैप्पीनेस इंडेक्स के अनुसार 147 देशों में भारत का स्थान 116वाँ है। जबकि फिनलैंड प्रथम स्थान पर है। वहीं अमेरिका 23 वें, इंग्लैंड 29 वें, चीन 65वें और पाकिस्तान 104 वें स्थान पर हैं। भारत में खुशहाली के निम्न स्तर के पीछे कई कारण हैं, जिनमें प्रति व्यक्ति आय का कम होना, स्वस्थ जीवन प्रत्याशा में कमी, भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति, सामाजिक उदारता में कमी एवं लोगों में बढ़ता एकाकीपन प्रमुख हैं।

आगे की राह

यदि देश में खुशहाली के स्तर को सुधारना है, तो सबसे पहले सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के बजट को लगभग 2% बढाकर दोगुना करना एवं सेवाओं की गुणवत्ता में ठोस सुधार लाना होगा। साथ ही मानव विकास से जुड़े सभी विभागों—जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला एवं बाल विकास, कृषि, पंचायत एवं ग्रामीण विकास तथा आनंद संस्थान आदि के कार्यों की प्रभावी निगरानी एवं मूल्यांकन में नागरिक समाज की सक्रिय भूमिका सुनिश्चित करनी होगी।
एक कल्याणकारी राज्य के लिए यह भी आवश्यक है कि वह नियमित रूप से मानव विकास प्रतिवेदन (Human Development Report) जारी करे, जिससे विकास और आनंद के बीच के संबंध को समझा जा सके और उसी के अनुरूप नीतियों का निर्माण किया जा सके।
लेखक स्वैच्छिक जन स्वास्थ्य अभियान से जुड़े हैं एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के पूर्व सलाहकार हैं।

WhatsApp हमारे WhatsApp Channel को Join करें
See also  कोरोना से बच्चों को बचाने की कोशिशें

Table of Contents

नीले धुएँ की धरती : ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’

समाज और सरकार चाहे तो पर्यावरण को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण अमरीका के टेनेसी और नार्थ कैरोलीना राज्यों की सीमाओं से लगा ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’ है। करीब सौ साल पहले कानून बनाकर प्रकृति को उसके

Read More »

पर्यावरण संरक्षण : केवल पौधारोपण नहीं, जीवनशैली में बदलाव भी जरूरी

विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधे लगाने का संदेश नहीं देता, बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदार जीवनशैली अपनाने का आह्वान करता है। जल संरक्षण, प्लास्टिक का कम उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण, जैविक खेती और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपभोग जैसे छोटे-छोटे प्रयास

Read More »

World Environment Day : पर्यावरण संरक्षण पर टिका है भविष्य

पर्यावरण संरक्षण और संतुलन का प्रश्न आज पूरी मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित

Read More »