दरगाह, पुष्कर और ‘सोनीजी की नसियां’ : एक यात्रा-वृत्तांत

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यात्राएं अपने रोजमर्रा के जीवन से बाहर निकलने के अलावा बहुत कुछ सिखाती हैं। अव्वल तो हम प्रवास की उन जगहों, इलाकों के बारे में गहराई से जान पाते हैं और दूसरे वहां के समाज की समझ भी बढ़ती है।


अशोक चौधरी

मुझे यायावरी बहुत पसंद है। आजकल जिसे ‘अकेले-यात्रा’ (सोलो ट्रैवलिंग) कहा जाता है, वह मेरे लिए खुद को समय देने का सबसे सहज तरीका है। कुछ समय के अंतराल में जब भीतर हलचल बढ़ने लगती है, तो मैं बिना किसी तामझाम के निकल पड़ता हूँ – किसी अनजान रास्ते पर। राजस्थान में ऐसे कई स्थान मैंने इसी तरह देखे हैं, जो अद्भुत थे, लेकिन अफ़सोस यह रहा कि उन्हें समय पर लिपिबद्ध नहीं कर पाया। इस बार अजमेर और पुष्कर की यात्रा पर आया।

उस समय जोधपुर से अजमेर के लिए रात की कोई सीधी ट्रेन नहीं थी। बारिश का मौसम था—दिन उमस से भरे और शामें राहत लेकर आती थीं। मैंने जोधपुर से मारवाड़ जंक्शन के लिए ट्रेन पकड़ी। लूणी जंक्शन और पाली कब आए, पता ही नहीं चला। लगभग डेढ़ घंटे बाद ट्रेन मारवाड़ जंक्शन पहुँची और मैं उतर गया। मारवाड़ जंक्शन एक पुराना, बड़ा और साफ़-सुथरा स्टेशन है। स्टेशन के आसपास न कोई होटल-गेस्ट हाउस, न ही रिटायरिंग रूम।

बैग में शशि थरूर की हिंदी में अनूदित किताब रखी थी, लेकिन पढ़ने का मन नहीं हुआ। रेल यात्राओं में मैंने एक बात हमेशा महसूस की है – हम चाहे पढ़ें या नहीं, बैग में एक किताब रखना ज़रूरी समझते हैं। शायद किताब का होना ही मन को सुकून दे देता है। आखिरकार अजमेर जाने वाली ट्रेन का समय हो गया। रात के करीब सवा तीन बजे होंगे। बारिश अब तेज़ हो चुकी थी। ट्रेन में अपनी बर्थ तक पहुँचते-पहुँचते आँखों में गहरी नींद उतर चुकी थी। अलार्म लगाया और सो गया – यह जानते हुए कि यही दो घंटे सबसे अच्छी नींद देंगे।

अलार्म की आवाज़ से नींद टूटी। अजमेर जंक्शन आने वाला था। ट्रेन रुकी, मैं उतरा और सीधे रिटायरिंग रूम की ओर बढ़ा, जिसे पहले से बुक कर रखा था। औपचारिकताएँ पूरी कर कमरे में पहुँचा और तुरंत सो गया। मन में विचार आया कि गर्मियों में सुबह चार बजे ‘ख्वाजा ग़रीब नवाज़’ की दरगाह खुल जाती है – क्यों न जल्दी चला जाए, लेकिन बारिश और छाते की अनुपस्थिति ने इस विचार को टाल दिया।

दो-तीन घंटे बाद उठा तो बारिश थम चुकी थी। स्टेशन से दरगाह की ओर जाने का रास्ता पानी से भरा हुआ था। सुबह-सुबह दुकानें अभी खुली नहीं थीं। लगभग एक किलोमीटर का यह रास्ता तय करते हुए कुछ होटल वाले कमरे के लिए पुकारते सुनाई दिए। दरगाह पहुँचा। क्लॉक रूम में बैग रखा और मुख्य दरवाज़े से भीतर गया। बड़ी-बड़ी देगें रखी थीं – किसी ने बताया, ये मुग़ल बादशाहों की भेंट हैं। भीतर गुलाब के फूलों की महक और इत्र की खुशबू वातावरण को भर रही थीं।

दुआ की और बाहर आ गया। लोग अपने-अपने ढंग से दुआ में व्यस्त थे। सूफ़ी संतों ने इस देश को जो रास्ता दिखाया था, उसकी छाया आज भी यहाँ महसूस होती है। दरगाह से निकलकर मैं वापस अजमेर जंक्शन की ओर आया और वहाँ से केंद्रीय बस स्टैंड के लिए रिक्शा लिया। बस स्टैंड के बाहर एक छोटी-सी ‘थड़ी’ पर गरमागरम कढ़ी-कचौरी बन रही थी। भीड़ देखकर समझ आया कि स्वाद अच्छा होगा। नाश्ता किया, पास ही चाय पी और पुष्कर जाने वाली बस में बैठ गया।

बस आनासागर झील के पास से होकर आगे बढ़ी। सुबह की झील का दृश्य अलग ही होता है – मॉर्निंग वॉक करते लोग, पानी पर उतरते पक्षी। शहर पीछे छूटता गया और बस अरावली की घाटियों में चढ़ने लगी। सड़क घुमावदार थी। बारिश के मौसम में पूरी घाटी हरियाली से ढकी थी, हालांकि विलायती बबूल जैसे आक्रांता पौधे भी बड़ी संख्या में दिख रहे थे। करीब आधे घंटे बाद बस पुष्कर पहुँची।

पुष्कर – तीर्थराज। धीरे-धीरे टहलते हुए ब्रह्मा मंदिर पहुँचा। भीड़ कम थी, इसलिए दर्शन सहज रहे। गर्भगृह में जगत-पिता ब्रह्मा की मूर्ति – ऐसा प्रतीत हुआ मानो दो प्रतिमाएँ हों। बाहर लगे शिलालेख पढ़ने की कोशिश की, जिनमें मारवाड़ रियासत के किसी ठाकुर का उल्लेख था। कहा जाता है कि यह ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर है – शायद यही इसका सबसे बड़ा आकर्षण है।

परिक्रमा पथ पर सैकड़ों शिलालेख लगे हैं – कुछ पुराने, कुछ नए, देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालुओं की उपस्थिति का प्रमाण। मंदिर परिसर बड़ा नहीं, लेकिन इसकी ख्याति व्यापक है।

मंदिर से निकलकर बाज़ार की ओर चला। यहाँ अलग-अलग समाजों की धर्मशालाएँ और भवन दिखाई देते हैं। हर तीर्थ में यह दृश्य मुझे सोचने पर मजबूर करता है – आख़िर ये अलग-अलग समाज अपने भवन यहाँ क्यों बनवाते हैं? घूमते हुए मैं ब्रह्माघाट पहुँचा। सरोवर बारिश के कारण पानी से लबालब था। देसी-विदेशी सैलानी, अलग-अलग भाषाओं में होते संवाद – यह सब मिलकर पुष्कर के महत्व को और गहरा कर देते हैं।

कुछ देर बाद पुराने ‘रंगजी मंदिर’ की ओर बढ़ा। दक्षिण भारतीय स्थापत्य शैली का यह मंदिर अपेक्षाकृत शांत था। माना जाता है कि श्रीरंगजी और लक्ष्मीजी का विवाह पुष्कर में हुआ था। मंदिर परिसर में भारत भर के ‘रंगजी मंदिरों’ की जानकारी और चित्र लगे हैं। यहाँ कुछ देर ठहरकर मैं फिर बाज़ार की ओर लौटा।

यात्रा सिर्फ रास्तों पर चलने का नाम नहीं है, कभी-कभी ठहर जाना भी यात्रा का उतना ही ज़रूरी हिस्सा होता है। मैंने पहली बार महसूस किया कि पुष्कर मुझे कहीं जाने के लिए नहीं कह रहा था, बल्कि रुककर देखने और सुनने के लिए आमंत्रित कर रहा था। मैं फिर पुष्कर की गलियों में निकल पड़ा। बादलों की ओट में सूरज चुपके-चुपके झाँक रहा था, मानो इस पवित्र सरोवर को भी छिपकर निहारना चाहता हो।

पुष्कर सरोवर के चारों ओर बने 52 घाट अपनी-अपनी कहानियाँ कहते हैं। ‘ब्रह्मा घाट,’ ‘गांधी घाट,’ ‘सावित्री घाट,’ ‘वाराह घाट,’ ‘राम घाट’ … इनमें से कई तो सदियों से तीर्थयात्रियों के चरणों से धुलते आ रहे हैं। कुछ घाट समाज-विशेष के लिए आरक्षित हैं, फिर भी हर घाट पर संस्कृतियों का अनोखा संगम दिखता है – एक ओर पारंपरिक भारतीय पूजा का माहौल, दूसरी ओर हल्की-फुल्की हिप्पी वाइब्स।

मैंने कई घाटों पर टहलते हुए देखा – कैसे एक ही जगह पर भारतीय तीर्थयात्री और विदेशी यात्री एक साथ बैठे हैं। विदेशी पर्यटक कम थे, पर जो थे, वे योग, ध्यान और भारतीय आध्यात्मिकता की खोज में डूबे नजर आए। पुष्कर में दर्जनों ध्यान-केन्द्र और योगाश्रम हैं, जहाँ इज़राइल, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और अमेरिका से आए लोग महीनों ठहरते हैं। टूरिस्ट गाइड उन्हें ‘ब्रह्मा मंदिर’ की कथा सुनाते, सरोवर की महिमा बताते हैं। दुकानों में रंग-बिरंगे कपड़े, हिप्पी स्टाइल के गहने, लटकन वाली बैग्स – सब मिला-जुला। कई दुकानदार खुद विदेशी लिबास में, अंग्रेजी में बात करते, मानो पुष्कर अब सिर्फ भारतीय तीर्थ नहीं, बल्कि विश्व-संस्कृति का छोटा-सा केंद्र बन गया हो।

जैसे-जैसे शाम ढली, पुष्कर का रूप बदलने लगा। मैंने रात ठहरने के लिए एक साधारण-सा होटल लिया और फिर सरोवर की ओर लौट आया। बारिश के कारण घाट तक पानी लबालब था। मछलियाँ छलांग लगा रही थीं, क्योंकि लोग उन्हें दाना डाल रहे थे। कछुए धीरे-धीरे तैरते, मेंढक टर्राते और कुछ पक्षी पानी पर उड़ान भरते। बारिश के मौसम में सरोवर कितना जीवंत हो जाता है!

शाम की आरती का समय आया। घंटियाँ बजतीं, भजन गूँजते और सरोवर के किनारे बैठे लोग हाथ जोड़कर प्रार्थना करते। पुष्कर की तंग गलियाँ, जहाँ गायें आराम से टहलती हैं – अगर इन गलियों से गंदगी और पशु हट जाएं, तो शायद ये दुनिया की सबसे सुंदर जगह बन जाएँ। रात गहराई तो शहर रंगीन रोशनियों से जगमगा उठा। दुकानदारों, स्थानीय लोगों से बातें हुईं – हर किसी के पास एक अलग कहानी, अलग संस्मरण। पुष्कर का यही आकर्षण है – यहाँ हर व्यक्ति अलग है, पर सब एक सूत्र में बंधे हैं।

होटल की छत से देखने पर टिमटिमाती रोशनी में पुष्कर नीचे बिछा था। छत पर और भी पर्यटक थे – अलग-अलग भाषाएँ, अलग हँसी। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का जीता-जागता उदाहरण। ज्यादातर विदेशी जोड़े थे, जो भारतीय संस्कृति को गहराई से समझने आए थे। सुबह छत पर फिर पहुँचा – सूर्योदय निहारने। सूरज धीरे-धीरे उगा, सरोवर पर सुनहरा प्रकाश फैला। आसपास मंदिरों से मंगल आरती की मधुर ध्वनियाँ आने लगीं।

पुष्कर का प्रसिद्ध ‘पीड़ा’ (पेड़ा) इतना लाजवाब था कि सफर के लिए पैक करवा लिया। ट्रेन दो बजे थी, तो सोचा, ‘सोनी जी की नसीयाँ’ फिर देख लूँ। पहले भी गया था, पर आकर्षण कभी कम नहीं होता। यह स्वर्ण मंदिर कहलाता है – सोनी जी सेठ द्वारा बनवाया गया जैन तीर्थ। दीवारों और छत पर सोने से जड़ी जैन कथाएँ, नक्काशी इतनी बारीक कि आँखें ठहर जाती हैं। वहाँ डेढ़ घंटे बीत गए, पता ही नहीं चला। यह छोटी-सी यात्रा सिर्फ किलोमीटर नहीं, अनुभवों से भरी थी। पुष्कर ने मुझे फिर याद दिलाया – दुनिया कितनी विविध है और अध्यात्म कितना एकरूप। (सप्रेस)

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