अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस : क्या भारत की अपेक्षा अमेरिकी जनता अधिक खुश है ?

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भूटान की “सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता” की अवधारणा से प्रेरित अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस (20 मार्च) आज विकास की नई परिभाषा प्रस्तुत करता है। आय से आगे बढ़कर जीवन की गुणवत्ता, सामाजिक संबंध और मानसिक संतोष को महत्व देने वाली यह सोच, बदलती दुनिया—खासतौर पर युवाओं में बढ़ते अकेलेपन—पर गंभीर सवाल भी खड़े करती है।


भूटान, जिसकी प्रेरणा से संयुक्त राष्ट्र ने 20 मार्च को “अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस” घोषित किया, ने 1970 के दशक में विकास का मानक सकल घरेलू उत्पाद के बजाय “सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता” को माना। इस विचार ने दुनिया को यह सोचने पर विवश किया कि विकास का अंतिम लक्ष्य केवल आय नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता और मानवीय संतोष भी है। आँकड़ों के अभाव में भूटान हाल के वर्षों में विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट में नहीं रहा, पर उसका मॉडल आज भी प्रेरणा है। वर्ष 2026 के आंकड़े, जो अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस की पूर्व संध्या पर ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के वेलबीइंग रिसर्च सेंटर और गैलप द्वारा जारी किए जाएंगे, इस वर्ष की थीम ‘सोशल मीडिया और प्रसन्नता’ है। यह सोशल मीडिया के प्रभाव और युवाओं में अकेलेपन को उजागर करेगी, जो पूर्व और पश्चिम दोनों के लिए प्रासंगिक है। 

फिनलैंड लगातार आठ वर्षों से विश्व का सबसे खुशहाल देश है, साथ ही उसके पड़ोसी नॉर्डिक देश भी शीर्ष पर हैं । तानाशाही शासन प्रणाली वाले देश बहुत कम शीर्ष में आते हैं । वियतनाम एकमात्र कम्युनिस्ट देश है जिसे प्रथम 50 में स्थान मिला। 

विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट धर्म के आधार पर नहीं बनती । मुस्लिम बहुल समृद्ध खाड़ी देश आय और सामाजिक सहायता से बेहतर स्थान पाते हैं, जबकि पाकिस्तान जैसी कमजोर अर्थव्यवस्थाएँ नीचे रहती हैं। धार्मिक समुदायों से जुड़े लोग कभी-कभी अधिक संतुष्ट दिखते हैं, पर यह सार्वभौमिक नहीं। लोकतंत्र, पारदर्शी शासन, सुदृढ़ सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य, धर्मनिरपेक्षता, नागरिक स्वतंत्रता और उच्च सामाजिक विश्वास ही व्यापक संतोष एवं प्रसन्नता के स्थायी आधार हैं; धर्म सहायक है, अनिवार्य नहीं। 

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अमेरिकी राजनीतिक दर्शन में “पर्स्यूट ऑफ हैप्पीनेस- प्रसन्नता की खोज” का अर्थ केवल सुख भोगना नहीं, बल्कि ऐसा समाज बनाना है जहाँ हर व्यक्ति अपनी क्षमताओं के अनुसार जीवन चुन सके। जीवन, स्वतंत्रता और प्रसन्नता को अमेरिकी समाज में मूल अधिकार माना गया है। इसी कारण अमेरिका पूँजीवाद, उपभोक्तावाद, उदार लोकतंत्र और वैज्ञानिक नवाचार का एक विशिष्ट संगम बन गया है।  कुछ अमेरिकियों से बातचीत में मैंने पूछा—‘क्या आप खुश हैं?’ अधिकांश ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—‘हाँ।’ यह उत्तर  मेरे अध्ययन किए मनोवैज्ञानिक निष्कर्षों से मेल खाता है। इसके विपरीत, आम भारतीय अक्सर बातचीत की शुरुआत दुख-दर्द और जीवन की परेशानियों से करते हैं।  यह दो सभ्यताओं—एक अत्यंत आधुनिक और दूसरी प्राचीन परंपराओं से गहराई से जुड़ी—के सामाजिक और भावनात्मक दृष्टिकोण का रोचक अंतर उजागर करता है।

 हाल के वर्षों में अमेरिका की प्रसन्नता रैंकिंग 2012 के 11 वें स्थान से गिरकर 2025 में 24 वें स्थान पर आ गई है। इसका प्रमुख कारण युवा पीढ़ी में आर्थिक असुरक्षा, काम के दबाव और बढ़ते अकेलेपन के कारण खुशी का तेजी से क्षरण है। आलोचकों का मानना है कि कई कंपनियाँ कार्यस्थल की ‘खुशी’ को व्यक्तिगत मानसिक परियोजना बनाकर कर्मचारियों से अधिक काम लेने का साधन भी बना लेती हैं।  कई बार इन समस्याओं का समाधान केवल व्यक्तिगत मनोविज्ञान तक सीमित रखा जाता है, जबकि वास्तविक संतोष का आधार मजबूत सामाजिक संबंध होते हैं। फिर भी अमेरिकी समाज ने इन चुनौतियों को स्वीकार करते हुए शोध-आधारित समाधान खोजने की प्रक्रिया जारी रखी है। आज वहाँ खुशी एक सामाजिक-मनोवैज्ञानिक परियोजना बन गई है—जिसे मापा जाता है और बढ़ाने के प्रयास किए जाते हैं। “हैप्पीनेस इंडस्ट्री”—माइंडफुलनेस, जीवन-कोचिंग और प्रेरक साहित्य—लाखों डॉलर का विशाल बाजार बन चुकी है। 

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अकेलेपन की बढ़ती प्रवृत्ति के बावजूद, परिवार, समुदाय और चर्च अमेरिकी समाज में भावनात्मक सहारे के महत्वपूर्ण स्रोत बने हुए हैं। ईसाई आध्यात्मिक नेता ईसा मसीह के प्रेम, क्षमा और सहनशीलता के संदेश के माध्यम से सिखाते हैं कि सच्ची प्रसन्नता करुणा, सेवा और विनम्रता में निहित है। यही कारण है कि अमेरिकी सामाजिक जीवन में स्वयंसेवा, सामुदायिक सहयोग और दान की परंपरा भी काफी मजबूत दिखाई देती है। ऐसी ही शिक्षाएँ भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं में भी हैं, पर आधुनिक भारत के सार्वजनिक जीवन में धर्मगुरुओं की कथनी और करनी के बीच बढ़ती दूरी इन्हें व्यावहारिक जीवन से दूर करती जा रही है।

अमेरिका में प्रसन्नता की खोज व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अवसरों से जुड़ी है, जबकि भारत की स्थिति अधिक जटिल, द्वंदात्मक  और संक्रमणशील है। भारत एक ओर तीव्र आर्थिक आकांक्षाओं और आधुनिक जीवनशैली की ओर बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर वह अपनी पारंपरिक सामाजिक संरचनाओं, पारिवारिक मूल्यों और आध्यात्मिक दृष्टि से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। इसी कारण यहाँ भौतिक प्रगति और सांस्कृतिक संतुलन के बीच लगातार तनाव दिखाई देता है।

सीमित संसाधनों के बावजूद परिवार और पारिवारिक व्यवसाय भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करते हैं। भारतीय दार्शनिक परंपरा—भगवद्गीता का कर्म, भक्ति, ज्ञान , ध्यान और बुद्धि योग का सिद्धांत, गौतम बुद्ध की तृष्णा-मुक्ति और महावीर का अपरिग्रह—बाहरी उपलब्धियों से अधिक आंतरिक संतुलन पर बल देते हैं। अमेरिकी सामाजिक व्यवहार में सकारात्मकता का सार्वजनिक प्रदर्शन भी दिखाई देता है—यहाँ काम की बात से पहले दिन, मौसम या सप्ताहांत पर हल्की बातचीत करना शिष्टाचार माना जाता है। अमेरिकी समाज में सकारात्मकता और प्रसन्नता की सार्वजनिक अभिव्यक्ति बहुत मुखर है—कभी-कभी यह भीतर की बेचैनी को भी छिपा लेती है; जबकि भारतीय समाज में धैर्य और सहनशीलता का अभ्यास अधिक गहरा दिखाई देता है।

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अमेरिका और भारत के बीच ‘खुशी’ की अवधारणाओं को समझने में प्रवासी भारतीय समुदाय एक अनोखा सेतु है। उनके जीवन में व्यक्तिगत उपलब्धि और पारिवारिक-सामुदायिक जुड़ाव का संतुलन दिखाई देता है—जहाँ आर्थिक प्रगति के साथ होली, दीपावली और गणेश चतुर्दशी जैसे धार्मिक उत्सव सामुदायिक आनंद का माध्यम बनते हैं।

विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट 2025 के अनुसार अमेरिका निर्धारित मानकों पर मजबूत है, जबकि भारत की रैंकिंग 126 वें से सुधरकर 118 वें स्थान पर पहुँची है। डिजिटल अर्थव्यवस्था, कल्याणकारी योजनाओं और ग्रामीण आय में वृद्धि इसके प्रमुख कारण हैं। फिर भी क्षेत्रीय तुलना में भारत पाकिस्तान (109 वें) और नेपाल (92 वें) से पीछे है। 

आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार प्रसन्नता केवल सांख्यिकी, परिस्थितियों या व्यक्तिगत प्रयासों का परिणाम नहीं है। यह व्यक्तित्व, सामाजिक संबंधों और जीवन में अर्थ की अनुभूति का सूक्ष्म समन्वय है। यदि हम खुशी को क्षणिक सकारात्मक भाव मान लें तो तुलना एक दिशा में जाएगी, किंतु यदि इसे दीर्घकालिक संतोष और संबंधों की गहराई के रूप में देखें तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। शायद असली प्रश्न यह नहीं कि भारत या अमेरिका—कौन अधिक खुश है, बल्कि यह कि हम खुशी को किस रूप में परिभाषित करते हैं। संभव है खुशी न पूरी तरह भीतर हो, न बाहर—वह मनुष्यों के बीच के संबंधों में जन्म लेती है। (सप्रेस)

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