मध्यप्रदेश का बजट : ग्रीन फ्रेमवर्क का दावा, जलवायु संकट की अनदेखी

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हाल के मध्यप्रदेश के बजट में तरह-तरह की लोक-लुभावन घोषणाओं के बावजूद पर्यावरण-प्रदूषण से निपटने की कोई तजबीज जाहिर नहीं हुई है। यहां तक कि पर्यावरण के लिए आवंटित राशि भी पिछले साल के मुकाबले घटा दी गई है। आखिर इतने कम बजट में कैसे सुधरेगा पर्यावरण ?


राजेश कुमार

पिछले सप्‍ताह मध्यप्रदेश के वित्तमंत्री जगदीश देवड़ा ने राज्य विधानसभा में 2026–27 का ₹4,38,317 करोड़ का बजट पेश किया। इसे राज्य का पहला ‘ग्रीन बजट ढांचा’ बताया गया, लेकिन वास्तविक आवंटन में जलवायु परिवर्तन को लेकर गंभीर कमियाँ दिखाई देती हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए मात्र ₹31 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जो पिछले वर्ष के ₹39 करोड़ से लगभग 20 प्रतिशत कम है। वहीं वन-संरक्षण हेतु ₹6,121 करोड़ का बजट रखा गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 23 प्रतिशत अधिक है। यह विरोधाभास स्पष्ट करता है कि सरकार वन-संरक्षण को प्राथमिकता दे रही है, लेकिन व्यापक पर्यावरणीय और जलवायु संकट को नजरअंदाज कर रही है।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि बजट में जलवायु परिवर्तन के लिए कोई स्पष्ट बजट लाइन नहीं दी गई है। न तो अनुकूलन (Adaptation) और न ही शमन (Mitigation) कार्यक्रमों के लिए अलग प्रावधान किया गया है। कुल बजट का मात्र 0.007 प्रतिशत पर्यावरण संरक्षण पर खर्च किया जा रहा है, जो नगण्य है।

 यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब प्रदेश में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चरम मौसम की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट’ (सीएसई) की रिपोर्ट बताती है कि जनवरी 2022 से 2025 तक मध्यप्रदेश ने 598 दिनों में ‘गंभीर मौसम’ का सामना किया, यानी लगभग हर तीसरे दिन। इस दौरान 1,439 लोगों की मौत हुई, 82,170 हेक्टेयर फसलें बर्बाद हुईं, 20,000 से अधिक घर क्षतिग्रस्त हुए और 6,000 पशुओं की मृत्यु हुई। वर्ष 2024 में ही प्रदेश ने 176 चरम मौसम वाले दिन दर्ज किए, जिनमें 353 लोगों की मौत हुई और 25,170 हेक्टेयर प्रभावित हुए।

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अन्य राज्यों की तुलना में मध्यप्रदेश की स्थिति और भी कमजोर दिखती है। राजस्थान ने अपने पहले ‘ग्रीन बजट 2025–26’ में कुल निधियों का 11.34 प्रतिशत सतत विकास और जलवायु परिवर्तन के लिए आवंटित किया। गुजरात ने जलवायु परियोजनाओं के लिए ₹165 करोड़ का प्रावधान किया। इसके विपरीत मध्यप्रदेश ने पर्यावरण बजट घटा दिया और जलवायु परिवर्तन का कोई उल्लेख नहीं किया।

राज्य ने हाल ही में ‘मध्यप्रदेश राज्य जलवायु परिवर्तन क्रियान्वयन योजना 2023–28’ तैयार की है, जिसमें ₹97,000 करोड़ का बजट प्रस्तावित है, लेकिन पर्यावरण विभाग का बजट मात्र ₹31 करोड़ है। यह गंभीर असमानता दर्शाती है कि कार्ययोजना के वित्तपोषण को लेकर स्पष्टता नहीं है। संभावित धन स्रोतों—केंद्रीय योजनाएँ, अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त, निजी निवेश—का उल्लेख अस्पष्ट है। इस अनिश्चितता के कारण कार्यान्वयन बाधित होता है। बजट में आपदा राहत के लिए ₹715 करोड़ और राज्य आपदा निधि हेतु ₹564 करोड़ का प्रावधान किया गया है, लेकिन इनमें भी जलवायु दृष्टिकोण का समन्वय नहीं दिखता।
स्पष्ट है कि सरकार जलवायु संकट की गंभीरता को प्राथमिकता नहीं दे रही है। जब पूरी दुनिया जलवायु संकट से निपटने के लिए निवेश बढ़ा रही है, तब मध्यप्रदेश सरकार बिना जलवायु परिवर्तन का नाम लिए बजट पारित कर रही है। इसका सबसे बड़ा असर हाशिए पर खड़े समुदायों—दलित, आदिवासी, किसान, मछुआरे, महिला समूह, दिव्यांग और एलजीबीटीक्यू समुदाय पर पड़ रहा है, जो सीधे जलवायु आपदाओं से प्रभावित हो रहे हैं और जिनके पास संसाधनों की भारी कमी है।

मध्यप्रदेश का 2026–27 बजट ‘ग्रीन बजट’ कहलाने के बावजूद जलवायु संकट से निपटने के लिए कोई ठोस रणनीति प्रस्तुत नहीं करता। यह न केवल सरकार की गंभीरता की कमी को दर्शाता है, बल्कि भविष्य में बढ़ते जलवायु संकट से निपटने की क्षमता को भी कमजोर करता है। सरकार को चाहिए कि वह एक स्पष्ट बजट लाइन, समर्पित वित्तीय रणनीति और विभागीय समन्वय सुनिश्चित करे, ताकि जलवायु कार्ययोजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके और कमजोर समुदायों को सुरक्षा प्रदान की जा सके। (सप्रेस)

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