संवेदनशील विज्ञान से ही जलवायु संकट का समाधान संभव : राजेंद्र सिंह

अहमदाबाद, 19 दिसंबर। प्रसिद्ध जल संरक्षण कार्यकर्ता और मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित राजेंद्र सिंह ने कहा है कि अभियांत्रिकी, प्रौद्योगिकी और विज्ञान यदि संवेदनशील, अहिंसक और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ें, तभी वैश्विक जलवायु परिवर्तन के संकट का स्थायी समाधान संभव है। वे इसरो, अहमदाबाद में वैज्ञानिकों को संबोधित कर रहे थे।

विकास के नाम पर विनाश की चेतावनी

राजेंद्र सिंह ने कहा कि आधुनिक प्रौद्योगिकी ने विकास के नाम पर विस्थापन, बिगाड़ और विनाश को जन्म दिया है। इसके विपरीत प्राचीन भारत का विज्ञान संवेदनशील और अहिंसक था, जिसने प्रकृति के साथ समन्वय बनाकर समाज को आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा कि जब प्रौद्योगिकी और अभियांत्रिकी को संवेदनशील विज्ञान से जोड़कर रचना और निर्माण होता है, तभी वह स्थायी, विनाशमुक्त और समग्र विकास का रूप लेता है। इसी प्रक्रिया को उन्होंने ‘सनातन विकास’ बताया।

उन्होंने कहा कि आज जलवायु परिवर्तन के नाम पर जो समाधान तलाशे जा रहे हैं, वे तभी कारगर माने जा सकते हैं जब उनके स्थायी प्रभाव दिखाई दें। विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अभियांत्रिकी जब अलग-अलग होकर काम करते हैं, तभी विनाश की प्रक्रिया शुरू होती है, लेकिन जब इन्हें एक साथ जोड़ा जाता है तो अहिंसक और पुनर्जननकारी विकास का मार्ग खुलता है। तरुण भारत संघ ने पिछले 50 वर्षों में इसी दृष्टि से काम करते हुए जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन और उन्मूलन के ठोस उदाहरण प्रस्तुत किए हैं।

विज्ञान की समग्रता से ही टिकाऊ समाधान

उन्‍होंने कहा कि शिक्षा में विद्या के साथ समग्रता से जोड़कर हर वक्त ध्यान में रखना चाहिए कि , हम प्रकृति के अंग है ,नियंता नहीं । हमें अपने ब्रह्मांड व स्वयं निर्माण का खुद को ख्याल रखना होगा हम और हमारा ब्रह्मांड एक ही है। हमे हमारी शिक्षा से बुद्धि का विकास करके, ब्रह्मांड के शोषण, अतिक्रमण, प्रदूषण की सीख दी है। यह सब सिखाने वाली हमारी शिक्षा ,हमारी बुद्धि का विकास करती और आत्मा को संकुचित बना देती है। आज पूरी दुनिया उससे आकर्षित होकर, उसी की तरफ मुड़ रही है। आज जो विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अभियांत्रिकी ने किया है उसका  परिणाम धरती पर बाढ़-सुखाड़ आपदाएं और  कोविड़ जैसी महामारी की बीमारियां है। लेकिन अब जिस रूप में आपदा हो रही हैं, वह जटिलतम बनती जा रही हैं।

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समुदायों में ही बची है जलवायु समाधान की विद्या

उन्‍होंने कहा कि आज हमारे पास जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और उन्मूलन की विद्या समुदायों में ही बची है। जहां-जहां समुदायों ने प्रकृति के साथ रक्षण-संरक्षण का काम किया है, वहां जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और उन्मूलन हो गया है। यो नो द्वेषत् पृथिवि यः पृतन्याद् भिदासान्मनसा यो वधेन,तं नो भूमे रन्धय पूर्वकृत्वरि अर्थात विद्या हमें पृथ्वी प्रकृति से प्यार एवं सम्मान करना सिखाती है। इसी से हम संरक्षित, सुरक्षित, आनंदित और समृद्धित होते हैं और इसे ही अपने भगवान के रूप में पहचानते हैं। यही भारत में नीर-नारी-नदी सम्मान का व्यवहार  सिखाती है। इसी से हम अपनी सुरक्षा की गुहार करते है। यही हमें सभी तरह से  सभ्यता की सुरक्षा प्रदान करती है।

जहां विज्ञान, प्रद्योगिकी और अभियांत्रिकी से हम आगे बढ़ते गए वहां ज्यादातर प्रकृति का विनाश हो गया है।  हमारे जीवन में जो प्रेम, विश्वास, आस्था, निष्ठा और भक्ति भाव से प्रकृति के प्रति पैदा हुआ था, वह बिखर गया है। 

हम प्रकृति के अंग हैं, नियंता नहीं

राजेंद्र सिंह ने भारतीय ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में प्रकृति को पंचमहाभूतों—भूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीर—से निर्मित माना गया है। नीर, नारी और नदी को नारायण के रूप में देखा गया। यही भारतीय आस्था पर्यावरण विज्ञान का मूल है, जो संवेदनशील और अहिंसक है। उन्होंने कहा कि आधुनिक विज्ञान गणनाओं और समीकरणों तक सिमट गया है, जिससे संवेदना का लोप हुआ है। इसी कारण हिमालयी आपदाएँ बढ़ीं, नदियों का गंगत्व नष्ट हुआ और समाज की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ी।

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उन्होंने कहा कि आयुर्वेद जैसी भारतीय चिकित्सा पद्धति बीमारी पैदा नहीं करती, बल्कि आरोग्य और प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करती है। कोविड-19 के दौरान भी आयुर्वेदिक जीवनशैली और उपचार से अनेक लोग सुरक्षित रहे। इसके विपरीत आधुनिक चिकित्सा पद्धतियाँ कई बार नई बीमारियों को जन्म देती हैं।

संवेदनशीलता के बिना विज्ञान विनाशक

राजेंद्र सिंह ने विज्ञान की परिभाषा पर बात करते हुए कहा कि क्रमबद्ध सत्य की खोज ही विज्ञान है, लेकिन यह खोज तभी सार्थक होती है जब उसमें मानवता और प्रकृति के प्रति संवेदना हो। उन्होंने चेताया कि जब समृद्धि केवल मानव केंद्रित होती है, तो वही एटम बम और युद्ध का रास्ता खोलती है। इसके विपरीत संवेदनशील विज्ञान जीवन, प्रकृति और समाज—तीनों की रक्षा करता है।

उन्होंने ऊर्जा और शक्ति के अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि शक्ति विनाश का मार्ग खोलती है, जबकि ऊर्जा पुनर्जनन, शांति और समृद्धि का आधार बनती है। भारतीय ज्ञान परंपरा ऊर्जा आधारित थी, जिसने ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का विचार दिया। इसी ऊर्जा के बल पर जैसलमेर जैसे कम वर्षा वाले क्षेत्र ऐतिहासिक व्यापार केंद्र बने।

राजेंद्र सिंह ने नदी सौंदर्यीकरण, भूजल प्रबंधन और विकास परियोजनाओं के नाम पर हो रहे अतिक्रमण की आलोचना करते हुए कहा कि आज सुंदर शब्दों के आवरण में प्रकृति का शोषण किया जा रहा है। अतिक्रमण, शोषण और प्रदूषण आधुनिक प्रबंधकीय शिक्षा और विखंडित विज्ञान की देन हैं।

उन्होंने राजस्थान के अलवर, करौली और आसपास के क्षेत्रों के उदाहरण देते हुए कहा कि जब समुदायों ने जल संरक्षण को अपने हाथ में लिया, तो उजड़ी बस्तियाँ फिर से बस गईं। यही सामुदायिक ज्ञान और विकेंद्रित जल प्रबंधन संयुक्त राष्ट्र द्वारा ‘बेस्ट प्रैक्टिस’ के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुका है।

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इसरो–तरुण भारत संघ सहयोग का प्रस्ताव

संबोधन के दौरान राजेंद्र सिंह ने प्रस्‍तावित किया कि इसरो तरुण भारत संघ के पिछले 50 वर्षों के कार्यों का जैसलमेर, चंबल, मेवात, अलवर तथा अन्य राज्यों में हुए कार्यों को भी आधुनिक विज्ञान एवं विद्या को मिलाकर दुनिया के सामने प्रस्तुत कर सकते है। विद्या द्वारा हुए प्रकृति-संस्कृति के योग से हुई रचनाओं के प्रभाव आधुनिक अभियांत्रिकी, प्रौद्योगिकी तथा विज्ञान द्वारा प्रमाणित करना देश-दुनिया हेतु अच्छा होगा।

कार्यक्रम के अंत में इसरो के निदेशक डॉ. निलेश देशाई ने राजेंद्र सिंह को सम्मानित करते हुए कहा कि इसरो का उद्देश्य लोकहित में काम करना है और तरुण भारत संघ के साथ मिलकर भविष्य में सहयोग की संभावनाओं पर औपचारिक रूप से काम किया जाएगा। सत्र का समापन इसरो के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अरविंद सिंह के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। इस प्रस्तुति में ‘इसरो’ के उपनिदेशक डॉ. रविशंकर, वरिष्ठ वैज्ञानिको अरविंद सिंह, प्रवीण गुप्ता जल विभाग के मुख्य वैज्ञानिक तथा सैंकड़ो वैज्ञानिक मौजूद रहे।

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