महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज में जिस ‘सभ्यता’ को हालात कहा था, वही आज के जलवायु संकट की जड़ बन चुकी है। बापू ने सौ साल पहले चेतावनी दी थी कि अगर दुनिया यूरोप-अमेरिका के उपभोगवादी रास्ते पर चली, तो प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाएगा। बढ़ती गर्मी-सर्दी, बाढ़-सुखाड़ और प्रदूषण उनकी दूरदर्शिता को सच साबित कर रहे हैं।
गांधी जयंती पर विशेष
महात्मा गांधी ‘हालात’ को हिन्द स्वराज्य में ‘सभ्यता’ कह रहे है ‘सभ्यता किस हालात का नाम है’। आगे कहते है ‘‘सभ्यता की सही पहचान यह है कि लोग बाहरी (दुनिया) की खोजों और शरीर सुख में धन्यता-सार्थकता और पुरुषार्थ मानते हैं।“ इसका अर्थ है कि आज से 200 वर्ष पहले ही हमारी सभ्यता में तेजी से बदलाव आना शुरू हुआ था; क्योंकि 1909 में बापू ने जो देखा वह केवल उसी दिन का बदलाव नहीं है, उसके 100 वर्ष पूर्व उन्होंने टालस्टाय, शराड , गारपेंटर, थोरो, रस्किन, प्लेटो, मैक्स, नार्डो, नौरोजी, दत्त आदि लोगों को देख समझ, पढ़कर ‘हिंद स्वराज्य’ लिखा है। यह पुस्तक मूलतः बापू के विचार हैं; परंतु वे अपनी पुस्तक के अंत में कह रहे हैं कि उक्त लोगों की मान्यताएं और विचारों के आधार पर हिंद स्वराज्य लिखा है।
अतः हमारी सभ्यता और हालात का तेजी से बदलाव सवा सौ साल पहले कलयुग के दृश्य प्रभावों ने बापू के मानस को चिंतित बनाया था। तभी उस कल में ही यूरोप और भारत के बीच प्रत्यक्ष अंतर दिखा है। उन्होंने भारत को यूरोप के रास्ते पर जाने से बार-बार मना किया है। यूरोप-अमेरिका के रास्ते दुनिया चलेगी तो आज की जमीन और प्राकृतिक साधनों से 8 गुना ज्यादा साधन दुनिया को चाहिए होंगे। उनकी मान्यता अंत तक यही बनी थी; इसलिए ऐसी सभ्यता या हालात में हम सत्य और अहिंसा को मानकर जीवित नहीं रह सकते।
संपूर्ण प्रकृति-संपूर्ण जीव जगत की जरूरत पूरी कर सकती है लेकिन एक भी लालची इंसान की लालच पूर्ति नहीं कर सकती। उनकी ये सभी मान्यता उस काल के हालात देखकर बन गई थी। इसलिए पूरी दुनिया को चेतावनी देने हेतु ही उन्होंने ‘हिंद स्वराज्य’ लिखा था।
हिंद स्वराज्य की चेतावनी आज की बढ़ती वैश्विक गर्मी-सर्दी, जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती बाढ़ – सुखाड़, आग का संकट जानकर लिखी है। अर्थात बापू जान रहे थे कि बदलते हालात हमारी बदलती जीवन पद्धति का परिणाम है। यही हमारे मौसम जलवायु, नदी नालों का स्वभाव भी बदलेंगे। इसलिए मैं कह सकता हूं हिंद स्वराज हमारे जलवायु परिवर्तन के परिणाम का एहसास और आभास कराने वाली पुस्तक है। इसलिए इस पुस्तक में सभ्यता को हालात कहा है। हालात केवल सभ्यता-संस्कृति को ही नहीं बताती बल्कि ये तो उस कालचक्र के मौसम, जलवायु की दिशा और दशा को भी कहते हैं। इसलिए आज की वैश्विक चुनौतियां बढ़ती गर्मी-सर्दी, बाढ़-सुखाड़ और आग के साथ-साथ बढ़ता प्रदूषण, अतिक्रमण, शोषण से बढ़ती लाचारी, बेकरी, बीमारी का संकेत है। इन चुनौतियों की चेतावनी ही बापू ने हिंद स्वराज्य के माध्यम से दुनिया को दी हैं।
बापू मेरे सपनों का भारत में कहते हैं ‘‘सत्य और अहिंसा के बिना मनुष्य जाति का विनाश हो जायेगा। सत्य और अहिंसा को हम ग्रामीण जीवन की सादगी में ही प्राप्त कर सकते हैं।… अगर दुनिया आज गलत रास्ते पर जा रही है तो मुझे उसकी चिन्ता नहीं होनी चाहिए। हो सकता है कि भारत भी उसी रास्ते जाय और जिस तरह पतंगा दीपक के चारों ओर नाचकर अंत में उसी में जल मरता है, उसी प्रकार वह भी नष्ट हो जाये । लेकिन भारत को और भारत के जरिए सारी दुनिया को भी विनाश से बचाने का आखिरी साँस तक प्रयत्न करना मेरा परम कर्तव्य है। मेरे कहने का सार यह है कि मनुष्य को अपनी जरूरी आवश्यकताओं की पूति में संतोष मानना चाहिए और स्वावलंबी होना चाहिए। अगर वह इतना संयम नहीं रखेगा तो वह अपने-आपको बचा नहीं सकेगा। मैं आधुनिक विज्ञान का प्रशंसक हूं, लेकिन मैं देखता हूं कि, उसके प्रकाशमें पुरानी चीज का ही फिर से संशोधन और नवीनीकरण करना होगा।’’
बापू के अनुसार ही हमने अपने पिछले 50 वर्षों में बापू के हिंद स्वराज की चेतावनी और बापू के सपनों का भारत को अपने कामों का आधार मानकर काम किए हैं। मेरे गुरू बापू ने पंचमहाभूतों को ही भगवान मानकर जल, जंगल, जमीन, जंगलवासी संरक्षण कार्यों की सीख दे दी। बस इसी में लगे तो दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात (अरावली पर्वतमाला की 28 हजार) खदानें बंद करने हेतु सत्याग्रह करके सफलता की सिद्धी प्राप्त की। 15800 (छोटे बांध, जोहड़ बनाकर) 23 नदियों को पुनर्जीवित करके 12 लाख, 50 हजार लोगों को प्राकृतिक पुनर्जीवन के काम खेती में लगा दिया। 6632 बंदूकधारियों की बंदूकें छुड़वाकर खेती करने हेतु जल संरक्षण के काम में लगा दिया। लूटमार डकैती में लगे लोग खेती में पानी की व्यवस्था करके किसान बन गए। सरिताओं के पुनर्जीवित होने से नई सभ्यताओं का पुर्नजन्म हुआ। हालात बदले तो समाज भी बदल गया।
पहले मैं बदला, फिर समाज में बदलाव शुरू हुआ। हमारे समाज ने छोटे-छोटे प्रयास करके अपने उजड़े हुए जीवन को पुनर्जीवित स्वयं करना शुरु कर दिया था। चंबल में महिलाओं की पहल करने के लिए तैयार कर दिया, तब उन्होने अपने हिंसक परिवार को अहिंसामय बनाना शुरू कर दिया। आज पूरा चंबल क्षेत्र अहिंसा की दिशा में अग्रसर है। जब इंसान को प्रकृति सीख देती है; तब सत्य समझ में आने लगता है। सत्य जानकर ही अहिंसामय जीवन सहजता व सरलता से समता की तरफ लेकर जाता है।
हालात सुधार केवल सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक सुधार नहीं है। यह तो प्राकृतिक हालात सुधार का काम भी होता है; जिससे उक्त सुधारों के साथ-साथ अध्यात्मिक, सनातन विकास द्वारा प्राकृतिक पुनर्जनन प्रक्रिया आरंभ हुई है। हम अपने 50 वर्षों के कार्योंनुभवों को बापू की प्ररेणा से पूरी दुनिया बाढ़, सुखाड़, आग मुक्ति के लिए प्रयोगों में लगे है। यह बापू के प्राकृतिक-अध्यात्मिक दर्शन से ही संभव होगा।


