भारतीय अर्थव्यवस्था : जादूगर का अर्थशास्त्र

प्रेरणा

‘नमस्ते ट्रंप,’ ‘अबकी बार, ट्रंप सरकार’ और ‘माई फ्रेंड डोनॉल्ड’ की गलबहियों से छिटककर ‘लाल आंखें’ दिखाने वाले चीन और रूस की चापलूसी आखिर उसी अर्थ-नीति की देन है जो हमारे आम, गरीब-गुरबों को आए दिन रुलाती रहती है। क्या इस गफलत को ठीक से समझने की जरूरत नहीं है?

कोई माने या न माने, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी असाधारण राजनीतिक जादूगर तो हैं। उनकी हर घोषणा लोगों का ध्यान इस तरह खींच लेती है जैसे कोई जादू हो ! उनकी शैली हैरान करती है—एक छड़ी घुमाओ और सब कुछ बदल गया ! ‘नोटबंदी’ की घोषणा की नाटकीयता याद करें कि ‘जीएसटी’ की; कभी ‘आत्मनिर्भर भारत’ तो कभी ‘मेक इन इंडिया;’ कभी ‘उरी’ तो कभी ‘पुलवामा,’ कभी ‘पठानकोट’ तो अब ‘ऑपरेशन सिंदूर !’ कहानियां-ही-कहानियां हैं ! हर घोषणा पहले दिन ‘क्रांतिकारी’ तो दूसरे दिन खोखली गलेबाजी लगने लगती हैं। यही तो जादू है! सामने होता रहता है तो हम अवाक होते हैं और जब खत्म होता है तो ठगा-सा महसूस करते हैं, क्योंकि जो सामने हो रहा था, वह सच तो था नहीं ! 

पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की अर्थव्यवस्था को ‘मृत’ कह डाला ! नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि यह तो हम कब से कह रहे हैं! क्या सच में ऐसा है कि हम एक मरे घोड़े को चाबुक मारकर,  उससे रेस जीतने में लगे हैं? क्या सरकार ने हमारी अर्थव्यवस्था के ‘घोड़े’ को पानी पिलाने में देर नहीं कर दी? ऐसे में जरूरी है कि भावनाओं को किनारे रखकर, पूरी वस्तुनिष्ठता और निष्पक्षता के साथ, इस सरकार के बदले तेवर, उसकी नीतियों और घोषणाओं का आकलन किया जाए।

मोदी जी का सपना था, भारत को जल्द-से-जल्द पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना। सत्ता में आते ही उन्होंने सोचा कि कोई ऐसा शॉर्टकट खोजा जाए जिसमें न हींग लगे न फिटकरी और रंग आए चोखा ! पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था तो कहां रह गई पता नहीं, लेकिन इस खेल में अडानी जरूर अंबानी से आगे निकल गए;  और बन बैठे दुनिया के तीसरे सबसे अमीर व्यक्ति !

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सरकार की दूसरी प्रमुख मंशा रही कि भारत को दुनिया के सामने चीन के विकल्प के रूप में खड़ा किया जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ का नारा दिया और हर चौक-चौराहे पर मशीनी शेर खड़ा कर दिया। आज़ादी के बाद से कंपनियों पर लगने वाला ‘कॉरपोरेट टैक्स,’ सितंबर 2019 में घटाकर ऐतिहासिक न्यूनतम स्तर पर ला दिया। आशय यह था कि दुनियाभर की कंपनियों को देश में आमंत्रित करें, भारत में उत्पादन तेज़ी से बढ़े और निर्यात में उछाल आए और हम चीन की जगह ले लें, पर सब धरा-का-धरा रह गया, कोविड आ गया! तब सरकार ने आकड़ों का जादू किया, कहा कि “हम दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं !” भले ही वो लूली-लंगड़ी ही क्यों न हो गयी हो!

दुर्भाग्य से जादूगर का जादू ही उसके रास्ते का रोड़ा बनता गया। नोटबंदी ने देश के असंगठित व्यापार की रीढ़ तो पहले ही तोड़ दी थी। हमारा 85% व्यापार नकद लेन-देन पर आधारित था और वही था जो सबसे अधिक रोजगार भी देता था। फिर आया छोटे और मझोले उद्योगों पर हमला। ये भी बड़े पैमाने पर रोजगार देते थे। गलत-सलत ढंग से लागू किए गए ‘जीएसटी’ के बोझ तले इनका दम भी टूट गया। बची-खुची कसर कोरोना काल में सरकारी अव्यवस्था और गैर-ज़िम्मेदाराना रवैये ने पूरी कर दी।  

स्वतंत्र अर्थशास्त्री और विशेषज्ञ सरकार को लगातार चेतावनी देते रहे कि देश का बहुसंख्यक वर्ग गंभीर कठिनाइयों का सामना कर रहा है। रोजगार घट रहे हैं, लोगों की क्रय-शक्ति कम हो रही है और इसका प्रतिकूल असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। याद कीजिए कि क्या कहा था, रघुराम राजन ने, अर्थशास्त्र का नोबेल पाने वाले अभिजीत बनर्जी ने और कई और स्वतंत्रचेता नागरिकों ने ! लेकिन अपनी नीतियों की आलोचना सुन ले तो वो भाजपा सरकार कैसी?! अब नया नारा जरूरी हो गया : ‘हम कुर्बानी देंगे,’ ‘हम हिंदुस्तानी झुकना नहीं, झुकाना जानते हैं’ या ‘हम अमेरिका के सामने डटकर खड़े हैं !’  

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लेकिन बात के भात से कब, किसका पेट भरा है? सरकार कल तक शतुर्मुर्ग की तरह रेत में अपना सर दबाए थी, मोदीजी को पक्का भरोसा था कि ट्रंप मेहरबान तो क्या करेगा शैतान! अब वही मोदीजी स्वदेशी की तलवार लेकर व्यापारियों को ललकार रहे हैं कि बढ़ो जवानो, ट्रंप के किले को ध्वस्त कर दो ! आप खोजिए इन व्यापारियों में न उनके अडानी हैं, न अंबानी। हैं वे ही छोटे व्यापारी जिनकी कमर उन्होंने पहले ही तोड़ दी है। वास्तविकता यह है कि सरकार देश के विकास के लिए हमेशा विदेशी निवेश पर निर्भर रही, चीन से आयात बढ़ाती रही और साथ ही देशवासियों को आत्मनिर्भरता की दुहाई भी देती रही।  

जादूग़र के खेल की एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं, वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण। सन् 2024 के चुनावी झटके में सरकार का बहुमत जाता रहा तो मैडम ने पहले ही बजट में आयकर कम कर दिया। जनता खुश, समर्थक खुश और शेयर बाजार में भी खुशी की लहर दौड़ गई, लेकिन कुछ ही महीनों में अर्थव्यवस्था का घोड़ा फिर हांफने लगा। फिर साहब ने लाल किले से कह दिया कि ‘जीएसटी’ की दरें घटाकर हम लोगों को मालामाल करने जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या मैडम को इसकी जानकारी पहले से थी?  अगर नहीं थी, तो यह जादूगरी एक और मास्टर स्ट्रोक ही है, जिसे चलाने के लिए फिर किसी जादू का सहारा लेना पड़ेगा। यदि जानकारी थी तो घोषणा बजट में ही हो जाती, यूं त्यौहारों के ठीक बीच में नहीं होती !

इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में भारत की ‘जीडीपी’ पिछले साल के मुक़ाबले 7.6% से बढ़ी है। इस तरह की बढ़त की अपेक्षा किसी को नहीं थी, पर कुछ सूचकांक और भी हैं जो अर्थव्यवस्था की सेहत का हाल बयां करते हैं। किसी भी अर्थव्यवस्था पर भरोसे का मानक है उसकी मुद्रा। रुपया रिकॉर्ड लुढ़कता जा रहा है और विदेशी निवेशक भारत से पैसा निकाल रहे हैं। भारत का शेयर बजार जिसे सरकार हर क़ीमत पर बढ़ाए रखती है वह भी गिर रहा है। एक तरफ ‘रिजर्व बेंक’ ब्याजदर घटा रहा है और दूसरी तरफ़ निजी कम्पनियों को मिलने वाली ब्याजदर बढ़ रही है।

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एक तरफ जहां कमाई ठिठकी हुई है, लोग कर्जे में डूब रहे हैं। कच्चे तेल के दाम जो दुनिया में तो खूब घटे हैं, पर भारत में, एथनॉल की 20% मिलावट के बाद भी, रूस से सस्ते में तेल ख़रीदने के बावजूद पेट्रोल के दाम रिकॉर्ड स्तर पर बने हुए हैं। ये सभी इशारा कर रहे हैं कि दाल में कुछ काला है! ऐसे में आयकर और ‘जीएसटी’ में एकसाथ कटौती, अमेरिका के साथ चल रहा ‘टैरिफ युद्ध’ और दुनिया में बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता के बीच क्या भारतीय अर्थव्यवस्था आगे बढ़ सकेगी? सब तरफ़ से विकास के घोड़े को चाबुक मारा जा रहा है। सवाल यह है कि क्या वह दौड़ेगा? या कि फिर कोई नया जादू होगा? (सप्रेस)

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