कागज़ी कार्रवाई और केवाईसी के नाम पर जन-हित योजनाओं में अड़चनें : बड़वानी में हज़ारों आदिवासी हुए लामबंद

“पहले गाँव में व्यवस्था लाओ, फिर केवाईसी माँगो” — आदिवासियों का सरकार से सवाल

बड़वानी, 13 मई। मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में सोमवार को जागृत आदिवासी दलित संगठन के नेतृत्व में हज़ारों आदिवासी महिला-पुरुषों ने रैली निकालकर सरकार की ‘कागज़–केवाईसी’ आधारित नीतियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद की। “राशन, रोज़गार, शिक्षा और पेंशन पर वार बंद करो” जैसे नारों के साथ आदिवासियों ने ज़िला मुख्यालय पर प्रदर्शन करते हुए प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा।

सभा में बड़वानी विधायक राजन मंडलोई और राजपुर विधायक बाला बच्चन शामिल हुए और उन्होंने मंच से आश्वासन दिया कि आदिवासियों की मांगे भोपाल से लेकर दिल्ली तक पहुंचाई जाएंगी। हालांकि, सभा में आमंत्रण के बावजूद क्षेत्रीय सांसदों की अनुपस्थिति पर आदिवासियों ने नाराज़गी जताई और एलान किया कि वे अपने जन-प्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाएंगे।

संगठन की नासरीबाई निंगवाल ने बताया कि आज गरीब आदिवासी परिवारों को सिर्फ एक दस्तावेज़ की कमी के कारण राशन, रोज़गार, पेंशन और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है। आधार, समग्र ID, मोबाइल नंबर और केवाईसी की अनिवार्यता ने योजनाओं तक पहुँच को जटिल और खर्चीला बना दिया है।

हरसिंग जमरे ने कहा, “आज भी कई लोगों के आधार कार्ड नहीं बने हैं, लेकिन सरकार ने पहले ही विभिन्न योजनाओं के लिए केवाईसी ज़रूरी कर दिया है। जिनके पास मोबाइल नहीं है, वे राशन और पेंशन पाने से भी वंचित हो रहे हैं।”

आदिवासी छात्र संगठन के हमजिया रावत ने बताया कि बच्चों की स्कूल भर्ती से लेकर छात्रवृत्ति तक हर स्तर पर जन्म प्रमाणपत्र और जाति प्रमाणपत्र जैसी दस्तावेज़ों की ज़रूरत बढ़ा दी गई है। ये प्रमाणपत्र बनवाना ग्रामीण इलाकों में बेहद कठिन है, जिससे शिक्षा पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। उन्होंने मांग की कि दस्तावेजों पर लगने वाला ₹100 का जुर्माना खत्म किया जाए।

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हीरालाल ठाकुर ने रोजगार गारंटी कानून की बदहाल स्थिति पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा, “शासकीय न्यूनतम मज़दूरी दर ₹466 है, पर मनरेगा में केवल ₹261 रोज़ दिए जा रहे हैं – यह ‘बेगारी’ है।” साथ ही यह भी बताया गया कि मजदूरी भुगतान में कई बार तीन-चार महीने की देरी होती है, जिससे मज़दूर दूसरे राज्यों की ओर पलायन को मजबूर हैं।

संगठन ने बताया कि मध्य प्रदेश में अब भी लगभग 1.52 करोड़ लोगों का केवाईसी नहीं हुआ है, लेकिन केंद्र सरकार ने बिना केवाईसी वाले परिवारों का राशन 15 मई से बंद करने की चेतावनी दी है। यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के खिलाफ है, जो राशन को कानूनी अधिकार मानता है।

आदिवासियों ने यह भी सवाल उठाया कि जब गाँवों में इंटरनेट, बिजली, नेटवर्क और लोक सेवा केंद्र जैसी बुनियादी सुविधाएँ तक पूरी नहीं हैं, तब डिजिटल केवाईसी को अनिवार्य करना अन्यायपूर्ण है। उन्होंने मांग की कि यदि सरकार को दस्तावेज़ों की ज़रूरत है, तो पहले हर गाँव में इसके लिए व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

रैली और सभा के दौरान आदिवासियों ने अपने ज्ञापन में पांच प्रमुख मांगें उठाईं। उन्होंने साफ कहा कि सभी योजनाओं में केवाईसी की अनिवार्यता को खत्म किया जाए, ताकि कोई भी व्यक्ति सिर्फ कागज़ों की कमी के कारण अपने अधिकारों से वंचित न हो। राशन वितरण पर लगी रोक को तुरंत हटाने की बात कही गई, क्योंकि यह एक कानूनी अधिकार है और इससे जीवन-निर्वाह सीधे प्रभावित होता है। मनरेगा में काम करने वालों को शासकीय न्यूनतम मज़दूरी दर दी जाए, जिससे उन्हें बेगारी के हालात में न जीना पड़े। साथ ही, जन्म, जाति और निवास प्रमाणपत्र बनवाने की प्रक्रिया को सरल और नि:शुल्क किया जाए ताकि शिक्षा और अन्य सुविधाओं से कोई वंचित न रहे। अंत में, उन्होंने माँग की कि स्वामित्व योजना को लागू करने से पहले गाँवों के भूमि रिकॉर्ड में मौजूद गड़बड़ियों को ठीक किया जाए, जिससे भूमि अधिकारों को लेकर कोई भ्रम या अन्याय न हो।

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सभा में पूर्व सांसद प्रत्याशी पोरलाल खर्ते ने स्वास्थ्य और आवास योजनाओं में व्याप्त अनियमितताओं की ओर ध्यान खींचा। विधायक राजन मंडलोई ने क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था की बिगड़ती हालत पर चिंता जताई और सरकार को कठघरे में खड़ा किया।

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