पत्रकारिता में पहुंच बनाती ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’

डॉ.संतोष पाटीदार

हाल में एलॉन मस्क की ‘ग्रोक एआई’ की ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ उर्फ ‘आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस’ ने दुनियाभर में बवाल खड़ा कर दिया है। कोई भी ‘ग्रोक’ से किसी भी तरह का सवाल करके जवाब प्राप्त कर लेता है, लेकिन क्या ये जवाब सौ टंच सही होते हैं? कैसा हो, जब पत्रकारिता भी इसी ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ के सहारे अपनी जिम्मेदारी निभाने लगे?

‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ (एआई) दुनिया भर की दशा और दिशा बदल रही है। इसे लेकर एक अलग दुनिया के दावे किए जा रहे हैं। ‘एआई’ के चौंकाने वाले आविष्कारों की जानकारी और उनके उपयोग के साथ इसके खतरों के कहानी-किस्से भी मीडिया के माध्यम से दुनिया को सुनने मिल रहे हैं। ऐसे में पत्रकारिता इससे कैसे दूर रह सकती है? ‘एआई’ का चमत्कार और पराक्रम देखकर लगता है कि यह प्रौद्योगिकी हौले-हौले पत्रकारिता को भी बदल देगी। क्या वास्तव में पत्रकारिता के साथ ऐसा होगा? इसे लेकर जितने प्रयोग, चिंतन, बहस और चर्चा दुनिया के उत्तरी गोलार्ध के विकसित कहे जाने वाले देशों में है, उतने दक्षिण की आधी दुनिया के विकासशील देशों में शायद नहीं है।

‘ग्लोबल साउथ’ के पत्रकारों में ‘एआई’ को लेकर असमंजस है। प्रौद्योगिकी के प्रयोग से जुड़े जोखिम और दायित्व, मीडिया प्रबंधन में नीतिगत उदासीनता, महंगे उपकरण, प्रशिक्षण का अभाव जैसे कारण ‘एआई’ पत्रकारिता की राह में बाधक है। तकनीकी विकास के इस दौर में यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले वर्षों में ‘एआई’ की दिशा बदलती है या नहीं और क्या ‘ग्लोबल साउथ’ या विकासशील देशों  के पत्रकार भविष्य में अपने काम के लिए ‘एआई’ को एक संसाधन के रूप में अपनाएंगे या उससे जुड़े संभावित दायित्व और जोखिम के रूप में देखेंगे।

इस तकनीक को लेकर दुनिया भर में उत्सुकता तो बहुत है, लेकिन इसके प्रभाव के बारे में अधिकांश  बहस या बातचीत विकसित देशों तक ही केंद्रित रही है। इस आधी दुनिया के दृष्टिकोण के आधार पर दुनिया भर में मान्यताएं बन रही हैं। इसके प्रयोग में वहां की पत्रकारिता भी प्रमुख रूप से आगे है। दुनिया में ‘ग्लोबल साउथ’ के देश कमजोर या बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के साथ विकसित हो रहे हैं। ऐसे देशों में ‘एआई’ को लेकर मीडिया के दृष्टिकोण पर एक अध्ययन किया गया है। ‘ग्लोबल साउथ’ में अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, एशिया आदि महाद्वीपों के देश शामिल हैं। 

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थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ (टीआरएफ) की एक रिपोर्ट, जो दुनिया के 70 से अधिक देशों के 200 से अधिक पत्रकारों के सर्वेक्षण के निष्कर्षों पर आधारित है, सामने आई है। इस रिपोर्ट के आधार पर अध्ययनकर्ता डमियन रेडक्लिप विस्तार से बताते हैं कि इस अध्ययन का उद्देश्य ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ की जानकारी और आशंका पर प्रकाश डालना है। रिपोर्ट में बताया गया है कि ‘एआई’ का उपयोग किस तरह किया जा रहा है, न्यूज़रूम के सामने क्या-क्या अनोखी चुनौतियाँ हैं और पत्रकारों, न्यूज़रूम के लीडरों, वित्तपोषकों और नीति-निर्माताओं के लिए इसके क्या निहितार्थ हैं?

इस रिपोर्ट के कुछ निष्कर्ष हैं : (1) ‘एआई’ को अपनाना व्यापक, लेकिन असमान है। सर्वेक्षण में  ‘एआई’ प्रौद्योगिकी के लिए ‘सतर्क आशावाद’ पाया गया, एक ऐसी भावना जो शायद इस तथ्य को झुठलाती है कि वैश्विक-दक्षिण में ‘एआई’ को अपनाना महत्वपूर्ण है। 10 में से आठ से अधिक (81.7%) पत्रकार अपने काम में ‘एआई’ उपकरणों का उपयोग करते हैं। 81% उत्तरदाताओं ने कहा कि वे पहले से ही अपने काम में ‘एआई’ टूल का उपयोग करते हैं। इनमें से लगभग आधे (49.4%) लोग प्रतिदिन ‘एआई’ का उपयोग करते हैं, जो दर्शाता है कि कितनी जल्दी यह उनकी कार्य-संस्कृति का हिस्सा बन गया है।

पत्रकार मुख्य रूप से कंटेंट का प्रारूप तैयार करने और संपादन, ट्रांसक्रिप्शन, तथ्यों की जांच और शोध के लिए ‘जनरेटिव एआई’ का उपयोग कर रहे हैं। ‘चैटजीपीटी,’ ‘ग्रामरली,’ ‘ओटर’ और ‘कैनवा’ जैसे उपकरण कई पत्रकारों के लिए आवश्यक हो गए हैं, क्योंकि वे समय बचाने और दक्षता बढाने की क्षमता रखते हैं, साथ ही उनके विचारों का दायरा और रचनात्मकता को बढ़ाते हैं। जैसा कि घाना के एक पत्रकार ने बताया, ‘एआई ने मेरी पत्रकारिता को काफी हद तक बेहतर बनाया है। इसने मेरे शोध को सुव्यवस्थित किया है और मुझे जटिल डेटा का त्वरित और सटीक विश्लेषण करने में सक्षम बनाया है, विशेष रूप से ‘एचआईवी’ शोध और पर्यावरण रिपोर्टिंग जैसे क्षेत्रों में।’

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(2) ‘एआई’ अपनाने में बाधाएं : प्रशिक्षण और नीतिगत समस्याओं के कारण ‘एआई’ की इस नई प्रौद्योगिकी या टेक्नोलॉजी तक पहुंच आसान नहीं होती, फिर भी, ‘एआई’ को लेकर सभी में उत्साह है। सर्वेक्षण में करीब 13% पत्रकारों ने बताया कि उनके न्यूज़रूम में ‘एआई’ नीति है, हालांकि इसे अपनाने में अन्य बाधाओं का भी सामना करना पड़ता है। कई पत्रकारों ने ‘एआई’ उपकरणों तक सीमित पहुंच, उच्च लागत और प्रशिक्षण की कमी के साथ-साथ मार्गदर्शन की कमी जैसी बाधाओं की बात कही। कुछ लोगों के लिए, विशेष रूप से कम संसाधन वाले न्यूज़रूम में, ‘एआई’ को अपनाना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। अक्सर ऐसा वित्तीय और तकनीकी बाधाओं के कारण होता है।

सर्वेक्षण में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह था कि लगभग 58% ‘एआई’ उपयोगकर्ता स्वयं-शिक्षित हैं, यानी खुद के प्रयास से इस विधा को सीख रहे हैं, उनके नियोक्ताओं से उन्हें कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं मिला है। यह निवेशकों के लिए एक अवसर प्रदान करता है। कई पत्रकारों ने ‘एआई’-केंद्रित कार्यशालाओं, नैतिक दिशा-निर्देशों और न्यूज़रूम नीतियों की जरूरत की इच्छा जताई, जो उन्हें ‘एआई’ की क्षमता को जिम्मेदारी से प्रयोग करने में मदद कर सकती हैं। जैसा कि ‘संयुक्त-अरब-अमीरात’ के एक न्यूज़रूम मैनेजर ने बताया कि दर्शकों के विश्वास को बनाए रखने के लिए नीतियां आवश्यक हैं, विशेष रूप से ‘एआई’-जनरेटेड सामग्री के मामले में। न्यूज़रूम में ‘एआई’ के उपयोग के लिए स्पष्ट नैतिक ढांचे, नियामक दिशा-निर्देश और पारदर्शिता जरुरी है। एशिया के पत्रकार मानते हैं कि ‘एआई’ पत्रकारिता के लिए बेहतर प्रौद्योगिकी है, लेकिन इसका उपयोग बहुत जिम्मेदारी से करना होगा।

भविष्य की ओर देखते हुए, विकासशील देशों के पत्रकार ‘एआई’ को एक ऐसे उपकरण के रूप में देखते हैं जो उनके काम को बेहतर बना सकता है – बशर्ते इसका उपयोग जिम्मेदारी से किया जाए। इस विरोधाभास को स्पष्ट करते हुए, भारत के एक पत्रकार ने कहा कि ‘एआई’ की गति, डेटा-विश्लेषण और दक्षता पत्रकारिता की पहुंच को बढ़ा सकते हैं, लेकिन यह गलत सूचना और पत्रकारिता की अखंडता के लिए जोखिम भरी चुनौतियां भी पेश करता है। विकासशील देशों में पत्रकारिता को लाभ पहुँचाने के लिए  पत्रकारों, वित्तपोषकों, मीडिया विकास संगठनों और नीति निर्माताओं को संयुक्त रूप से ‘एआई’ प्रौद्योगिकी को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

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पत्रकारिता की विविध आवश्यकताओं के लिहाज से उपयुक्त ‘एआई’ उपकरण बनाने के लिए मीडिया संगठनों, डेवलपर्स और निवेशकों के बीच साझेदारी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। पत्रकारिता में इस प्रौद्योगिकी की पहुंच समान रूप से होना चाहिए। यह सुनिश्चित करना कि ‘एआई’ के लाभ बड़े, संसाधनों वाले न्यूज़रूम तक सीमित न हों। जैसे-जैसे ‘एआई’ को अपनाने की प्रक्रिया तेज होती जा रही है, पत्रकारों, न्यूज़रूम और नीति निर्माताओं को यह सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करना होगा कि प्रौद्योगिकी पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों को कमजोर करने की बजाय मजबूत बनाए। (सप्रेस)

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