‘सिफा’ का सम्मेलन : कृषि व्यवस्था को आकार देने की पहल  

निमिषा सिंह

‘भारतीय किसान संघ परिसंघ’ (सिफा) के तत्वावधान में भारत के किसान समुदाय को सशक्त बनाने, नवाचारों का अन्वेषण और भारतीय कृषि के भविष्य को आकार देने हेतु तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद स्थित ‘फेडरेशन ऑफ तेलंगाना चैंबर ऑफ कॉमर्स’ में दो दिवसीय राष्ट्रीय किसान सम्मेलन का आयोजन हुआ, जिसके तहत कृषि क्षेत्र में क्रांति लाने के उद्देश्य से व्यावहारिक चर्चा और अपनी राय व्यक्त करने के लिए देश से किसान नेता, कृषि वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रगतिशील किसान एक मंच पर एकत्रित हुए।

आज भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की पाँच सबसे मजबूत अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। भारतीय सेना विश्व की सबसे ताकतवर सेनाओं में सम्मिलित है। विश्व के सफलतम अंतरिक्ष कार्यक्रमों में भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम शामिल है। अन्य क्षेत्रों में भी भारत नियमित रूप से विकास की नई बुलंदियां छू रहा है। इसके बावजूद भारत में खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला कृषि क्षेत्र आज भी उस स्थिति में नहीं पहुँच पाया है जिसे संतोषजनक माना जा सके। इसका परिणाम यह हुआ है कि कृषि पर निर्भर देश के करोड़ों लोग आज भी भारी अभावों में जीवन जीने को विवश हैं और कई बार ये कृषि के माध्यम से अपनी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं कर पाते।

‘भारतीय किसान संघ परिसंघ’ (सिफा) के तत्वावधान में भारत के किसान समुदाय को सशक्त बनाने, नवाचारों का अन्वेषण और भारतीय कृषि के भविष्य को आकार देने हेतु तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद स्थित ‘फेडरेशन ऑफ तेलंगाना चैंबर ऑफ कॉमर्स’ में दो दिवसीय राष्ट्रीय किसान सम्मेलन का आयोजन हुआ, जिसके तहत कृषि क्षेत्र में क्रांति लाने के उद्देश्य से व्यावहारिक चर्चा और अपनी राय व्यक्त करने के लिए देश से किसान नेता, कृषि वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रगतिशील किसान एक मंच पर एकत्रित हुए।

‘सिफा’ के संस्थापक और मुख्य सलाहकार पी चेंगल रेड्डी ने स्वागत भाषण के साथ सम्मेलन की शुरुआत की जिसमें उन्होंने भारत में खाद्य सुरक्षा और इस क्षेत्र में वैश्विक निर्यातक बनने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति के अवसरों पर अंतर्दृष्टि साझा की। उन्होंने आगे आने वाली चुनौतियों को भी स्वीकार किया जैसे कि जलवायु परिवर्तन और युवा प्रतिभाओं को खेती में आकर्षित करने की महत्वपूर्ण आवश्यकता, विशेष रूप से खाद्य प्रसंस्करण और कृषि निर्यात के क्षेत्रों में उपलब्ध अपार अवसरों की ओर इशारा करते हुए अपने स्वागत भाषण को समाप्त किया।

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‘सिफा’ के मौजूदा चेयरमैन रघुनाथ दादा पाटील ने देश भर से आए किसान नेताओं और प्रतिनिधियों के सामने मसौदा प्रस्ताव रखा जिसमें आगामी दिनों में समग्र देश में ‘सिफा’ के माध्यम से किसानों तक पहुंच बनाकर उनकी  समस्या के समाधान हेतु प्रयास करने की अपील की। दो दिवसीय सम्मेलन के प्रत्येक सत्र में विभिन्न राज्यों से आए वक्ताओं ने अपने विचार रखे। इसमें कोई शक नहीं कि कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और किसान इसकी जीवनरेखा हैं। किसान सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता दोनों है।

किसानों और वैज्ञानिकों के बीच अंतर को पाटने के लिए ‘प्रयोगशाला को भूमि’ से जोड़ने के प्रयासों पर भी चर्चा की गई, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अत्याधुनिक अनुसंधान जमीनी स्तर तक पहुंचे। कृषि में विविधता लाने के लिए किसानों को गेहूं और धान जैसी पारंपरिक फसलों के साथ-साथ मछली पालन, मधुमक्खी पालन और हाइड्रोपोनिक्स जैसे नए विकल्पों का उपयोग करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

सम्मेलन के पहले दिन के द्वितीय सत्र में इंटरैक्टिव पैनल में विभिन्न अहम विषयों पर चर्चा की गई, जिसमें ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (एमएसपी) समेत सतत कृषि के लिए नीतिगत पहल और योजनाएं, निर्यात नीति पर विस्तृत चर्चा की गई। ‘पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन’ के चेयरमैन अशोक बालियान ने मंच को सम्बोधित करते हुए कहा कि भारत सरकार ने 2018 में ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम’ की शक्ति का प्रयोग करते हुए चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य तय किए थे। ठीक उसी तरह केंद्र सरकार 23 फसलों पर भी इसी एक्ट को लागू करते हुए ‘एमएसपी’ तय कर सकती है, ताकि इससे नीचे सौदे न हो सकें। यह पूरे देश में लागू हो तभी कारगर हो सकेगा।

बिहार से आई निमिषा सिंह ने राज्य में मंडी व्यवस्था को पुनः बहाल कराए जाने के लिए सभी किसान नेताओं को संगठित होने की अपील की। झारखंड से आई सुष्मिता सोरेन ने जल संकट पर आवाज उठाते हुए बताया कि जमीन होने के वावजूद जल की कमी की वजह से वहां खेती नही हो पा रही। फसल बीमा का फायदा भी झारखंड के किसानों को ढंग से नही मिल पा रहा।

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दूसरे दिन सम्मेलन के प्रथम सत्र में कृषि में सोलर ऊर्जा की भूमिका, पशुओं से फसल को होने वाले नुकसान और फसल बीमा जैसे विषय शामिल थे। ‘सिफा’ की बैठक में ‘ह्यूमेन फाउंडेशन फॉर पीपल एंड एनिमल्स’ (HFPA)  जिनमें मार्कस कैम्पोस और राजगोपाल रेड्डी भी शामिल थे। उन्होंने किसानों को उनके संवैधानिक अधिकारों और उनकी रक्षा के लिए सरकार के कानूनी आदेश के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि ‘वन्यजीव संरक्षण अधिनियम’ का अनुच्छेद 21 आवश्यकता पड़ने पर वन्यजीवों से नागरिकों के जीवन और आजीविका की रक्षा करता है। जंगली सुअर, नीलगाय जैसे फसल पर हमला करने वाले जानवरों के लिए मुख्य वन्यजीव अधिकारी अपनी शक्तियों को सरपंच को सौंप सकता है, जो तब पंजीकृत शूटरों को एक निश्चित अवधि में जानवरों को मारने के लिए बुला सकते हैं। 

‘किसान सर्विस ऑर्गेनाइजेशन’ से जुड़े सोलर ऊर्जा विशेषज्ञ गणधम श्रीनिवास राव ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए बताया कि किस प्रकार उनके और उनके सहकर्मी वेणुगोपाल और पी चेंगल रेड्डी के अनुरोधों, अभ्यावेदनों और लगातार अनुवर्ती कार्रवाई के बाद हाल ही में ऊर्जा मंत्रालय ने हाईटेंशन ट्रांसमिशन लाइनों के लिए मानक संचालन प्रक्रिया जारी की है।

दूसरे दिन के अंतिम सत्र में ‘सिफा’ के मुख्य सलाहकार पी. चेंगल रेड्डी के मार्गदर्शन में सर्वसम्मत प्रस्ताव द्वारा ‘सिफा’ की नई कार्यकारी समिति और प्रशासनिक टीम का गठन किया गया। महाराष्ट्र से रघुनाथ दादा पाटील को चेयरमैन और गुजरात के विपिन चंद्र पटेल को राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई, वहीं झारखंड दुमका से ताल्लुक रखने वाली सुष्मिता सोरेन, उत्तरप्रदेश से अशोक बालियान और तेलंगाना से मारा गंगा रेड्डी को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद भार सौंपा गया। 

‘राष्ट्रीय किसान सम्मेलन’ में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कर्नाटक से शंकर नारायण रेड्डी, गुजरात से बिपिन भाई पटेल, तमिलनाडु से आरव्ही गिरी, आंध्रप्रदेश से कोटी रेड्डी, नरेंद्र बाबू, तेलंगाना से गोपाळ रेड्डी, निमू वसंता, माधव रेड्डी, सोमशेखर राव, उत्तरप्रदेश से अशोक बालियान, धर्मेंद्र मलिक, झारखंड से सुस्मिता सोरेन, बिहार से निमिषा सिंह, पंजाब से दलजीत कौर, तमिलनाडु से गुरूसामी धरमार, दिल्ली से कोटी रेड्डी, हरियाणा से सेवा सिंग आर्य, छतीसगढ़ से पारसनाथ साहू, कर्नाटक से बीएम हंसी, उड़ीसा से समीर साहू, महाराष्ट्र से शिवाजी नांदखिले ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और अपने विचार साझा किए।

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देश भर से आए किसान नेताओं ने कुछ विशेष मुद्दों पर अपनी सहमति जाहिर की जिनमें ‘एमएसपी’ से नीचे कृषि उपज न बिके, इसका प्रावधान करना, मुख्य फसलों, मुख्य फल-सब्जी, दूध व शहद आदि को ‘एमएसपी’ के दायरे में लाने, जल प्रबंध, कृषि सुधार, बाजार हस्तक्षेप योजना को प्रभावी बनाने, औसत बाजार भाव और लक्षित भाव के बीच जो अंतर हो, उस राशि यानि बाजार में हानि का भुगतान (मार्केट लॉस पेमेंट) किसानों को डीबीडी के माध्यम से किया जाए व कृषि को संविधान की समवर्ती सूचि में रखना, कृषि को उद्योग का दर्जा दिया जाए। सम्मेलन के पश्चात ‘सिफा’ के शीर्ष नेताओं की मौजूदगी में जल्द ही इन सभी मांगों के साथ एक ज्ञापन कृषि मंत्रालय को सौंपा जाएगा। यकीनन ‘राष्ट्रीय किसान सम्मेलन’ ने भारतीय कृषि में एक नए युग की नींव रखी है जिससे नवाचार, स्थिरता और सहयोग की मदद से वृद्धि और विकास को गति दी जा सकेगी। (सप्रेस)

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