भारत में घुमंतूजन जातियों को संवैधानिक संरक्षण देने की पहल

प्रो. कन्हैया त्रिपाठी

भारत में घुमंतू, अर्ध-घुमंतू और गैर-अधिसूचित जनजातियों के संरक्षण और भविष्य की योजनाओँ पर विचार विमर्श की प्रक्रिया चल रही है। गैर-अधिसूचित जनजातियों, घुमंतू जनजातियों और अर्ध-घुमंतू जनजातियों को भी गरिमा पूर्ण जीवन जीने का अधिकार है। ऐसे समुदायों के लिए सबसे गंभीर मुद्दों में से एक नागरिकता दस्तावेजों की कमी है, जो उनकी पहचान को अदृश्य बना देता है और सरकारी लाभ, संवैधानिक और नागरिकता अधिकार प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न करता है, जो विचारणीय है।

हमारे देश में ही नहीं दुनिया के विभिन्न कोने में ऐसी कुछ जातियां हैं जो अपना ठौर और ठिकाना बदलती रहती हैं. उनका देश अपना खुला असमान होता है और इस धरती का कोई भी कोना होता है. वे अपनी जिंदगी में संघर्ष करते हुए अपने आनंद को तलाशते हैं.

भारत में इन आवारागी के आदि (खानाबदोश जनजातियों) लोगों की बड़ी तादात है. ये हर राज्य में हैं. इनके भीतर सहनशक्ति है. इनके भीतर श्रम है. इनमें करतब दिखने की कलाएं हैं. लोक की समझ है. भाषाई दृष्टि से भी ये बहुत समृद्ध माने जाते हैं, खासकर जो बोलियों के प्रांतीय भाषा हैं, उन्हें ये अच्छे तरह समझते हैं. बस इनके भीतर एक कमी है ये पढ़े-लिखे कम हैं. इनमें शिक्षा का प्रसार आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी नहीं हो पाया. ये अँधेरे में अपने जीवन को जीने को मजबूर रहे. इन्हें समझने वाली सरकारें भी इनको वे सहूलियत व संसाधन नहीं दे पायीं, जिससे इनका जीवन प्रभाषित होता. गुणीजन हैं यह. कौशल-संपन्न हैं ये लोग.

इन्हें संपेरे पालने वाला समझकर अनदेखा किया गया. इन्हें सर्कस या करतब दिखाने वाले समझकर यह कहा गया कि ये लोग अपने तरीके से जी ही लेंगे. इन्हें असभ्य भी कहा गया. पर ये लोग अपने जीवन में समय और परिस्थिति के मारे होकर भी अपने संघर्ष को करने वाले लोग हैं. अपने श्रम से कमाने और खाने वाले लोग हैं. मेहनतकश लोगों की अपने हाथ की ताकत का भरोसा होता है. वे सरकारों या उनकी मुफ़्त की चीजों का मुह नहीं देखा करते.

See also  शराब से आदिवासियों का उत्‍थान : बड़े खतरे हैं इस राह में

इन जातियों की सबसे बड़ी समस्या है कि इन्हें अपराधी जाति भी कहा गया. इनके खिलाफ मुकदमें भी दर्ज कराए गए. इनमें एक तो ऐसी क्षमता नहीं थी कि अपराध दर्ज होने पर वे अपने मुकदमें के लिए पैरवी कर पायें. भारत के विभिन्न अंचलों में इन्हें नैतिक सहयोग कभी नहीं मिला, क्योंकि ये अविश्वसनीय समझे गए. लेकिन इसके साथ ही इन जातियों के दर्द को बराबरी से देखा भी नहीं गया. मसलन इनकी स्त्रियों के साथ जो भी जुर्म हुए उसे कभी भी अपराध नहीं समझा गया. स्वघोषित सभ्य समाज का कानून घुमंतू जातियों, अर्ध घुमंतू और गैर अधिसूचित जातियों-एनटी, एसएनटी और डीएनटी की स्त्रियों के साथ कितना जुर्म किया है, इसका कोई सही-सही आँकड़ा नहीं है क्योंकि उनके साथ हुए यौन-उत्पीड़न भी स्थानीय थानेदार पंजीकृत नहीं करते थे. वे सहने के लिए मजबूर रहे फिर भी विडंबना यह है कि वे अपराधी-जन बने रहे.

एक अच्छी खबर आ रही है कि NATIONAL HUMAN RIGHTS COMMISSION, INDIA (NHRC) द्वारा भारत में घुमंतू, अर्ध-घुमंतू और गैर-अधिसूचित जनजातियों के संरक्षण और भविष्य की योजनाओँ पर ओपन हाउस चर्चा हुई है जिसमें ऐसे पीड़ित-जन के विषय में गंभीर विचार-विमर्श हुआ है. यथा- आपराधिक जनजाति अधिनियम, 1872 और बाद में आदतन अपराधी अधिनियम, 1952 के अधिनियमन द्वारा लगाए गए कलंक के कारण एनटी, एसएनटी और डीएनटी के सामने आने वाली चुनौतियों की पहचान करना और बाद के भेदभावपूर्ण प्रावधानों को संशोधित करने का तरीका निकालना, उनके शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य देखभाल और कानूनी दस्तावेजों जैसी बुनियादी सुविधाओं का लाभ उठाने में समुदायों द्वारा सहन की जाने वाली बाधाओं को समझना, साथ ही सभी उजागर चुनौतियों को कम करने के उपाय सुझाना, संसद, सरकारी संस्थानों और उच्च शिक्षा में गैर-अधिसूचित जनजातियों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना और विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के लिए आगे बढ़ने का रास्ता निर्धारित करना, आदि शामिल है. ये एक सजग प्रयास है एनएचआरसी का जिसकी सराहना हो रही है. सराहना आयोग के अध्यक्ष अरुण मिश्र और उनके साथी सदस्यों की हो रही है कि वे उनके बारे में सोच रहे हैं जो हाशिये पर जीने के लिए विवश हैं और उन्हें सहयोग की अति-आवश्यकता है.

See also  विनाश हो गया है, आदिवासियों के लिए विकास

गैर-अधिसूचित समुदायों की समस्याओं पर ठोस प्रयासों और उनके मानवाधिकारों को प्रभावित करने वाले कारकों पर विचार होना ही चाहिए. विचार आयोग के सदस्य डॉ. मुले के उस पहल पर भी होनी चाहिए जो उनके मानव अधिकारों को समृद्धि प्रदान करने वाली हैं. डॉ. मुले का मानना है कि जीवन का अधिकार, समानता, गरिमा और स्वतंत्रता मानव अधिकारों के चार प्रमुख स्तंभ हैं और प्रत्येक नागरिक उसके बीते हुए समय के आधार पर आंके बिना, आगे बढ़ने और योगदान करने का समान अवसर पाने का हकदार है. गैर-अधिसूचित जनजातियों, घुमंतू जनजातियों और अर्ध-घुमंतू जनजातियों को भी आजीविका के उचित साधनों की आवश्यकता है. डॉ. मुले ने यह पहल कर डाली कि ‘आपराधिक प्रवृत्ति’ वाली गैर-अधिसूचित जनजातियों के बारे में औपनिवेशिक मानसिकता को बदलने की जरूरत है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनके मानव अधिकारों का उल्लंघन न हो. उनकी पहचान के उचित दस्तावेजीकरण में तेजी लाने की जरूरत है ताकि उन्हें कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल सके और उन्हें बुनियादी जरूरतें प्रदान की जा सकें और साथ ही उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विभिन्न हितधारकों को उनके मानव अधिकारों को प्रभावित करने वाले मुद्दों को सुव्यवस्थित करने के लिए ठोस प्रयासों और चर्चाओं की आवश्यकता है.

देखा जाए तो यह एक सभ्यतागत समस्याओं पर मानवीय सोच है जो आयोग करना चाहता है लेकिन यदि राज्य सरकारें, महत्वपूर्ण हितधारक, मानवाधिकारों में विश्वास करने वाले लोग, इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लें. वे इन जातियों के बारे में मानवता का परिचय दें. उन्हें समझें तो जिन्हें हम कुछ अब तक नहीं दे सके हैं, उसे दे सकते हैं. एक खास बात जो आयोग के संयुक्त सचिव, श्री देवेन्द्र कुमार निम ने उठाई कि गैर-अधिसूचित जनजातियों, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियाँ सबसे अधिक उपेक्षित, हाशिए पर और आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित समुदाय हैं. ऐसे समुदायों के लिए सबसे गंभीर मुद्दों में से एक नागरिकता दस्तावेजों की कमी है, जो उनकी पहचान को अदृश्य बना देता है और सरकारी लाभ, संवैधानिक और नागरिकता अधिकार प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न करता है, बहुत ही विचारणीय है. प्रायः इन सरोकारों को ही सरकारें अनदेखी करती रही हैं. जबकि ये ज़रूरी पहलू हैं कि इन वंचना के साथ जीवन जी रही जातियों के प्रथम दस्तावेज़ ही पहले दिए जाएँ जिससे ये अपनी अस्मिता के साथ जीना तो सीख लें.

See also  संरक्षित जंगलों में असुरक्षित आदिवासी

पहल जब हो रही है तो इसके परिणाम भी अच्छे आएंगे, ऐसी उम्मीद की जाती है लेकिन पहल केवल राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ले यही ज़रूरी नहीं है अपितु सबके भीतर घुमंतू जातियों के बारे में आपराधिक इन्हें समझने का बोध समाप्त होना आवश्यक है और सभी खुद इनको अपने जैसा समझेंगे तो ही घुंमतुजन पर्याप्त प्रतिष्ठा व गरिमा के भागीदार बन सकेंगे. राज्य सरकारें और स्थानीय जिला प्रशासन भी इस मुहिम में अपनी भूमिका तय कर सकता है. राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की ओर से इस पर यदि एक राष्ट्रीय स्तर पर परामर्शी जारी हो तो निश्चय ही प्रदेश में स्थापित राज्य सरकारें और जिला प्रशासन सब इनकी गरिमा की रक्षा के लिए सक्रिय हो सकते हैं.

Table of Contents

नीले धुएँ की धरती : ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’

समाज और सरकार चाहे तो पर्यावरण को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण अमरीका के टेनेसी और नार्थ कैरोलीना राज्यों की सीमाओं से लगा ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’ है। करीब सौ साल पहले कानून बनाकर प्रकृति को उसके

Read More »

पर्यावरण संरक्षण : केवल पौधारोपण नहीं, जीवनशैली में बदलाव भी जरूरी

विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधे लगाने का संदेश नहीं देता, बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदार जीवनशैली अपनाने का आह्वान करता है। जल संरक्षण, प्लास्टिक का कम उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण, जैविक खेती और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपभोग जैसे छोटे-छोटे प्रयास

Read More »

World Environment Day : पर्यावरण संरक्षण पर टिका है भविष्य

पर्यावरण संरक्षण और संतुलन का प्रश्न आज पूरी मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित

Read More »