साहित्‍य : अंधायुग और कविता की पुकार

चंद्रकांत देवताले

चंद्रकांत देवताले

समाज के सुख दुख को अपने साहित्‍य में स्‍थान देने वाले यशस्वी कवि चंद्रकांत देवताले ने मूल रूप से हिंदी कविता में बदलाव के पक्षधर रहे हैं। साहित्‍यकार देवताले अपने समय और भविष्य के कवि थे। वे सच में हमारे युग के सच की राजनीति को भी रेशा-रेशा उधेड़ते चलते थे। वे अपनी कविता की सघन बुनावट और उसमें निहित राजनीतिक संवेदना के लिए जाने जाते रहे है।

दिन रात हम शामिल हैं इस युद्ध में/जो दुनिया और मन में बाहर-भीतर हो रहा -तुकाराम।
’जितना ही तीव्र है द्वंद्व क्रियाओं-घटनाओं का/बाहरी दुनिया में/उतनी ही तेजी से भीतरी दुनिया में/चलता है द्वंद्व कि/फिक्र से फिक्र लगी हुई’– मुक्तिबोध
’कला बदल सकती है क्या समाज? नहीं जहां बहुत कला होगी,परिवर्तन नहीं होगा’ – रघुवीर सहाय

तुकाराम के युद्ध और मुक्तिबोध के द्वंद्व के बीच साढ़े तीन सौ वर्षों का अंतराल है। रघुवीर सहाय की समाज-चिंता मुक्तिबोध के लगभग तीन वर्ष के बाद के समय की है। इस बीच रचनाकारों से कई अपेक्षाएं की गयीं। मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय-ब्रेष्ट आदि बड़े कवियों ने ’कविगण चुप’ (मुक्तिबोध), ’हत्यारों के क्या लेखक साझीदार हुए’ (रघुवीर सहाय), ’जमाना स्याह था, पर तब क्यों खामोश रहे कविगण’( ब्रेष्ट) जैसी चिंताएं व्यक्त कीं। उक्त दोनों स्थितियों-प्रश्नों में हमारे आज के परिवेश का चुनौतियों और रचनाकारों की भूमिका के संकेत मिलते हैं।

अव्वल तो यही है कि मुद्दत से जागरूक रचनाकारों के लिए सृजन एक संघर्ष – भूमि रहा है। जेक्स ने ठीक कहा था ’ हम जन्मजात विद्रोही हैं क्योंकि हम जन्मजात सृष्टा हैं।’’ अपशकुनों से भरा मानव लोक’ (शमशेर) आज जिस तरह मुंह बायें है उसका सामना भाषा कैसे करे, यह अनुभव नया नहीं है।

जिन खतरों की ओर गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रेमचंदा, नागार्जुन आदि ने चेताया और मुक्तिबोध ने ’अंधेरे में’और अपने महाकाव्यात्मक फड़फड़ाते पन्नों में जिनकी आमद दर्ज की, आज वे भयावह रूप धारण किये इतरा रहे हैं। लोकतंत्र और आजादी की जो चिंता रघुवीर जी करते रहे अपने समस्त लेखन में, वह आज उनके न रहने के तेरह वर्षों बाद खतरनाक मोड़ ले चुकी है। पर आज मुक्तिबोध या रघुवीर जी होते जो राहत महसूस करते कि उनके उत्तराधिकारी खामोश नहीं रहे।

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पिछला दशक गवाह है कि केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, विष्णु खरे, अशोक बाजपेयी, भगंवत रावत से लेकर अरूण कलम, कात्यायनी, राजेश जोशी, कुमार अंबुज, लीलाधर मंडलोई विष्णु नागर, नरेश सक्सेना, असद जैदी, सुदीप बैनजी, नरेंद्र जैन, हेमंत कुकरेती, पवन करण, एकांत श्रीवास्तव आदि कवियों की लंबी फेहरिस्त है जिन्होंने भारतीय समाज और लोकतंत्र को छिन्न -भिन्न करने की कोशिशों का प्रतिकार किया है। यह प्रतिरोध न केवल कविता, बल्कि प्रदर्शन प्रतिवेदनों के स्तरों पर भी हुआ है। इसे इस महावेश के बवंडर में चाहे प्रतीकात्मक समझा कहा जाये, पर इसकी अनदेखी करना ने केवल अन्याय, बल्कि अपराध होगा। रघुवीर जी की बात याद आ रही है। उन्होंने लिखा है ’रचनात्मकता और आजादी तथा समता की लड़ाई और कविता एक ही मानवीय आकांक्षा और उत्कर्ष के पर्याय है, यह चेतना युवा और युवतर कवियों में और अधिक उत्कटता से अनुभव में आ रही है।

अनेक त्रासद और दुर्भाग्यपूर्ण चुनौतियों के बीच यह याद आना भी उम्मीद को सहारा देता है कि पिछले वर्षों में युवा रचनाकारों को प्रकाशन के सम्मानजनक अवसर मिलने लगे हैं। ऐसे में मुक्तिबोध याद आते हैं जिनके सिरहाने ’चांद का मुंह टेढा है’ रखा ही रहा और वे उसे देख पाने के लिए होश में नहीं आये। दूर दराज के इलाकों, आदिवासी जनपदों में सृजनरत हमारे युवा रचनाकरों को पहचाना ही नहीं जा रहा, बल्कि रेखांकित भी किया जा रहा है।

इस बात का उल्लेख भी जरूरी है कि भूमंडलीकरण बाजारवाद-सूचना क्रांति के प्रभावों के चलते जीवन और रचना के बीच का रिश्ता विछिन्न हो रहा है। हो सकता है। पुरस्कार, सम्मान, यशलिप्सा, स्पर्धा जैसी लाभ-लोभ की स्थितियां ललचा रही हैं। पिछले वर्षों में बड़े-बड़े पुरस्कारों को लेकर जैसी कुत्ता-फजीहत हुई है वह शर्मनाक हैं। इसमें लेखकों से अधिक संस्थाओं और संस्थापतियों की भूमिका हो सकती है। ’साहित्य में माफिया’ जैसे मुहावरे का प्रचलन भी एक आंतरिक चेतावनी है। हम ’दूध-धोए’ दूसरे ’धूल-धोए जैसे विवाद और आरोप -प्रत्यारोपों की व्याख्या किस बाजारू तर्क से की जाए, समझना होगा। और उस हाल में जब समझा जता है कि समाज को साहित्य-कविता की परवाह नहीं हैं और रचनाकार समझते हैं कि वे बदलाव के वाहक है दिशा निर्देशक नक्शा बनाने वाले। जबकि इतनी प्रसार क्रांति के बावजूद कविता तो दूर हमें विचार को भी जनता तक नहीं पहुंचा सके हैं।

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कवि लोग कविता के बारे में बढ़-चढ़ कर बोलते हैं बेहतर मनुष्य बनाएगी कविता ’तब क्या वे दीगर विद्याओं के गुरूओं और कुशल सेल्समैन की तरह नहीं लगते, यह सवाल भी मुझे मथता रहता है। यह वैसा ही लगता है जैसा इन दिनों रोज कहा जा रहा है’ संस्कृत को बिना पढ़े संस्कृति को नहीं समझा जा सकता’। कुछ धूर्त्त-लंपट-खर्राट-धांसू लेखकों-कवियों को जानते होंगे हम लोग। दूसरी तरफ निश्चल-आत्मीय-संवेदनशील समझदार गांव आदिवासी जनपद के लोग हैं जो कविता के दर्पण में नहीं निहारते। यह कविता के ताकत नहीं, उसके बारे में  प्रलाप के कारण उत्पन्न असमंजस है।

एक छोटी-सी तकलीफदेह सचाई। जैसे विश्वग्राम हो गया है वैसे ही ग्राम-कस्बा-छोटे शहर भी विश्व हो गये हैं। जहां छोटे पांच-छह अखबार हैं। तीन -चार चैनल हैं। तीस-चालीस साहित्यिक संस्थाएं हैं। सौ एक लेखक हैं। वे अपनी दुनिया में मगन होते जा रहे हैं। दो-तीन हजार में कविता पुस्तक छप ही नहीं जाती, उसका लोकार्पण भी हो जाता है, सम्मान-चर्चा सहित। स्थानीय चैनल और अखबार में वे छा जाते हैं। फिर उनके लिए कौन अरूण कमल, कैसे रघुवीर सहाय? ’हमें इनसे क्या’ जैसी मानसिकता के कैदी हो रहे हैं। इससे रचना संसार की समग्रता तो खंडित हो ही रही है, यह भी कि साहित्य के मूल्यांकन की स्थानीय कसौटियां बनती जा रही हैं। जैसे होता था- निमाड़ का गांधी कौन?

और आज जो भयावह चुनौती रचनात्मकता के विरूद्ध या मनुष्य -प्रेम और सत्य के खिलाफ है वह अधिनायकतंत्र की बुंलदी के साथ दिन-गश्त कर रही है। भारत उत्कर्ष-उदय के नाम पर अंधविश्वासों, झूठ और पाखंड की इंजीनिरिंग की जा रही है। धर्म, संस्कृति और विश्वास की दुहाई देती संगठित सत्ता-भीड़ भयोत्पादन कर रही है। भ्रमों का सुनियोजित व्यवस्थापन और भय का शिकार बनाने का कार्य सुरूचिपूर्ण ढंग से निष्पादित किया जा रहा है। जब एक सीमित जानदेश को संविधान से ऊपर दर्शाते हुए उसकी मनचीती व्याख्या की जाये और विष उगलने वालों पर कोई कार्रवाई न हो तब भाषा स्वतंत्र निजता और मनुष्य की गरिमा को कुचलना कितना सात्विक लगेगा, समझा जा सकता है। यह कुचली जाने वाली भाषा-स्वतंत्रता ही तो रचनाकार की प्रतिज्ञा है और इसी के लिए खतरे उठाने होते हैं।

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हम अब अंधे युग में प्रवेश कर रहे हैं। अत्यत समृद्ध रोशन और पवित्र प्रतीकों से सुशोभित बजाता-गाता, झांझ-मंजीरे, ढोल-ढाक से गूंजता अंधा युग। यह उत्तर पूंजीवादी साम्राज्यवाद का तोहफा। दुर्दिनों और काली ताकतों का दिया उपहार। ऐसी चुनौती और परीक्षा की घड़ी हमारे सामने इसके पहले नहीं थी। अभिव्यक्ति के खतरे उठाने की चरितार्थता हमारी समझ है। इतना धोखा, सत्तापीठों के झूठ-उबाच, भ्रष्टाचार और दलित-पिछड़ी-गरीब जनता का शोषण। बढ़त अपराध-हिंसा। यही चौकस होकर देखते-लिखते और बोलते रहने की प्रतिज्ञा के लिए सबसे जरूरी जमीन है। लोगों को समझाया जा रहा है कि झूठ की सच है। ऐसे में रचनाकारों में नये साथी-भाव की जरूरत है। हम गिनती के थे और देखते के देखते असख्य हो गये। पॉल एलुआर की याद आ रही है। हमारी अपनी सांस लेने की जगह ही नहीं बचेगी यदि हम सत्य और अपने लोगों के पक्ष में कविता के साथ खड़े नहीं होंगे। हमें तय करना पडे़गा निजी स्तर पर भी ऐसी पवित्र-सात्विक लगती हिंसा का हम किन रूपकों से मुकाबला करेंगे। निराशा से बचने के लिए याद रखना होगा कि सुंदर और सार्थक को बचाकर ही हम कवि-मनुष्य बचे रहेंगे। (सप्रेस)

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