बहुआयामी सुंदरलाल बहुगुणा

अरुण कुमार त्रिपाठी

दुनियाभर को चिपको आंदोलन के जरिये पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संदेश देने वाले हिमालय रक्षक कहे जाने वाले सुंदरलाल बहुगुणा हाल ही में दुनिया से बिदा हो गए। महात्मा गांधी के विचारों को आत्‍मसात करके बहुगुणाजी ने प्रकृति, पेड़, पहाड़ के संरक्षण के लिए अपने जीवन को खपा दिया। उनके द्वारा पर्यावरण रक्षा के लिये किये सुंदर कामों की छाप हमारे दिल दिमाग में हमेशा बनी रहेगी।

राष्ट्रपति स्व. ज्ञानी जैलसिंह बड़े ही मस्त एवं अल्हड स्वभाव के थे। कई अवसरों पर उन्होंने अपने सचिवालय का दिया भाषण छोड़कर मन की बात सरलता से कही। ऐसा ही एक अवसर 10 मार्च 1984 को आया जब श्री सुंदरलाल बहुगुणा को राष्ट्रीय एकता पुरस्कार देते हुए उन्होंने कहा था ’’सुंदरलाल तेरा नाम भी सुंदर है एवं काम भी सुंदर । इस जमाने में जब आदमी आदमी का कत्‍ल करने पर आमादा है तू पेड़ों को कत्ल होने से बचा रहा है।’’ ये वही सुंदरलाल बहुगुणा थे, जिन्होंने उत्तराखंड में पेड़ों को बचाने के श्री चंडीप्रसाद भट्ट, श्रीमती गौरा देवी एवं अन्य सहयोगियों द्वारा प्रारंभ किये चिपको आंदोलन को विश्व पटल पर प्रसिद्ध किया। चिपको आंदोलन के अलावा उन्होंने आजादी के आंदोलन में भाग लेने के साथ कई अन्य समाज सुधार के कार्यों हेतु संघर्ष कर सफलता पायी थी।

नाम गंगाराम से सुंदरलाल

उनका जन्म 09 जनवरी 1927 को गांव मरोड़ा (टिहरी गढ़वाल) में हुआ था। पांच भाई बहनों में सबसे छोटे होने के बावजूद उन्होंने कई बड़े कार्य किये। प्रारंभ में उनका नाम गंगाराम रखा गया था परंतु एक बहन का नाम भी गंगा होने से उनके नाम में बदलकर सुंदरलाल कर दिया था। टिहरी रियासत की स्वतंत्रता हेतु किये आंदोलन में वे अगवा रहे थे। भारत छोड़ो आंदोलन में 17 वर्ष की आयु में भाग लेने पर उन्हें गिरफ्तार कर नरेंद्र नगर की जेल में भेज दिया गया था। लगभग एक वर्ष बाद जेल से छूटकर लाहौर चले गये जो उस समय आंदोलन का एक प्रमुख केंद्र था। लाहौर में गिरफ्तारी से बचने हेतु उन्होंने सिख का वेश बनाया एवं गुरूमुखी भी सिखी। अपनी सक्रियता के कारण वे टिहरी रियासत में कोई बडा पद पा सकते थे। परंतु वे इससे दूर रहे।

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अपनी बात समझाने की क्षमता गजब की

गांधीजी एवं उनकी शिष्‍या मिस कैथरीन (भारतीय नाम सरला देवी) की जीवन शैली एवं कार्यों से वे काफी प्रभावित हुए। बहुगुणा ने भी अपना सारा जीवन सादगी एवं सरलता से बिताते हुए जो भी कार्य किए वे पूर्ण रूपेण अहिंसक ही रहे। जनता को एकत्र कर अपनी बात समझाने की गजब की क्षमता उनमें थी। जरूरी कागजात का एक थैला पीठ पर रखकर तेजी से चलने की उनकी आदत थी। लिखने की उनकी गति भी काफी तेज थी एवं अपने पास आए प्रत्येक पत्र का उत्तर वे स्वयं लिखकर भेजते थे। हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषाओं पर उनका समान नियंत्रण था।

शादी के वक्‍त ली शर्त पर अडिग रहे

हर सफल पुरूष के पीछे महिला होने वाला कथन बहुगुणा पर भी चरितार्थ होता है। गांधी जी की शिष्या सरला बहन के कौसानी आश्रम में पढ़ी विमला ने बहुगुणा से शादी के लिए यह शर्त रखी कि शादी के बाद वे राजनीति छोड़ समाज सेवा के कार्य करेंगे। इस शर्त को मानकर उन्होंने 09 जून 1956 को विवाह कर लिया। सिल्यारा गांव में स्थापित नवजीवन -आश्रम से वे समाज सेवा  कार्य करने लगे। छूआछूत विरोध तथा दलितों के मंदिर प्रवेश हेतु चलाये आंदोलन के वे प्रमुख सूत्रधार रहे।

60 एवं 70 के दशक में क्रमशः राज्य में शराब बंदी एवं जंगलों की व्यावसायिक कटाई के विरोध में चले आंदोलनों का नेतृत्व किया एवं सफलता प्राप्त की। 80 के दशक में टिहरी बांध के विरोध में लम्बा संघर्ष किया। जंगलों की व्यावसायिक कटाई के विरोध में 70 के दशक में प्रारंभ हुआ चिपको आंदोलन विश्व प्रसिद्ध हो गया। इस आंदोलन से उन्होंने पेड़ व वनों का महत्व लोगों को समझाया एवं बचाने का आग्रह किया। युवा लोगों को भी भविष्य की पर्यावरणीय समस्याओं के संदर्भ में समझाया। काश्मीर से कोहिमा तक की लगभग 5000 कि.मी. पैदल यात्रा (1981 से 83) की एवं पेड़ों को व्यावसायिक कटाई से पैदा समस्याएं एवं खतरों को समझा।

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टिहरी बांध विरोधी की छबि एवं लंबा अनशन

बाद के वर्षों में नेपाल, भूटान के साथ कई देशों की तथा अपने देश में भी कई प्रांतों की यात्रा कर चिपको का संदेश प्रचार प्रसार किया। उन्हीं की प्रेरणा से 1982 के आसपास कर्नाटक में चिपको समान अप्पिको आंदोलन शुरू हुआ था। पांडुरंग हेगडे नामक युवा ने इसमें प्रमुख भूमिका निभायी थी। उनका मानना था कि प्राकृतिक वन नदियों की मां, प्राणवायु की बैंक और उपजाऊ मिट्टी बनाने के कारखाने होते है। साथ ही पृथ्वी पर प्राणीमात्र के लिए अनिवार्य वस्तुएं मिट्टी, पानी और हवा पैदा करने वाले कारखाने पेड़ ही है ।

1995 में भागीरथी के किनारे 45 तथा राजघाट पर 74 दिन का अनशन टिहरी बांध के विरोध में किया था। वे बड़े बांधों के विरोध थे एवं नदी जोड़ परियोजना को अप्राकृतिक कार्य मानते थे । गंगा और हिमालय से उन्हें बहुत लागाव था। उनका मत था कि पर्यावरण एवं विकास की बहस के बजाए जिंदा रहने का अधिकार एवं विकास बहस का मुद्दा होना चाहिये। टिकाऊ विकास प्रकृति पर विजय करने एवं नही अपितु सामंजस्य से ही संभव है।

उनकी बिदाई से गंगा उदास एवं हिमालय मौन

उन्हें कई पुरस्कार एवं सम्मान मिले परंतु उनमें जमनालाल बजाज (1986), राइट लाइवलीहुड (1987) तथा पद्म विभूषण (2009) प्रमुख है। 1981 में उन्होंने पद्मश्री लेने से इंकार कर दिया था। एवं राइट लाइवलीहुड की पुरस्कार राशि चिपको आंदोलन को समर्पित कर दी थी। 21 मई 2021 को उनके अवसान पर इतिहासकार श्री शेखर पाठक ने बहुत सटीक एवं सामयिक लिखा कि ’’वह ऐसे समय हमसे बिदा हुए जब भोगवादी जीवन शैली व विकास के नाम पर प्रकृति के मर्दन से पैदा महामारी एवं गंगा में तैरते शवों जैसी अभूतपूर्व चुनौतियों हमारे सामने खड़ी है।’’ वास्तव में ऐसा प्रतीत होता है मानो उनकी बिदाई से गंगा उदास एवं हिमालय मौन है। (सप्रेस)

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