मध्यप्रदेश में जलाधिकार कानून: कितना सार्थक

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रेहमत मंसूरी

मध्यप्रदेश की मौजूदा सरकार ने अपने घोषणा-पत्र के मुताबिक ‘मध्यप्रदेश जल का अधिकार (संरक्षण और निरंतर उपयोग) अधिनियम-2020’ क्रियान्वित करने का तय किया है, लेकिन क्या यह कानून राज्य के आम लोगों की पानी की जरूरतों को पूरा करने में कारगर होगा? क्या इस कानून से पानी की उपलब्धता बरकरार रह पाएगी? क्या राज्य में मौजूद जलस्रोत इस कानून से संरक्षित रह पाएंगे?

मध्यप्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तावित ‘जल का अधिकार कानून’ के प्रारुप में कई कमियाँ हैं और संदेह है कि सरकार इसके माध्यम से पानी के निजीकरण का रास्ता साफ करना चाहती है, लेकिन फिर भी इसमें पानी को संपूर्ण पर्यावरण और समुदाय की आजीविका के संदर्भ में देखकर व्यापक बनाने का प्रयास अवश्य किया गया है। इस प्रारुप में ‘मंथन अध्ययन केन्द्र’ और ‘जिंदगी बचाओ आंदोलन’ जैसे समूहों द्वारा आयोजित जन-संवादों से प्राप्त निष्कर्षों पर आधारित नागरिक अधिकार एवं पर्यावरण संरक्षण संबंधी मुद्दों को भी प्रमुखता से शामिल किया गया है।

कानून की प्रस्तावना में सभी नागरिकों और अन्य जीवों को जल सुरक्षा के साथ पारिस्थितिक संतुलन और जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण हेतु कानून बनाए जाने का उल्लेख है। कानून में बुनियादी जरुरत के पानी को ’वाटर फॉर लाईफ’ कहा गया है तथा जल संसाधन को साझी विरासत और सरकार को ‘लोक-न्यासी’ (पब्लिक ट्रस्टी) मानते हुए सरकार को इसके संरक्षण का जिम्मा दिया गया है। इससे बिना किसी भेदभाव के जल-संसाधन सभी नागरिकों को उपलब्ध हो सकेगा, हालांकि यह अधिकार 55 लीटर प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन तक ही सीमित कर दिया गया है जो समझ से परे है।

दुनियाभर में, खासकर तीसरी दुनिया के देशों में पानी के निजीकरण से नागरिकों की पानी तक पहुँच बुरी तरह प्रभावित हुई है और कंपनियों का एकाधिकार कायम हुआ है। मध्यप्रदेश में भी खण्डवा और शिवपुरी में ‘पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप’ (पीपीपी) के तहत किया गया निजीकरण से जलप्रदाय का पायलट प्रोजेक्ट औंधे मुँह पड़ा है। शिवपुरी में फ्रांस की निजी कंपनी ‘विओलिया’ और ‘दोशियान’ के संयुक्त उपक्रम से सरकार को अनुबंध तोड़ना पड़ा। अनुबंध के अनुसार खण्डवा में हर दिन चैबीसों घण्टे जलप्रदाय किया जाना था, लेकिन निजी कंपनी ‘विश्वा इंफ्रा’ पिछले सात सालों में कभी 24 दिन में सात बार भी जलप्रदाय नहीं कर पाई, ‘चैबीसों घंटे-सातों दिन’ की तो जाने ही दें। इसके बावजूद सरकार ने निजी कंपनी को व्यावसायिक फायदा पहुँचाने के लिए सार्वजनिक धन से सैकड़ों करोड़ रुपए स्वीकृत कर दिए। बाद में कंपनी ने जलप्रदाय रोकने की धमकी दी तो सरकार को पुलिस के पहरे में जलप्रदाय बहाल रखना पड़ा था। आश्चर्यजनक है कि इस दुखद अनुभव के बावजूद सरकार फिर निजीकरण की पहल कर रही है। नहर तंत्रों का संचालन ‘सहभागी सिंचाई प्रबंधन कानून’ के तहत करने तथा प्रदूषकों से वसूली का सिद्धांत भी निजीकरण की ही पहल है।

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संविधान के अनुच्छेद-21 में ‘जीने के अधिकार’ के तहत जल का अधिकार बुनियादी अधिकार माना गया है। इसे सिर्फ पेयजल की जरुरतों तक ही सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि यह खेती से जुड़ी प्रदेश की 73 प्रतिशत आबादी की आजीविका का आधार है। इसी प्रकार मछुआरा, पशुपालक आदि समुदायों की आजीविका भी पानी से जुड़ी हुई है जिसे कानून के प्रारुप में मान्यता प्रदान की गई है। पेयजल के बाद दूसरी प्राथमिकता में पशुओं के लिए पानी के अलावा कृषि और पानी पर निर्भर गैर-कृषि आजीविका को रखा जाना स्वागत योग्य कदम है।

जलवायु परिवर्तन में वनाच्छादन का कम होना एक प्रमुख कारण है। इसे ध्यान में रखते हुए कानून में नदी पुनर्प्रवाह तथा पर्यावरणीय बहाव का प्रावधान रखा गया है। पर्यावरणीय बहाव में यह माना जाता है कि नदियाँ एक जीवित पारिस्थितिक तंत्र होती हैं जिनमें जलीय जीवों और वनस्पतियों के अलावा नदी किनारे का जीव जगत और समुदाय भी उसका हिस्सा होता है। नदी के पानी पर इन सबका अधिकार होता है। इसे ध्यान में रखते हुए ऐसी ‘नदी-घाटी विकास परियोजनाओं’ पर विचार किया जाता है जो नदियों का संपूर्ण पानी न रोकें बल्कि पारिस्थितिक तंत्र और समुदाय के तटीय (राईपेरियन) अधिकारों की जरुरत का पानी हमेशा नदियों में छोड़ा जाता रहे।

कानून के इस प्रारुप की खासियत है कि इसमें केवल आवश्यकता पूर्ति की बात नहीं है, बल्कि माँग प्रबंधन का प्रयास भी किया गया है। इसके लिए बड़े पैमाने पर वन और गैर-वन भूमि पर जल-संग्रहण का प्रावधान किया गया है। नागरिकों का जल अधिकार सुनिश्चित करने हेतु सरकार जल संसाधनों के संरक्षण हेतु संरक्षित क्षेत्र घोषित करेगी तथा इस क्षेत्र में जल के संरक्षण और प्रबंधन को प्राथमिकता देगी।

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इस कानून में पानी की बर्बादी रोकने, प्रदूषित होने से बचाने, रिसायक्लिंग करने और जल संरक्षण करने जैसे उपयोगकर्ताओं के कर्तव्यों के उल्लेख के साथ पानी संबंधी अपराधों को गंभीर श्रेणी का माना गया है तथा उनके लिए कठोर दण्ड के प्रावधान किए गए हैं। पानी की गुणवत्ता और उपलब्धता प्रभावित करने पर 18 माह की सजा तथा एक लाख रुपए का जुर्माना अथवा दोनों का प्रावधान है। यह अपराध दुबारा करने पर जुर्माना दुगना कर दिया जाएगा। इसी प्रकार ‘जल संरक्षित क्षेत्र’ (वाटर प्रोटेक्शन झोन) से अनधिकृत रुप से पानी लेने पर तीन वर्ष तक की सजा तथा 10 लाख रुपए तक के जुर्माने प्रावधान है। घरों में ‘वर्षा जल संरक्षण सिस्टम’ नहीं लगाने वालों पर पांच हजार रुपए का जुर्माना किया जाएगा। यदि किसी कंपनी द्वारा दण्डनीय अपराध किया जाता है तो कंपनी में जिम्मेदार व्यक्ति को दोषी माना जाएगा जिसमें आपराधिक जवाबदेही भी शामिल है। लेकिन किसी जल प्रदायकर्ता द्वारा कम गुणवत्ता का जलप्रदाय करने पर अधिकतम पांच हजार रुपए का ही जुर्माना लगाया गया है।

माँग प्रबंधन हेतु ‘जल सुरक्षा योजना’ का विस्तार से उल्लेख है जिसमें जैविक खेती से जमीन की जलधारण क्षमता बढ़ाने, फसल चक्र में बदलाव से कम पानी चाहने वाली फसलों को प्रोत्साहन, पानी की बचत करने वाली सिंचाई के साधन शामिल हैं। किसी क्षेत्र से बाहर पानी के अंतरण को निरुत्साहित करने की बात महत्वपूर्ण है जबकि वर्तमान में लगभग सारी जलप्रदाय योजनाएँ बाहरी स्रोतों पर निर्भर हैं। इसके अलावा इस खण्ड में जलस्रोतों के जलग्रहण क्षेत्र और फ्लड प्लेन से अतिक्रमण हटाने की बात करना व्यावहारिक दृष्टि से काफी मुश्किल लगता है। आधे मन से रेत खनन को नियंत्रित करने का आश्वासन भी व्यावहारिक नहीं लगता है।

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कानून को लागू करने के लिए राज्य स्तर से ग्राम पंचायत स्तर तक प्रशासकीय ढाँचे का खाका खींचा गया है। साथ ही ‘शिकायत निवारण तंत्र’ का प्रावधान भी किया गया है। कानून लागू करने हेतु वित्तीय संसाधन जुटाने हेतु निर्माण गतिविधियों पर आधा प्रतिशत उपकर लगाया जाएगा जो सीधे मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाले ‘राज्य जल प्रबंधन प्राधिकरण’ के खाते में जाएगा। नदी पुनर्प्रवाह हेतु कुछ ऐसे कार्यक्रमों की घोषणा की गई है जो वर्षों से चल रहे हैं और उनका कोई असर देखने में नहीं आया। कुल मिलाकर इस कानून में जल को समग्रता में देखते हुए उससे जुड़े तमाम प्राकृतिक संसाधनों पर विचार तो किया गया है, लेकिन इससे संबंधित मामलों में व्यावहारिकता का अभाव भी साफ दिखाई देता है। अच्छी बात यह है कि इस ड्राफ्ट में सामाजिक समूहों के माध्यम से उठाए गए मुद्दों को तरजीह दी गई है। निजीकरण के असफल प्रयोगों से सीख लेते हुए आगे बढ़ा जाए, तो बड़ी बात होगी। (सप्रेस)

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