नीलम वर्मा : विरासत को सहेजने की मुहिम

संतोष कुमार द्विवेदी

भारत में कृषि के बाद सर्वाधिक रोजगार हाथकरघा व हस्तशिल्प उद्योग उपलब्ध कराता है। आवश्यकता इसके संरक्षण के साथ ही साथ इसे मशीनी आतंक से मुक्त कराने की भी है। नीलम वर्मा अपने सीमित संसाधनों के सहारे इसी मुहिम में जुटी है।

नीलम वर्मा सच्चे अर्थों में हस्तकला खोजी यात्री और संग्रहकर्ता हैं। वे हर साल अकेली ही खुद वाहन चलाकर भारत के अलग-अलग हिस्सों में जाती हैं और कला व कारीगरी की एक से बढ़कर एक बेजोड़ चीजों का संग्रह करती हैं। उनके संग्रह में भारत की कला के विपुल वैभव का छोटा संसार देखने को मिलेगा तो विलुप्ति की कगार पर खड़ी कला के नायाब नमूने भी। नीलम बाघ पर्यटन के लिए विश्वविख्यात बांधवगढ़ में मलाया कैफे एवं हस्तशिल्प दुकान चलाती हैं। वे अहमदाबाद (गुजरात) की रहने वाली हैं। अपने जुनून को आकार देने के लिए वर्ष 2007-08 में उन्होंने बांधवगढ़ का रुख किया और तभी से बांधवगढ़ को केन्द्र मानकर वे अपने शौक व सरोकारों को अंजाम देने में जुटी हैं।

बांधवगढ़ (ताला) बस स्टैण्ड से ही अपनी सुरूचि, सौजन्यता और नयेपन की ताजगी के साथ मेहमानों को बरबस अपनी ओर खींचता है। किंतु यहां नीलम सब कुछ अपनी ही शर्तों पर करती हैं। उनके कैफे में प्रत्येक दिन सिर्फ 4 लोग नाश्ता कर सकते हैं वह भी एक दिन पहले बुकिंग कराने के बाद। यहां तला हुआ तथा मांसाहारी भोजन नहीं मिलता। उनके यहां नाश्ते में फल या दाल की चीजें तथा काॅफी और केक आदि मिलता है। 

वे साल के आठ माह बांधवगढ़ में रहती हैं तो 4 माह कला एवं शिल्प की खोज में भारत भ्रमण पर। भारत का नक्शा अपने सामने रखकर वह अपना यात्रामार्ग खुद बनाती हैं। जब जहां जितने दिन मन किया वहां उतने दिन रुकते, घूमते, मिलते-जुलते, तलाशते और खरीदते लगातार आगे बढ़ती रहती हैं। पहले वह अपनी हस्तकला खोज यात्रा ‘‘हैण्डीक्राफ्ट इन इंडिया’ किताब की रोशनी में करती थीं किंतु अब वे भारत की कला व शिल्प से संबंधित ज्ञान एवं अनुभव की खुद एक किताब बन गई हैं।

वे कहती हैं ‘‘अपने देश के भूदृश्य पर नजर दौड़ाएं तो एक तरफ हिमालय की हिमाच्छादित चोटियां हैं तो दूसरी तरफ जैसलमेर का चिलचिलाता रेगिस्तान। दक्षिण-पश्चिम में विस्तृत नीला समुद्र है तो मध्य भाग में सुंदर मैदानी हिस्से हैं। मुझे ड्रायविंग से बेहद प्यार है। मैं जब इन हिस्सों से गुजरती हूं तो एक अलग तरह के अनुभव से भर जाती हूं। यह सारा उपक्रम अपने देश को, उसकी विविधता, खूबियों और कमियों को निकट से देखने-जानने और जुड़ने का माध्यम है।’

उन्होंने यह यात्रा 2009 से शुरू की और बीते 5 वर्षों में पूर्वोत्तर को छोड़कर तकरीबन सारा हिन्दुस्तान घूम चुकी हैं। पिछले साल उन्होंने रीवा-इलाहाबाद होकर अपनी यात्रा शुरू की और 14 हजार कि.मी. ड्राइव करके मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे 5 राज्यों में घूमी। वह बताती हैं कि यात्रा के दौरान हर कोई मुझसे एक ही सवाल पूछता है आप अकेले घूमती हैं, आपको डर नहीं लगता ? जाहिर है सवाल में ही जवाब छिपा है। डर लगता तो मैं यात्रा में अकेली निकलती ही क्यों? इसके तुरंत बाद वे यह भी कहती हैं कि यद्यपि उनके सफेद बालों का उन्हें बड़ा फायदा मिलता है फिर भी वे भारत को महिलाओं के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित ही मानती हैं। खास बात यह है कि उनकी गाड़ी ने आज तक उन्हें कभी धोखा नहीं दिया। जो जगह उन्हें ज्यादा सुंदर और संभावनाशील नजर आती है वहां वे एक दो दिन ज्यादा रुकती हैं वर्ना एक स्थान के लिए दो-तीन दिन काफी होते हैं।

मशहूर कला एवं शिल्प केन्द्रों से कला- कारीगरी की वस्तुएं न खरीद कर कलाकारों, शिल्पकारों व दस्तकारों के घर-घर दस्तक देने  और सीधे उनसे कलात्मक वस्तुएं खरीदने के पीछे उनका तर्क यह है कि इसके जरिये उनका इनसे जीवंत संपर्क व संबंध बनता है। वे न सिर्फ कला और शिल्प के निर्माण की पूरी प्रक्रिया बारीकी से देख व समझ पाती हैं अपितु कला संघर्ष से भी वाकिफ होती हैं। वे इस संबंध में हैरानी व्यक्त करती हैं कि भारत समेत पूरी दुनिया का कला बाजार तो गुलजार है, लेकिन शिल्पकारों की स्थिति बेहद खराब है। वे नामालूम सी जगहों पर न्यूनतम सुविधाओं पर काम करते हैं और बेहद सस्ते दामों मे अपनी कलाकृतियां बेच देते हैं। कला-कारीगरी की वही वस्तुएं बड़े शहरों के बड़े शोरूमों में महंगे दामों में बिकती हैं।

कलाकारों के संरक्षण और प्रोत्साहन के अभाव में भारत की कई प्राचीन कलाएं अंतिम सांसे गिन रही हैं। उदाहरण के तौर पर उत्तरप्रदेश के नगीना जिले में लकड़ी की कलात्मक वस्तुएं खासकर कंघा आदि बनाने का कार्य वर्षों से कुछ परिवार कर रहे हैं। अगली पीढ़ी को इस कार्य में दिलचस्पी नहीं, लिहाजा जो लोग यह काम कर रहे हैं, उनके बाद इस कला का कोई भविष्य नहीं। इसी तरह मध्यप्रदेश के उज्जैन में एक ही परिवार पेपरमेसी व लकड़ी के बुरादे से पक्षी बनाता हैं अद्भुत कार्य है उनका। लेकिन उनकी अगली पीढ़ी भी उनके कलाकर्म से कोसों दूर है। इसका मतलब स्पष्ट है कि उनके बाद इस कला का कोई नामलेवा नहीं बचेगा। राजस्थान के अलवर जिले में कुछ सोनी परिवार पेपर स्टैंसिल पर कैंची से काटकर सुंदर सांझी बनाते हैं। यह कला भी नये लोग न खुद से सीख रहे हैं न उन्हें सिखाने की कोई जहमत उठा रहा है।

राजस्थान के ही सवाईमाधोपुर जिले में रणथंभौर के पास सामोटा गांव में काली मिट्टी से बाघ एवं अन्य जानवरों की कलाकृतियां बनाई जाती हैं। इस गांव में सिर्फ 9 परिवार हैं जो इस अद्भुत कलाकृति निर्माण के कार्य में लगे हैं? उनके बाद इसके भविष्य का क्या? वे उस्ता परिवार द्वारा ऊंट के चमड़े पर की जाने वाली सोेने की कसीदी के काम से लेकर आन्ध्रप्रदेश में वाइजेक के पास इथिकोपमा के कुछ कलाकारों का जिक्र करती हैं और बताती हैं कि वे कान के सुंदर व अत्यंत कलात्मक झुमके बनाते हैं लेकिन ऐसे टीन शेड में काम करते हैं, जहां पर एक पंखा भी नहीं है।

नीलम का मानना है कि राज्य व केन्द्र सरकारों को चाहिए कि वे ऐसी दुर्लभ कलाओं के संरक्षण के लिए आगे आएं और अलग-अलग स्तर पर कार्यशालाएं आयोजित करें जिससे कलाकारों की आजीविका समृद्ध होने के साथ ही उनकी कला अगली पीढ़ी को हस्तांतरित की जा सके। वे खुद भी एक ऐसा कलाकेन्द्र बनाना चाहती हैं जहां पर ऐसी दुर्लभ कलाकृतियां न सिर्फ संग्रहित हों अपितु वहां पर कलाकार आकर रुकें, और कला के साथ-साथ कलाकारों की नई पीढ़ी का निर्माण करें। वे कहती हैं कि ‘‘अपने ही बनाये मूल्यों और शर्तों के साथ जीने करने का खामियाजा यह है कि कभी पूरे-पूरे दिन एक भी बिल नहीं फटता, फिर भी मैं खुश रहती हूं, क्‍योंकि मैं यहां ग्रामीण जीवन जीती हूं और अपना सारा काम खुद करती हूं इसलिए मेरे खर्चे भी कम हैं। मैं यहां पर टर्नओवर बढ़ाने के लिए नहीं कुछ रचनात्मक और सृजनात्मक करने के लिए आई हूं। (सप्रेस)

संतोष कुमार द्विवेदी स्वतंत्र पत्रकार एवं सक्रिय गांधीवादी रचनात्मक कार्यकर्ता हैं।

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