एक पहल-अंधविश्वासों के खिलाफ

20 अगस्त’ : ‘नेशनल साइंटिफिक-टेम्पर दिवस’

श्याम बोहरे

कई घटनाओं को देखकर हमारे मन में कई सवाल उठते होगें। उन सवालों को दबाने की बजाय उन पर और विचार करना, उन्हें और विकसित होने देना और उनसे सीख पाना एक तार्किक तरीका है जो हमें विज्ञान सिखाता है। इससे हमें सही ज्ञान हासिल करने और अलग परंपराओं पर सवाल खड़ा करके सही बातें जानने में मदद मिलती है। इसीलिये पं. जवाहरलाल नेहरू वैज्ञानिक मानसिकता को जरूरी मानते थे। नेहरू जी कहते थे कि भूख, गरीबी, अस्वच्छता, निरक्षरता, अंधविश्वासों से भरे हुए रीति-रिवाजों और परंपराओं में अपनी समस्याओं के कारण बहुत बड़ी मात्रा में संसाधन व्यर्थ चले जाते हैं, जबकि यही संसाधन गरीबी दूर करने के काम आ सकते हैं। वे मानते थे कि इन सभी समस्याओं का हल विज्ञान के तरीकों से किया जा सकता है। हमें जिंदगी के हर मोड़ पर विज्ञान की सहायता लेना चाहिये। भविष्य विज्ञान का है और उनका होगा जो विज्ञान के प्रति दोस्ती का व्यवहार करेंगे।

लोगों की परेशानी या समस्या को – भगवान की मर्जी, भाग्य, समय अच्छा नहीं चल रहा है, गलत नक्षत्र में जन्म लेना या पिछले जनम में किये गये पापों के कारण है- समझकर उसके निदान के लिये तरह-तरह के कर्मकांड, झाड-फूंक, गंडा-धन, दान-दक्षिणा सहित कई उपाय बताकर साधु, संत, पंडित, मौलवी, ओझा आदि अपना धंधा चलाते रहते हैं। डॉ. नरेन्‍द्र दाभोलकर समाज को समझाते थे कि किसी भी घटना के पीछे कोई कारण होता है जिसका अवलोकन करके तथ्य और जानकारी जुटाकर, परीक्षण, विश्लेषण, प्रयोग करके उसे समझा जा सकता है। उसमें पैदा हुई समस्याओं का निदान किया जा सकता है। समस्याओं को समझने और उनका निदान ढूढ़ने का यह तरीका विज्ञान का तरीका है। इसलिये समाज में फैले तरह-तरह के अंधविश्वासों और शोषण के तरीकों को समझने और समझकर उन्हें दूर करने के लिये वैज्ञानिक चेतना या वैज्ञानिक द्दष्टिकोण का विकास और प्रचार-प्रसार करना जरूरी है। समाज में फैले अंधविश्वासों, पाखडों और पोगापंथ के खिलाफ काम करने के लिये नरेन्‍द्र दाभोलकर ने ‘महाराष्ट्र अंध श्रद्धा उन्मूलन समिति’ का गठन किया था। यह समिति समाज में फैले अंधविश्वासों और पाखंडों को प्रदर्शनों के द्वारा तार्किक आधार पर पेश करके सवालों और तर्कों के माध्यम से चर्चा करके उजागर कर समाज को जागरूक बनाने का काम निरंतर कर रही है। इससे परेशान होकर निहित स्वार्थों ने 20 अगस्त 2013 को सुबह-सुबह उनकी हत्या कर दी। यह उनके काम की और विचार की ही ताकत है कि ‘महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ आज भी उनके काम को जारी रखे हुये है। आज भी सप्ताह में एक बार उसी स्थान पर जहां दाभोलकर की हत्या की गई थी, अपनी गतिविधियां करते हैं। इस तरह वह अलख जगाए रखने की कोशिश करते हैं जो दामोलकर ने जलाई थी।

‘महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ एक स्वैच्छिक संगठन है जो अपनी 310 ईकाइयों के माध्यम से महाराष्ट्र के ग्रामीण और शहरी इलाकों, कर्नाटक के बेलगाम और गोवा में कार्य कर रहा है। यह संगठन विदेशी सहायता और सरकारी सहायता नहीं लेता। इसके संसाधन जनता से आते हैं जो इसे जनता का संगठन बनाते हैं। अंधविश्वासों को समाप्त करने के लिये ‘महाराष्ट्र अंधश्रद्धा उन्मूलन समिति’ निम्नलिखित उद्देश्यों को ध्यान में रखकर अनेकों गतिविधियां करती है –

1. हानिकारक अंधविश्वासों और कर्मकण्डों के खिलाफ आंदोलन खड़ा करके संघर्ष करना।

2. समालोचनात्मक सोच के माध्यम से वैज्ञानिक द्रष्टिकोण, संशयवादी प्रवृत्ति और मानवीयता का सतत् विकास करना।

3. धर्म, प्रथाओं, परंपराओं और कर्मकांडों की सकारात्मक और प्रगतिशील समीक्षा और समालोचना करते रहने की प्रवृत्ति विकसित करना।

4. सामाजिक परिवर्तन में संलग्न उदारवादी प्रगतिशील संगठनों के साथ सहभागिता।

सीमित संसाधनों के बावजूद समिति‍ अधिक-से-अधिक स्थानों और लोगों तक पहुंचने की कोशिश में लगी है। स्थाई शैक्षिक परिसर बनाने के स्थान पर उसने मोबाईल वेन विकसित की है जो दूर-दराज के इलाकों में जाकर गतिविधियां करती है। इस मोबाईल वैन को ‘विज्ञान बोध वाहिनी’ कहते हैं। ‘विज्ञान बोध वाहिनी में’ एक पुस्तकालय, जिसमें अंधविश्वासों को दूर करने सबंधित पुस्तकें और पोस्टर होते हैं, रहता है। इसी के साथ पर्यावरण, स्वास्थ्य और प्रारंभिक विज्ञान की किताबें और पोस्टर भी होते हैं। उसमें आकाश दर्शन के लिये टेलिस्कोप, ऑडियो-वीडियो सीडी, डीवीडी आदि वीडियो उपकरण रहते हैं।

‘महाराष्‍ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ के सदस्य पहले से योजना बनाकर स्कूलों और बस्तियों में जाकर फिल्म प्रदर्शन और तरह-तरह के प्रयोग करके चर्चा करते हैं। ‘आकाश प्रदर्शन’ के लिये प्रसिद्ध वैज्ञानिक जयंत नार्लीकर के मार्ग-दर्शन में मोड़कर रखा जा सकने वाला (फोल्ड करके) प्लेनेटोरियम (तारामंडल) होम तैयार किया गया है जिसे एक वैन में रखकर जगह-जगह जाकर ‘आकाश दर्शन’ किया जाता है। वर्ष 2017 में प्रसिद्ध भौतिक शास्त्री अशोक सेन ने अपने ‘त्रिवेणी ट्रस्ट’ से एक नया डिजिटल तारा मंडल (प्लेनेटोरियम) प्रदान कराया था जिसे स्कूल के हजारों बच्चों तक ले जाया गया। इस तरह के अनेकों कार्यक्रमों के द्वारा अंधविश्वासों पर से पर्दा उठाकर वैज्ञानिक चेतना का प्रचार-प्रसार किया जाता है।

वैज्ञानिक चेतना की लड़ाई गहरी है, जाहिर है, लंबी भी होगी। इसलिये इसे निरंतर करते रहना जरूरी है। नरेन्‍द्र दाभोलकर का जो काम अधूरा रह गया है उसे पूरी शिद्दत से ही अंजाम दिया जा सकता है। यह काम भले ही कठिन नजर आता हो, लेकिन इस विचार में कुछ तो है कि नरेन्‍द्र दाभोलकर की हत्या करके भी उसे रोका नहीं जा सका। उनके काम को जारी रखने के लिये ‘ऑल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क’ ने नरेन्‍द्र दाभोलकर के शहीद में दिवस ‘20 अगस्त’ को ‘नेशनल साइंटिफिक-टेम्पर दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय किया है।(सप्रेस)

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