नर्ईदिल्ली, 21 अप्रैल। स्वास्थ्य अधिकार मंच पिछले 15 वर्षों से भारत में अनैतिक क्लिनिकल ट्रायल के मुद्दे को लगातार उठाता रहा है। वर्ष 2012 में इसे लेकर उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसमें देश में क्लिनिकल ट्रायल के लिए मजबूत कानूनी और नियामकीय ढांचे की कमी को उजागर किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और आदेशों के बाद कई महत्वपूर्ण सुधार लागू किए गए। इनमें एथिक्स कमेटियों का अनिवार्य पंजीकरण, सूचित सहमति की प्रक्रिया को मजबूत करना (जिसमें सहमति की वीडियो रिकॉर्डिंग) शामिल है। नई औषधियां एवं नैदानिक परीक्षण (एनडीसीटी) नियम, 2019 अधिसूचना में मृत्यु और गंभीर प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्टिंग के स्पष्ट दिशा-निर्देश तथा क्लिनिकल ट्रायल की स्वीकृति के लिए सख्त और बहु-स्तरीय प्रणाली शामिल हैं। हालांकि, इन सुधारों के बावजूद स्वास्थ्य अधिकार मंच ने कार्यान्वयन में गंभीर खामियों और उल्लंघनों की ओर ध्यान दिलाया है। प्रमुख चिंताओं में एचपीवी वैक्सीन को उचित सूचित सहमति प्रक्रिया के बिना लागू किया जाना, अहमदाबाद में क्लिनिकल ट्रायल के संचालन में धोखाधड़ी का आरोप और क्लिनिकल ट्रायल से जुड़े मृत्यु और गंभीर स्वास्थ्य दुष्परिणाम की घटनाओं में बढ़ोतरी शामिल है।
स्वास्थ्य अधिकार मंच ने न्यायालय में सरकार द्वारा प्रस्तुत जानकारी, सूचना के अधिकार से मिले जवाबों और राज्य सभा में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा दिए गए उत्तरों पर आधारित निष्कर्षों के अनुसार वर्ष 2005 से जुलाई 2025 के बीच कुल 8205 मौतें और 37,711 गंभीर शारिरिक दुष्परिणाम की घटनाएं दर्ज की गई है। इस प्रकार कुल 45,916 मामले सामने आए हैं। अर्थात प्रतिदिन एक से अधिक मौतें और पांच से अधिक शारीरिक दुष्परिणाम दर्ज हुई है।
चिंताजनक बात यह है कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार प्रभावित व्यक्तियों या उनके परिवारों के केवल एक छोटे हिस्से को ही मुआवजा मिला है, जिससे मुआवजा प्रणाली की पारदर्शिता और प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख और अधिवक्ता अभिमन्यु श्रेष्ठता इस मामले में स्वास्थ्य अधिकार मंच की ओर से पैरवी कर रहे हैं, ने कहा कि वर्तमान नियमों के बावजूद कई महत्वपूर्ण कमियां बनी हुई हैं। उन्होंने प्रतिभागियों की भर्ती प्रक्रिया, मुआवजा तंत्र की कमजोरी और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के कमजोर क्रियान्वयन को प्रमुख समस्याएं बताया।
वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने कहा कि जब यह याचिका दायर की गई थी, तब प्रतिभागियों को “गिनी पिग” की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था, जैसा कि 59वीं संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट में भी उल्लेखित है। उन्होंने बताया कि आंध्र प्रदेश और गुजरात में एचपीवी वैक्सीन ट्रायल के दौरान 7 किशोरियों की मौत हुई, लेकिन अब तक न तो जवाबदेही तय हुई और न ही प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा मिला।
स्वास्थ्य अधिकार मंच ने निम्नलिखित गंभीर मुद्दों को भी उठाया है जैसे कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च ऑर्गनाइजेशन जो बहुराष्ट्रीय फार्मा कंपनियों की ओर से काम करते हैं, गरीब और कमजोर वर्गों को ट्रायल में शामिल करते हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त सुरक्षा और मुआवजा नहीं मिलता है। ट्रायल प्रतिभागियों की भर्ती को लेकर स्पष्ट नियमों का अभाव है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनिवार्य की गई सूचित सहमति की वीडियो रिकॉर्डिंग को कमजोर कर केवल “संवेदनशील वर्गों” तक सीमित कर दिया गया है याचिका में कई स्थानों पर हुए कथित अनैतिक ट्रायल के उदाहरण भी प्रस्तुत किए गए हैं। जिसमें इंदौर में 81 मौतें और गंभीर घटनाएं शामिल है। आरोप है कि 6 डॉक्टरों ने 5 करोड़ रुपये से अधिक कमाए हैं। जिसका केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन द्वारा स्वतंत्र जांच नहीं हुआ है और मुआवजा भी लंबित है। भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों पर ट्रायल हुआ है जिनमें 22 मौतें दर्ज की गई है। जयपुर के मालपानी अस्पताल में अनैतिक ट्रायल, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं होने का मामला सामने आया है।
अहमदाबाद के वीएस अस्पताल में बिना उचित एथिक्स कमेटी के ट्रायल और आशीर्वाद अस्पताल में मरीजों के रिकॉर्ड में हेरफेर और बिना जानकारी के ट्रायल में शामिल करने के आरोप भी न्यायालय के संज्ञान में लाया गया है। जबकि स्वास्थ्य अधिकार मंच ने उपरोक्त सभी बिंदुओं के जांच की मांग के साथ एचपी वैक्सीन के चौथे चरण का ट्रायल बिना सूचित सहमति के किये जाने पर केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को पत्र लिखा है। न्यायालय ने इन सभी मुद्दों को संज्ञान में लिया है और अगली सुनवाई में क्लिनिकल ट्रायल नियम 2019 की खामियों सहित अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किया जाएगा।
स्वास्थ्य स्वास्थ्य अधिकार मंच द्वारा जारी विज्ञप्ति में ड्रग ट्रायल पीड़ित सोहन लाल, प्रदीप गहलोत और अमूल्य निधि ने कहा कि क्लिनिकल ट्रायल में जवाबदेही और पारदर्शिता को मजबूत करने, मौजूदा नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने, प्रतिभागियों के अधिकारों की रक्षा और वास्तविक सूचित सहमति सुनिश्चित करने और मुआवजा प्रणाली को निष्पक्ष, समयबद्ध और पारदर्शी बनायें जाने की मांग किया है।
संजय पारिख ने सर्वोच्च न्यायालय से आग्रह किया कि न्यायालय द्वारा दिखाई गई चिंता के कारण ही सरकार ने 2019 के क्लिनिकल ट्रायल नियम बनाए। उसी तरह, यदि इन नियमों में मौजूद कमियों को भी उसी गंभीरता से दूर किया जाए, तो यह अत्यंत गरीबी और अशिक्षा में जीवन यापन करने वाले हजारों लोगों की जान बचा सकता है।
स्वास्थ्य अधिकार मंच की ओर से अमूल्य निधि ने सरकार से अपील की है कि इन गंभीर मुद्दों पर तत्काल कार्रवाई की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि चिकित्सा अनुसंधान के नाम पर जनस्वास्थ्य, नैतिकता और मानवाधिकारों से कोई समझौता न हो।


