इन दिनों जारी ‘चार धाम यात्रा’ में तीर्थयात्रियों की संख्या में भारी कमी महसूस की जा रही है। क्या इसकी वजह यात्रा के बढ़ते वे खतरे तो नहीं हैं जो सीमा से ज्यादा यात्रियों ने हाल के वर्षों में खड़े किए हैं? क्षमता से अधिक तीर्थयात्री अपनी सुविधाओं की हवस में तापक्रम, कचरा, गंदगी आदि में भारी बढौत्री करते हैं और नतीजे में हिमालय दिन-ब-दिन बदहवास होता जा रहा है। क्या हैं, हिमालय की बिगड़ती हालातों की वजहें? बता रहे हैं, वीरेन्द्र कुमार पैन्यूली।–संपादक
केदारनाथ समुद्र तल से करीब 11,750 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। मंदाकिनी नदी इसकी सीमा पर है। वर्ष 2026 के 22 अप्रैल को केदारनाथ धाम के कपाट खुलने के ग्यारह दिन पहले मंदिर के पीछे के ग्लेशियल क्षेत्र से भारी भूस्खलन हुआ है। गौरीकुंड से केदारनाथ तक के पैदल मार्ग में आती बाधाओं को दूर किया जा रहा है। वर्ष 2024 के 30 जून को केदारनाथ मंदिर के दर्शन के लिए आये श्रध्दालुओं ने पांच बजे सुबह बर्फ की बौछार मंदिर के पीछे गांधी सरोवर के क्षेत्र में देखी। कुछ का कहना था कि उन्हें लगा बर्फ के पहाड़ ही टूट गये हों। वर्ष 2022-23 में भी कहते हैं ऐसा हुआ था। जून-जुलाई 2024 का संदर्भ हो या आज का अथवा केदारनाथ महा त्रासदी 2013 का, केदारनाथ पैदल मार्ग के पास के क्षेत्रों में पारिस्थितिकीय जोखिमों में बढ़ौत्री ही हो रही है।
31 जुलाई 2024 को लिंचैली जंगल चट्टी के ऊपर बादल विस्फोट से लिंचैली व भीमबली में बेहद खौफनाक मंजर दिखा था। केदारनाथ से गौरीकुंड के बीच हजारों यात्री फंसे हुये थे। लिंचैली में फंसे यात्री ज्यादा मुसीबत में थे क्योंकि न सिर्फ मंदाकिनी नदी, बल्कि बगल के पहाड़ से आता नाला भी पानी के साथ मलवा ला रहा था। ऐसी घटनाओं को आम कहने का प्रचलन बहुत बढ़ गया है। पूरा तंत्र ऐसे बयान देने लगता है। यदि ये सामान्य हो गई हैं, तो जलवायु बदलाव के दौर में केदारनाथ धाम की सुरक्षा के लिये विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत है, लेकिन अब इतनी सुविधायें जुटा ली गई हैं कि प्रतिदिन वहां बीस-पच्चीस हजार यात्री समा सकते हैं। इतने ही रास्तों पर भी रहते हैं। इससे सीमित क्षे़त्र में हजारों इंसानों की उपस्थिति व गतिविधि से ‘हीट आइलैंड्स’ बनने की संभावनायें बढ़ी हैं। खुद यात्री कहते हैं अब तेज धूप झेलना मुश्किल होता है।
पता नहीं केदारनाथ के तापक्रम परिवर्तन पर अलग से अध्ययन हुये हैं कि नहीं, किन्तु पूरे हिंदुकुश हिमालय पर ही जलवायु बदलाव के खतर बढ़े हैं। पश्चिमोत्तर हिमालय में 1991 के बाद औसत तापमान 0.66 डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ गया है। हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की दर दुगुनी हो गई है और पहाड़ बर्फ-विहीन हो रहे हैं, परन्तु केदारनाथ जैसी जगहों के आसपास यदि ये होता है तो हम वैश्विक वजहों से इसे होना नहीं कह सकते। वैश्विक कारणों के साथ उन पर स्थानीय आघाती कारण भी जुड़ रहे हैं। फरवरी 2021 में नीति घाटी में ग्लेशियर टूटने से धौली गंगा में भारी बाढ़ आई थी।
केदारपुरी जिस भूखण्ड में बसी है उसके नीचे हिमोड और भूस्खलनों का मलवा है। इस क्रम में यहां के ‘ड्रैनेज पैटर्न’ पर भूमिगत जल-प्रवाह, भण्डारित जलराशि की स्थिति व ‘सरफेस रनऑफ’ के पैटर्न व आंकड़ों का अध्ययन करिये। इन विश्लेषणों से समझा जा सकता है कि भू-धंसाव के जोखिम के बीज तो यहां ही जम रहे हैं। तेज बारिश में तात्कालिक रिसाव से भले ही बच जायें, परन्तु जमीन में जल का रिसाव भूमिगत मिटटी, चटटानों की दरारों, अपभ्रंशों आदि की मार्फत कमजोर करता है। ऐसे में भूस्खलन व भू-धंसाव की समस्या बढ़ जाती है।
हेलीकॉप्टरों की आवाजाही भी यहां काफी हो रही है, निर्माण कार्यों का भार भी बढ़ रहा है। भूकम्प सक्रिय क्षेत्र तो यह है ही। सेवानिवृत्त मेजर जनरल भुवनचंद्र खंडूरी मुख्यमंत्री से पहले एक विशेषज्ञ इंजीनियर थे। महाआपदा के बाद सितम्बर 2013 में जब कांग्रेस की राज्य सरकार ने ‘केदारनाथ विकास प्राधिकरण’ बनाने की मंशा जाहिर की तो उन्होंने इस पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि 2008 में उनकी सरकार ने केदारनाथ, बदरीनाथ के आसपास निर्माणों पर पूरी तरह रोक लगा दी थी।
जरूरत यह भी है कि मंदाकिनी नदी के ‘फ्लड-जोन’ से छेड़छाड़ न हो। यह हिम-पोषित नदी है। दिसम्बर, जनवरी, फरवरी में गिरी बर्फ इसके लिये महत्वपूर्ण होती है। इसे बरसात, हिमनद और पिघलती बर्फ सभी से पानी मिलता है, किन्तु इसमें ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट’ से जोखिम भी पैदा हो रहे हैं।
उत्तराखंड में ग्लेशियरों का स्वास्थ्य अच्छा नहीं रह गया है। पगडंडी मार्गों पर हिमस्खलन का जोखिम हर साल बढ़ रहा है। लगभग हर साल ही पुराने पैदल मार्ग को चालू करने की तैयारियों के साथ मार्ग के हिमस्खलनों से सतर्क रहने की आधिकारिक चेतावनी भी आ जाती है। ऐसी चेतावनियों से कहीं श्रध्दालुओं की आमद कम न हो जाये, इसलिये लोग राहों पर हिमनदों के टुकड़ों के जोखिमों को अब सामान्य भी कहने लगे हैं, किन्तु तथ्य है कि ग्लेशियरों के टूटने की ही तरह ग्लेशियरों का फिसलकर बस्तियों व मोटर मार्गों या ट्रैकिंग राहों में आकर जान-माल का नुकसान करना पूरे भारत में बढ़ा है। मार्च 2021 में पिथौरागढ़ में ही दारमा घाटी में ऐसा हो चुका है।
चार अप्रैल 2023 को उत्तरपूर्वी सिक्किम में जवाहरलाल नेहरू हाइवे पर, जो राजधानी गंगटोक व चीन सीमा पर स्थित नाथूला दर्रे व लोकप्रिय पर्यटन स्थल नाथूला को भी जोड़ता है, सुबह ग्यारह बजे पहुंचे ग्लेशियर ने 35 पर्यटकों व उनके वाहनों को चपेट में ले लिया था और सात पर्यटकों की मृत्यु हो गई थी। जलवायु बदलाव के कारण आज ऊंचाइयों में भी हिमपातों की जगह बरसात हो रही है। जून 2013 की आपदा की बात करें तो उत्तराखंड के संदर्भ में वह शुरुआती मानसून ही था। केदारधाम जैसे हिमालयी क्षेत्रों में लगातार हेलीकोप्टरों की उड़ानों व भूकम्पकीय झटकों से ताजी बर्फ के फिसलाव व टूटन का खतरा तो रहेगा ही।
केदारघाटी में जगह-जगह सड़कों पर भूस्खलन ही नहीं, भू-धंसाव, मलवा फिसलाव व भू-कटाव के जोन भी बने हैं। जुलाई-अगस्त में ये काफी सक्रिय हो जाते हैं। ऐसे में बंद रास्तों को खोलने के लिये मलवे को हर बरसात में नदी में इसी तरह उड़ेला जाता रहा तो मंदाकिनी राह बदल सकती है। पहले भी ऐसा हो चुका है। अगस्त 2024 में भीमबली एयरपोर्ट के पास पहाड़ी में हुये भारी भूस्खलन से मंदाकिनी में जलप्रवाह रूक गया था। इससे वहां एक झील ने आकार ले लिया था, हालांकि धीरे-धीरे स्वतः झील से नदी जल के बाहर निकलने से खतरा टल गया था, किन्तु झील टूटने से जान-माल की क्षति न हो इसलिये गौरीकुण्ड से रूद्रप्रयाग तक नदी के किनारे रहने वालों को अलर्ट कर दिया गया था।
उन पहाड़ियों की दरारों में, जिन पर मलवा टिका है, बरसाती पानी के घुसने से फैलाव आ जाता है। दरार के खण्डित भूखण्डों का टूटना तेज हो जाता है। परिणामस्वरूप भूस्खलन व मलवा बिखराव पुनः प्रारंभ हो जाता है। ऐसे में वैज्ञानिकों की राय से बरसाती जल की उचित ड्रैनेज व्यवस्था बनाना जरूरी है। जलवायु बदलाव के कारण शीतकालीन वनाग्नियां पूरे उत्तराखंड की ही तरह केदारनाथ सेंक्चुरी क्षेत्र में भी बढ़ी हैं। केदारनाथ में वन्यजीवों का संवेदी उच्च हिमालयी क्षेत्र लगभग दस हजार वर्ग किलोमीटर्स का है। केदारपुरी के समीप का यह क्षेत्र बचा ही रहना चाहिये, किन्तु व्यवसायिक हवाई मार्गों और अतिशय हवाई उड़ानों को इनके ऊपर से गुजरना पारिस्थितिक जोखिमों को बढा रहा है।
मई 2023 की शुरूआत में दो दिन में तीन हिमस्खलनों से ये मार्ग बाधित रहा था। केदारनाथ पैदल मार्ग से कई-कई फीट मोटी बर्फ को काटकर हटाना पड़ता है। अक्सर इन्हें नीचे खाइयों में ढ़केल दिया जाता है। भैरव व कुबेर ग्लेशियरों के क्षेत्र में ये हिमस्खलन ज्यादा होते हैं और तब यात्रियों को पैदल मार्ग पर न चलने को कहा जाता है। केदारनाथ जैसी जगहों में बादल विस्फोट बड़ी समस्या होती जा रही है। साथ ही नये-नये लैंडस्लाइडस जोन बने हैं इसलिये ‘फ्लैश फ्लड्स’ में अब ज्यादा नुकसान होगा।
एक मौसम वैज्ञानिक के अनुसार यदि बादल विस्फोटों की चेतावनियां दी भी जा सकें तो उन पर अमल के लिये दो-तीन घंटों का ही समय मिलता है। इसके अलावा पहाड़ी ढलानों में पानी व मलवा के बहाव में तेजी होती है। वर्ष 2013 की केदार आपदा के प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार चंद सेकेण्डों में ही रामबाड़ा में मकान, आदमी, वाहनों, जानवरों को बाढ़ बहा ले गई थी। जब बरसात में पहाड़ी गदेरे उफनते हैं तो वे भी तबाही मचाते हैं। 2013 की केदार आपदा के बाद ‘एनडीएम’ की वार्षिक रिपोर्ट में महत्वपूर्ण सुझाव था कि संवेदनशील इलाकों में बड़ी जल-विद्युत परियोजनाओं के ‘इनवायरमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट’ के साथ ‘डिजास्टर इम्पैक्ट असेसमेंट’ भी आवश्यक होना चाहिये। ‘लैंडस्लाइड्स रिस्क जोन मैंपिंग’ भी पूरा करने की बात की गई थी। कमजोर और ढलान वाले इलाकों में सुधार करना चाहिए जिसकी वैज्ञानिक तकनीकें राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध हैं। वैज्ञानिक तरीकों से नये मार्गों का निर्माण व पुनरोद्धार किया जाये। तथ्य यही है कि केदारनाथ के निकटस्थ परिवेश के प्रति संवेदित रह कर ही केदारनाथ धाम यात्रा के जोखिम कम होंगे। (सप्रेस)