India US trade deal : कृषि व्यापार में अमरीका के सामने घुटने टेकने की तैयारी

योगेन्द्र यादव

अमरीका भारत से जीएम फसलों पर प्रतिबंध हटाने और कृषि शुल्क कम करने का दबाव बना रहा है, ठीक उसी समय नीति आयोग का दस्‍तावेज इन मांगों को स्वीकार्य रूप में पेश करता है। जीएम फसलों और सस्ती मक्का के आयात से देश के किसानों की आमदनी कैसे बचेगी, बल्कि उल्टे यह ‘व्यावसायिक सहयोग’ को प्राथमिकता देती नीति की ये दस्तक है। एक तरफ अमरीकी धमकी, दूसरी तरफ भारत सरकार की नीति इकाई का कथित ‘स्वतंत्र विश्लेषण’ — यह संयोग नहीं, गहरी रणनीतिक जुगलबंदी की झलक है।

वाह, क्या जुगलबंदी है! अमरीका के साल चल रही व्यापार वार्ता के कृषि वाले पक्ष पर नीति आयोग के पेपर को  पढ़कर मेरी पहले प्रतिक्रिया यही थी। उधर अमरीकी सरकार घुड़की देती है कि भारत अमरीका से अपने कृषि आयात पर शुल्क कम करे, वरना … ! इधर भारत के ही सरकारी एक्सपर्ट बताते हैं की अमरीकी कृषि आयात पर शुल्क कैसे कम किया जाए। उधर अमरीका दबाव डालता है कि जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) सोयाबीन और मक्का के आयात पर लगी पाबंदी को भारत सरकार हटाए। उधर भारत सरकार के ही अफ़सर ही भारत में जीएम पर लगी पाबंदी को गच्चा देने के बहाने ढूँढ रहे हैं। दोनों का तालमेल इतना गहरा है कि शक होता है — कहीं दोनों के तर्क और पैसे एक ही स्रोत से तो नहीं आ रहे?

कहने को नीति आयोग द्वारा इस हफ़्ते प्रकाशित ‘वर्किंग पेपर’ दो एक्सपर्ट के निजी विचार हैं। लेकिन अगर उसके लेखक राका सक्सेना के साथ नीति आयोग के सदस्य और मोदी सरकार की कृषि नीति के निर्माता डॉ रमेश चंद हों, तो इन विचारों में कुछ भी निजी नहीं है। और अगर अमरीका से व्यापार डील की मियाद पूरी होने से कुछ ही दिन पहले “प्रमोटिंग इंडिया-यूएस एग्रीकल्चर ट्रेड अंडर द न्यू यूएस ट्रेड रेजीम” (अमरीका की नई व्यापार नीति के तहत भारत अमरीका कृषि व्यापार संवर्धन) विषय पर नीति आयोग की वेबसाइट पर कोई शोध पत्र प्रकाशित हो तो यह शोध का मामला नहीं है बल्कि भारत सरकार की औपचारिक नीति की अनौपचारिक घोषणा है। या फिर संबद्ध पक्षों की प्रतिक्रिया भांपने का तरीका है। जो भी हो, एक बात साफ़ है। इस पेपर के माध्यम से भारत सरकार यह प्रस्ताव रख रही है कि वो आगामी व्यापार समझौते में अमरीका सरकार की कृषि से संबंधित मांगों को मानने के लिए तैयार है।

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मामला सीधा है। पिछले कई साल से अमरीका के कृषि उत्पाद को चीन ने ख़रीदना कम किया है। नतीजतन अमरीका की नज़र अब भारत के कृषि बाज़ार पर है। पिछले साल अमरीका के कृषि मंत्रालय ने भारत के मांस उद्योग पर रिपोर्ट में लिखा था कि आने वाले कुछ साल में भारत में चिकन फीड और सूअर को खिलाने के लिए सोयाबीन और मक्का की माँग बढ़ेगी। यह अमरीका के लिए अपने सोयाबीन और मक्का को निर्यात करने का अच्छा मौक़ा  है, बशर्ते भारत सरकार इस पर शुल्क घटा दे और जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों पर लगी पाबंदी हटा दे। इस साल भारत और अमरीक के बीच व्यापार समझौता करने के लिए उच्च स्तरीय वार्ता भी हो चुकी है। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने जवाबी शुल्क की अपनी घोषणा को 90 दिन के लिए रोका था। यह मियाद 9 जुलाई को पूरी हो रही है।


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अब इस रौशनी में आप नीति आयोग के पेपर को देखिए। पहले 23 पृष्ठ तक बड़े प्रोफेशनल अंदाज़ में भारत के कृषि निर्यात की दशा और दिशा का मूल्यांकन किया गया है, भविष्य की चुनौतियों का विश्लेषण किया गया है। लेकिन फिर लगता है मानो रिपोर्ट लिखते-लिखते कहीं से फ़ोन आ गया हो। अचानक कृषि आयात को एक पृष्ठ में निपटाकर लेखक निष्कर्ष और सुझाव पर उतर आते हैं। शुरू के मूल्यांकन का निष्कर्ष से कोई संबंध नहीं। विश्लेषण है निर्यात का, सिफारिश हैं आयात के बारे में। नीति आयोग का काम है भारत के हितों की रक्षा, लेकिन यह पेपर अमरीका की वकालत करता दिखाई देता है।

कुल मिलाकर नीति आयोग मजबूरी का तर्क पेश करता है —  चूँकि अमरीका भारत के खाद्य उत्पाद के लिए एक बड़ा बाज़ार है, इसलिए हमे अमरीका में निर्यात के लिए ‘अनुकूल माहौल’ बनाये रखने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए। हालाँकि इसी रिपोर्ट के आंकड़े इस मजबूरी की पुष्टि नहीं करते। भारत के कुल कृषि निर्यात का 10 प्रतिशत भी अमरीका नहीं खरीदता, जबकि ग़ैर कृषि पदार्थों के निर्यात का 18 प्रतिशत अमरीका ख़रीदता है। इस खोटे तर्क के आधार पर यह पेपर सिफारिश करता है कि भारत सरकार अमरीकी सोयाबीन और मक्का के आयात को रियायत दे। ऐसे में जीएम वाली अड़चन का क्या करें? नीति आयोग का पेपर उससे पार पाने की जुगत बताता है। सोयाबीन का आयात करने की बजाय सोयाबीन के तेल का आयात करें, या फिर सोयाबीन का आयात कर उसका इस्तेमाल सिर्फ तेल निकालने के लिए करें।

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इसी तरह अमरीका की सस्ती मक्का का आयात करें लेकिन उसका इस्तेमाल सिर्फ बायोफ़्युअल के लिए करें। अमरीकी सेब, बादाम और पिस्ता जैसे आयात में जीएम की अड़चन भी नहीं है, बस अमरीका के कहे अनुसार आयात शुल्क घटा दें। चावल और काली मिर्च में आयात शुल्क घटाने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। अमरीका भी ख़ुश हो जाएगा, हमारा नुक़सान भी नहीं होगा। ज़ाहिर है, यह सिर्फ़ सुझाव नहीं हैं, सरकारी नीति में बदलाव की आहट है। इसी 30 मई को भारत सरकार सोयाबीन और अन्य खाद्य तेल पर आयात शुल्क 20 से घटाकर 10 प्रतिशत कर चुकी है। यह रिपोर्ट अब उसे घटाकर जीरो करने की भूमिका बांध रही है।

नीति आयोग के विशेषज्ञ एक सवाल नहीं पूछते — कृषि बाज़ार अमरीकी आयात के लिए खोल देने का भारत के किसान पर क्या असर होगा? सोयाबीन का आयात करने से पहले ही झटका खाये मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे प्रदेश में सोयाबीन किसान को अपनी फसल का दाम कैसे मिलेगा? पंजाब से लेकर बंगाल तक फैली मक्का का दाम गिरने से किसान को कैसे बचाया जाएगा? अगर जीएम सोयाबीन और मक्का किसी भी बहाने से देश में आए तो क्या उसे भारतीय खेती में फैलने से रोका जा सकेगा? अमरीका के लिए शुल्क घटाने से कुछ फसलों पर असर नहीं होगा, लेकिन क्या इसका असर उन फसलों के अन्य देशों के साथ हो रहे समझौते पर नहीं पड़ेगा? दूध, दूध उत्पादों तथा मुर्गे को इस व्यापार की मार से कैसे बचाया जा सकेगा? लेकिन शायद यह चिंता नीति आयोग के मानसपटल से बाहर है। यह सवाल किसान आंदोलन को पूछना होगा।

गौरतलब है कि जब-जब राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रुकवाने का दावा किया है, हर बार युद्ध के बदले में ‘ट्रेड डील’ का जिक्र किया है। वैसे डोनाल्ड ट्रम्प का सच बोलने से कोई रिश्ता नहीं है। लेकिन अमरीका और भारत की ट्रेड डील के पीछे कहीं कोई गहरी जुगलबंदी तो नहीं है?

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