भाषा हमें स्मृतिलोप से बचाती है, वह हमारी स्मृतियों को जीवित रखती है

भाषा- शिक्षा, माध्यम और चुनौतियां विषय पर संगोष्ठी

देवास, 6 जनवरी। म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन की देवास इकाई के एक प्रतिष्ठापूर्ण आयोजन में भाषा- शिक्षा, माध्यम और चुनौतियों पर बात करते हुए संस्कृत और हिन्दी के ख्यात भाषा शास्त्री राधावल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि भाषाएँ एक-दूसरे को पोसती है। जितनी ज़्यादा भाषाएँ सीखेंगे, उतने ज़्यादा हम मनुष्य हो सकेंगे। मनुष्य की सभ्यता भाषा से ही विकसित हुई है, जो देश अपनी भाषा को महत्त्व देते हैं, वे ज़्यादा विकास करते हैं। हमारे देश में आदिकाल से कई भाषाएँ बोली जाती रहीं और उन्होंने एक दूसरे को समृद्ध किया। यह तथ्य गलत है कि संस्कृत आदि भाषा है और उससे दूसरी भाषाएँ निकलीं। भाषा हमें स्मृतिलोप से बचाती है, वह हमारी स्मृतियों को जीवित रखती है। इसके लिए उन्होंने गेब्रियल गार्सिया मार्ख़ेस की फंतासी का उल्लेख किया।

राज्यसभा टीवी के संस्थापक सम्पादक तथा पत्रकार राजेश बादल ने संगोष्ठी में अपनी बात रखते हुए कहा कि जब से हमने अपनी मातृभाषा से परहेज करना और बोलियों को हेय समझना शुरू किया तब से ही हमारे विचार कमतर होने लगे। सैकड़ों सालों से हमारे समाज में ऐसे-ऐसे विचारवान लोग रहे कि उन्होंने देश-दुनिया को अपनी अवधारणा और काम से चौंकाया, लेकिन इधर हमने अपनी भाषा और बोलियों को खोया और विचार के स्तर पर भी दरिद्र होते गए। हमने किताबों से दूरी बना ली। यहाँ तक कि पूरे मीडिया जगत से पढ़ने-लिखने की आदत ही ख़त्म हो गई। विद्यार्थी पाठ्यक्रम से इतर पढ़ नहीं रहे। घरों में किताबें पढ़े जाने की जगह मोबाइल और टीवी ने ले ली। भाषा और विचार साथ-साथ आगे बढ़ते हैं, इनमें से कोई एक आगे-पीछे नहीं हो सकता। भाषा और विचार साथ-साथ आगे बढ़ते हैं, इनमें से कोई एक आगे-पीछे नहीं हो सकता।

विशिष्ट अध्ययन रखने वाले भाषाविद डॉ. संजीव जैन ने रोचक ढंग से अपनी बात कहते हुए बताया कि भाषा को सरल करने की जगह उसे जटिल बनाना होगा। जटिलता और मनुष्य के मस्तिष्‍क का गहरा सम्बन्ध है। भाषा का उसके बोलने-समझने वालों पर सामाजिक प्रभाव तो पड़ता ही है, सेहत से जुड़े प्रभाव भी पड़ते हैं। उन्होंने भाषा के मनोवैज्ञानिक पक्ष पर भी बात करते हुए कहा कि हमारे समाज में बढ़ती हुई हिंसा और अन्य अपराधों के लिए हमारी भाषा ही जिम्मेदार है। भाषा के सही अर्थों में उपयोग से हम एक नयी दिशा दे सकते हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि भाषा के रूढ़ अर्थों से हमें आगे आना पड़ेगा, भाषा और व्याकरण को नए नज़रिये से समझने की ज़रूरत है। जैसे भाषा की अवधारणा में स्त्री और पुरुष विलोम है, जबकि यथार्थ में वे एक-दूसरे के पूरक हैं, जिनके बिना सृष्टि ही संभव नहीं।

‘पाठ्यक्रम में भाषा’ पर बात करते हुए प्रो. उमा श्रीवास्तव ने कहा कि भाषा ही हमारी ज़िंदगी का मूलभूत है। बचपन से ही इसका उपयोग हमारी दिशा तय करता है। भाषा का सही प्रयोग बेहद ज़रूरी है। बचपन में सबसे पहले हमें बच्चों को भाषा से ऐसा जोड़ना चाहिए कि वे उसे बेहतर ढंग से पूरे जीवन उपयोग कर सकें। एक अच्छा समाज भाषा के बेहतर शिक्षण से ही संभव है।

मनीष शर्मा ने संगोष्ठी का बख़ूबी संचालन तथा हिमांशु कुमावत ने आभार माना। अतिथि परिचय तनिष्का वैद्य तथा सम्मेलन की गतिविधियों का परिचय रश्मि शर्मा ने दिया। अतिथियों का स्वागत सुनील चतुर्वेदी, मनीष वैद्य, डॉ कुलदीप श्रीवास्तव, यशोधरा भटनागर, आरएस बघेल, पूर्व न्यायाधीश एके भाटिया तथा शर्मिला ठाकुर आदि ने किया। ठंडे मौसम के बावजूद पूरा सभागार सुधी श्रोताओं से भरा था। भाषा जैसे जटिल विषय पर संगोष्ठी इतनी सरस और रोचक ढंग से आगे बढ़ी कि सुधी श्रोता मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे।

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