लद्दाख : भूख हड़ताल से सुलगते विरोध तक

 अमन नम्र

लद्दाख में पाँच वर्षों से अधूरी पड़ी माँगों ने अब चिंता और असंतोष को नया मोड़ दे दिया है। शांतिपूर्ण तरीक़े से शुरू हुआ आंदोलन हाल ही में उग्रता की ओर बढ़ा, जहाँ युवाओं की बेचैनी साफ़ दिखाई दी। यह संघर्ष केवल ज़मीन या नौकरियों का सवाल नहीं, बल्कि पहचान, पर्यावरण और लोकतांत्रिक भागीदारी को सुरक्षित करने की व्यापक चाह का प्रतीक बनता जा रहा है।

लेह की सड़कों पर बुधवार को धुआँ और ग़ुस्सा दोनों एक साथ उठे। छात्रों और स्थानीय लोगों ने पुलिस से भिड़ंत की, पत्थर फेंके और CRPF की गाड़ी को आग के हवाले कर दिया। भाजपा का दफ़्तर भी प्रदर्शनकारियों के ग़ुस्से का निशाना बना। यह तस्वीरें उस शांतिपूर्ण आंदोलन से बिल्कुल अलग हैं जिसे अब तक लद्दाख के लोग अहिंसा के साथ आगे बढ़ा रहे थे। इस आंदोलन का चेहरा शिक्षाविद और इनोवेटर सोनम वांग्चुक हैं, जो लगातार 15 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे हैं।

हम सिर्फ़ अपनी ज़मीन और पहचान बचाना चाहते हैं, क्या यह बहुत बड़ी माँग है?” — यह कहना है 22 वर्षीय छात्र ताशी ग्यात्सो का, जो बुधवार को लेह की रैली में शामिल था।

पुरानी माँगें और टूटे वादे

लद्दाखियों की प्रमुख माँगें नई नहीं हैं। 2019 में अनुच्छेद 370 और 35A हटाए जाने के बाद जब लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग करके केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, तो लोगों को उम्मीद थी कि अब उनकी ज़मीन, नौकरियाँ और सांस्कृतिक पहचान और मज़बूत होगी। भाजपा नेताओं ने तब छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा और राज्य का दर्जा बहाल करने का भरोसा भी दिलाया था।

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लेकिन पाँच साल बाद स्थिति यह है:

  • राज्य का दर्जा और विधान सभा: अब तक सिर्फ़ केंद्रशासित प्रदेश, जिससे लोग राजनीतिक रूप से बेदखल महसूस कर रहे हैं।
  • छठी अनुसूची की सुरक्षा: ताकि ज़मीन और संसाधनों पर बाहरी दखल न हो, लेकिन अब तक कोई प्रगति नहीं।
  • नौकरियों में आरक्षण: हाल में 85% आरक्षण स्थानीय युवाओं को मिला है, लेकिन इसे आधा-अधूरा समाधान माना जा रहा है।
  • पर्यावरण की रक्षा: बड़े प्रोजेक्ट और पर्यटन का दबाव हिमालयी पारिस्थितिकी को नुकसान पहुँचा रहा है, इस पर कोई ठोस नीति नहीं बनी।

“सरकार ने बार-बार हमसे वादे किए, समितियाँ बनाई, बैठकें कीं, लेकिन नतीजा हर बार शून्य रहा।” — सोनम वांग्चुक, भूख हड़ताल के 14वें दिन जारी संदेश में।

अहिंसा से हिंसा की ओर

अब तक लद्दाख के लोग अपने संघर्ष को गांधीवादी तरीक़े से चलाते रहे। वांग्चुक के भूख हड़तालों में गाँव-गाँव से लोग बर्फ़ीली हवाओं के बीच धरनों में बैठते थे। मार्च 2023 और जनवरी 2024 में भी उन्होंने उपवास किया था और उस समय तक माहौल शांतिपूर्ण था।

लेकिन बुधवार को जो हुआ, उसने आंदोलन की दिशा को बदल दिया। युवाओं के भीतर यह धारणा गहरी हो रही है कि केंद्र सरकार उनकी आवाज़ सुनने को तैयार नहीं है। शायद इसी हताशा ने उन्हें हिंसक तरीक़े अपनाने पर मजबूर कर दिया।

क्या लद्दाख का जेन जी में बदलाव की आहट है?

इस पूरे आंदोलन का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि सड़कों पर सबसे आगे लद्दाख की नई पीढ़ी—यानी जेन जी—नज़र आ रही है। ये वही युवा हैं जो जलवायु परिवर्तन को अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा ख़तरा मानते हैं, जो इंटरनेट पर वैश्विक पर्यावरण आंदोलनों को फॉलो करते हैं और जो अपने अधिकारों के सवाल को सिर्फ़ नौकरियों या ज़मीन तक सीमित नहीं रखते, बल्कि लोकतंत्र और टिकाऊ विकास से जोड़कर देखते हैं।

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लद्दाख का संघर्ष इसलिए भी अहम है क्योंकि यहाँ जलवायु और राजनीति की जंग एक-दूसरे में गुंथी हुई है। बर्फ़बारी कम होना, ग्लेशियर पिघलना, पानी की किल्लत और बड़े प्रोजेक्ट्स से बिगड़ता संतुलन—यह सब जेन जेड की आँखों के सामने घट रहा है। और यही पीढ़ी अब सवाल पूछ रही है कि अगर लोकतांत्रिक व्यवस्था उनकी आवाज़ नहीं सुनेगी तो भविष्य किसके हाथ में होगा।

आगे क्या?

6 अक्टूबर को दिल्ली में गृह मंत्रालय और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच बैठक तय है। लेकिन सवाल यह है कि क्या तब तक हालात काबू में रहेंगे? और क्या सिर्फ़ बैठकें और भरोसे इस बार लोगों को शांत कर पाएँगे?

लद्दाख की यह आग सिर्फ़ ज़मीन और नौकरियों की लड़ाई नहीं है। यह लोकतांत्रिक भागीदारी और अस्तित्व की लड़ाई है। अगर पाँच साल तक शांतिपूर्ण विरोध के बावजूद माँगें न सुनी जाएँ और आंदोलन हिंसा की तरफ़ बढ़े, तो ज़िम्मेदारी आखिर किसकी होगी—उन युवाओं की जिनके पास उम्मीदें ख़त्म हो रही हैं, या उन नेताओं की जिन्होंने वादे तो किए लेकिन निभाए नहीं?

सोनम वांग्चुक के शब्दों में—“लद्दाख भारत का मुकुट है। अगर मुकुट टूटेगा तो उसका असर पूरे शरीर पर होगा। हम यह लड़ाई सिर्फ़ अपनी ज़मीन के लिए नहीं, बल्कि भारत की आत्मा को बचाने के लिए लड़ रहे हैं।”

और अंततः, सवाल यह भी उठता है कि जिस सोनम वांग्चुक की ज़िंदगी पर थ्री इडियट्स जैसी नामी फ़िल्म बनी, जिसने आमिर ख़ान और बॉलीवुड को करोड़ों की कमाई और शोहरत दी—क्या उनके असली जीवन के संघर्ष के सामने चुप रहने वाले ही असली “इडियट” साबित नहीं होंगे? और क्या लद्दाख का यह जेन जेड भारत में राजनीति और जलवायु परिवर्तन की दिशा में किसी सार्थक बदलाव का वाहक बनने का संकेत दे रहा है?

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