महासागरों में बढ़ता प्रदूषण 

सुदर्शन सोलंकी

मुनाफे और उसकी खातिर पर्यावरण को नेस्त-नाबूद करने की इंसानी फितरत ने समुद्रों को भी नहीं छोडा है। धीरे-धीरे समुद्र भी मैले और निर्जीव होते जा रहे हैं। क्या है, इसकी वजहें?

हमारी पृथ्वी पर महासागरों का विशेष महत्व है क्योंकि इनके द्वारा पर्यावरण संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जाती है। पृथ्वी का लगभग 70 प्रतिशत भाग महासागरों से घिरा हुआ है। वहीं पृथ्वी पर उपलब्ध जल का करीब 97 फीसदी जल महासागरों में ही है। एक अनुमान के अनुसार समुद्रों में जीवों की करीबन दस लाख प्रजातियां मौजूद हैं। समुद्र पारिस्थितिक तंत्र, प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन इत्यादि को संतुलित बनाए रखने में अपना विशेष योगदान देता है, किन्तु अब हमारे स्वार्थ और प्राकृतिक संसाधनों की अत्यधिक लालसा ने महासागरों पर भी प्रदूषण और उसकी जैव-विविधता को क्षति पहुंचाकर उसे कूड़े का भंडार बनाने की दिशा में भरपूर योगदान किया है।

‘संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ (यूएनईपी) के अनुसार हर साल लगभग 80 लाख टन प्लास्टिक कूड़ा-कचरा समुद्रों में फेंका जाता है। इसे दूसरे शब्दों में समझें तो एक बड़े ट्रक में समाने जितना कूड़ा-कचरा हर मिनट समुद्र में फेंका जाता है। इसकी वजह से यह वहां जीवित रहने वाली 800 से भी ज्यादा प्रजातियों के लिए खतरा पैदा करता है। इनमें से 15 प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुँच गई हैं। जब जल में रहने वाली प्रजातियों के भीतर प्लास्टिक पहुँचता है तो वह अंततः मछलियों के माध्यम से इंसानों के शरीर में भी पहुँच जाता है। पिछले कुछ वर्षों में प्लास्टिक के बारीक कणों और सिंगल-यूज प्लास्टिक को फेंके जाने से यह समस्या और भी ज़्यादा गंभीर हो गई है।

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हाल ही में कई समुद्री जीव प्लास्टिक कचरे में उलझे पाए गए हैं। इसके अतिरिक्त समुद्री जीव प्लास्टिक के छोटे-छोटे टुकड़ों को अपना भोजन समझ कर उसे निगल जाते हैं जिससे कि उनकी मौत तक हो जाती है। ‘ओसियन वाइज कंज़र्वेशन समूह’ और कनाडा के ‘मत्स्य और महासागरों के विभाग’ द्वारा किए गए अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने आर्कटिक से समुद्री जल का नमूना लिया जिसमें 92 प्रतिशत सिंथेटिक फाइबर से बना माइक्रोप्लास्टिक्स पाया गया।

न्यूक्लियर और थर्मल पावर प्लांट कूलिंग के लिए समुद्र तटीय जल का इस्तेमाल करते हैं और गर्म पानी फिर से समुद्र में छोड़ते हैं, जिससे इसका तापमान 1 से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है और मीलों दूर तक समुद्र पर इसका प्रभाव पड़ता है। ‘समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान’ ने अपने अध्ययन में पाया है कि अरब सागर में बढ़ते तापमान के कारण जेलीफिश की संख्या में वृद्धि हुई है। जेलीफिश की तेजी से बढ़ती संख्या बड़े पैमाने पर सार्डिन मछलियों के लार्वा को खा रही हैं जिससे सार्डिन मछलियों की संख्या में अत्यधिक कमी आई है। स्पष्ट है कि हमारे द्वारा महासागरों के विरुद्ध की जा रही अनैतिक गतिविधियों के कारण महासागरों में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है, साथ ही हमारे द्वारा पर्यावरण को जो नुकसान पहुँचाया जा रहा है उसकी वजह से ग्लोबल वार्मिंग व जलवायु परिवर्तन तेजी से होने लगा है। परिणाम स्वरुप समुद्र में प्रदूषण और तापमान में वृद्धि के कारण यहां की जैव-विविधता पर संकट आ गया है व कई जीवों की प्रजातियां तेजी से विलुप्ति की ओर बढ़ रही हैं। यदि हम अब भी इन सबके प्रति गंभीर नहीं होते हैं तो आने वाले कुछ ही दशकों में न सिर्फ समुद्री जैव-विविधता समाप्ति की ओर होगी, बल्कि धरती पर रहने वाले समस्त जीव-जंतु अपने जीवन के लिए बड़े संकट का सामना कर रहे होंगे। (सप्रेस)

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