‘सुपर एल नीनो’ की आहट, कमजोर मानसून का खतरा और इनसे निपटने की देश की आधी-अधूरी तैयारी ने हमारे सामने कुछ बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। ‘कोविड 19’ या हाल के खाड़ी संकट से उपजे हाहाकार को देखें तो पता चलता है कि हम आपदाओं को तब ही महत्व देते हैं जब वे एन हमारे सिर पर खड़ी हो जाती हैं। क्या यही कारनामा हम ‘सुपर एल नीनो’ से निपटने के लिए भी करने वाले हैं?
दुनियाभर के मौसम वैज्ञानिक इस समय प्रशांत महासागर को बेहद चिंता के साथ देख रहे हैं। ताजे क्लाइमेट मॉडल संकेत दे रहे हैं कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में एक मजबूत ‘एल नीनो’ तेजी से विकसित हो रहा है। समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक ऊपर जा सकता है। इतना बड़ा विचलन किसी सामान्य ‘एल नीनो’ का नहीं, बल्कि ‘सुपर एल नीनो’ जैसी स्थिति का संकेत माना जाता है।
इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि समुद्र की सतह के नीचे भी असामान्य रूप से गर्म पानी जमा है, जो आने वाले महीनों में इस प्रणाली को और ताकत दे सकता है। अनुमान है कि यह प्रभाव नवंबर-दिसंबर 2026 के दौरान अपने चरम पर पहुंच सकता है।
भारत के लिए यह खबर केवल मौसम विज्ञान की एक तकनीकी सूचना भर नहीं है। यह उस देश के लिए चेतावनी है जिसकी खेती, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जल-संसाधन और करोड़ों लोगों की आजीविका अब भी मानसून पर टिकी हुई है। भारत में बारिश केवल मौसम नहीं बदलती, यह बाजार का मूड बदलती है, सरकारों की चिंता बदलती है और आम आदमी की रसोई तक का गणित बदल देती है।
हालांकि हर ‘एल नीनो’ भारत में सूखा नहीं लाता, लेकिन इतिहास यह जरूर बताता है कि जब ‘एल नीनो’ बहुत मजबूत होता है, तब सामान्य से कमजोर मानसून की संभावना काफी बढ़ जाती है। यही वजह है कि इस बार वैज्ञानिकों की भाषा में घबराहट भले न हो, लेकिन चिंता साफ दिखाई दे रही है।
मानसून की कमजोरी सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहती
भारत में मानसून कमजोर पड़ने का मतलब सिर्फ बारिश कम होना नहीं होता। इसका मतलब है खेतों में देर से बुआई, सिंचाई पर बढ़ता खर्च, जलाशयों का खाली होना, बिजली की बढ़ती मांग और बाजारों में महंगाई का धीरे-धीरे चढ़ना।
मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ जैसे बड़े कृषि राज्यों में खेती का बड़ा हिस्सा आज भी सीधे मानसून पर निर्भर है। यदि बारिश का सिस्टम बिगड़ा, लंबे ‘ड्राई स्पेल’ बने या मानसून बार-बार ‘ब्रेक’ लेने लगा, तो सबसे पहला झटका खेती को लगेगा। धान, सोयाबीन, दालें, गन्ना और पशुपालन तक प्रभावित हो सकते हैं।
लेकिन चिंता यहीं खत्म नहीं होती। कमजोर मानसून का असर शहरों तक पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगता। पानी की कमी बढ़ती है, बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचती है, और खाद्य महंगाई आम आदमी की जेब पर दबाव डालने लगती है। सब्जियां, दालें, दूध और खाद्य तेल महंगे होने लगते हैं। ग्रामीण आय घटती है तो बाजार में मांग भी कमजोर पड़ती है।
ऑटोमोबाइल से लेकर ‘एफएमसीजी’ (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स यानि ‘तेज़ी से बिकने वाले उपभोक्ता सामान’) तक पूरा उपभोक्ता बाजार इसका असर महसूस करता है। पेट्रोल, डीजल और गैस की महंगाई से पहले ही लोगों की कमर टूटी हुई है, अगर ‘सुपर अल नीनो’ का असर वैसा ही रहा जैसी आशंका है, तो देश गंभीर आर्थिक, सामाजिक संकट में पड़ सकता है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आज की भारतीय अर्थव्यवस्था पहले की तुलना में मानसून के झटकों को बेहतर तरीके से संभाल सकती है। सेवा क्षेत्र, उद्योग और शहरी अर्थव्यवस्था अब कहीं ज्यादा मजबूत हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि खतरा टल गया है। खेती और जल-संसाधन आज भी भारत की सबसे संवेदनशील कड़ियां हैं और यही वे क्षेत्र हैं जिन पर सबसे गहरा असर पड़ सकता है।
इस बार खतरा सिर्फ सूखे का नहीं, मौसमीय असंतुलन का भी है
‘एल नीनो’ का असर पूरे भारत में एक जैसा नहीं होता। आमतौर पर इसका नकारात्मक प्रभाव देश के अधिकांश हिस्सों में दिखता है, लेकिन पूर्वोत्तर भारत कई बार इसका अपवाद बन जाता है। वहां सामान्य या सामान्य से अधिक बारिश की स्थिति बन सकती है, यहां तक कि कुछ क्षेत्रों में बाढ़ जैसी घटनाएं भी बढ़ सकती हैं। यानि भारत एक ही समय में दो चरम स्थितियों का सामना कर सकता है — कहीं सूखा और कहीं बाढ़।
यह वही मौसमीय असंतुलन है जिसे जलवायु परिवर्तन और ज्यादा खतरनाक बना रहा है। एक तरफ भीषण गर्मी और सूखी जमीन, दूसरी तरफ अचानक अत्यधिक बारिश। यही वजह है कि अब मौसम संकट केवल ‘कम बारिश’ का सवाल नहीं रह गया है, बल्कि बारिश के पैटर्न के टूटने का संकट बन चुका है।
पिछले वर्षों में भारत ने देखा है कि कैसे कुछ दिनों की अत्यधिक बारिश पूरे शहर डुबो देती है, जबकि लंबे समय तक सूखा किसानों को तबाह कर देता है। ‘सुपर एल नीनो’ जैसी स्थिति इस अस्थिरता को और बढ़ा सकती है।
सबसे बड़ा सवाल: क्या इस बार तैयारी पहले होगी?
वैज्ञानिक कह रहे हैं कि घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन गंभीर तैयारी की जरूरत जरूर है। मानसून को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसके नुकसान को कम जरूर किया जा सकता है। यही वह जगह है जहां भारत की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है।
क्या राज्य सरकारें और एजेंसियां अभी से जलाशयों का वैज्ञानिक प्रबंधन शुरू करेंगी? क्या किसानों को समय रहते फसल की सलाह मिलेगी? क्या कम पानी वाली फसलों और ‘माइक्रो इरिगेशन’ को तेजी से बढ़ावा दिया जाएगा? क्या शहरों में जल-संरक्षण और पुनर्चक्रण पर आपात स्तर की तैयारी होगी? क्या बिजली और खाद्य आपूर्ति को लेकर पहले से रणनीति बनेगी?
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय’ और ‘मौसम विभाग’ के विस्तारित पूर्वानुमानों पर लगातार नजर रखना इस बार बेहद जरूरी होगा। अगले 2-3 सप्ताह के पूर्वानुमान किसानों और जल-प्रबंधन एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
भारत ने कोविड महामारी और वैश्विक युद्ध संकटों के दौरान यह अनुभव किया है कि देर से प्रतिक्रिया कितनी महंगी पड़ सकती है। मौसम संकट का चरित्र अलग जरूर है, लेकिन उसका असर उतना ही व्यापक हो सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार चेतावनी पहले से दिखाई दे रही है।
सवाल अब यह नहीं है कि मानसून कमजोर होगा या नहीं। सवाल यह है कि अगर स्थिति बिगड़ती है, तो क्या भारत इस बार पहले से तैयार मिलेगा — या फिर हमेशा की तरह संकट सिर पर आने के बाद राहत उपायों की तलाश शुरू होगी। (सप्रेस)


