हमारा बूढ़ा होता नेतृत्व कितना बीमार है कैसे पता चलेगा ?

श्रवण गर्ग

देश की युवा आबादी के उलट, सत्ता पर क़ाबिज़ बुज़ुर्ग नेतृत्व न केवल औसतन बीमारियों की चपेट में है, बल्कि उनकी असल स्वास्थ्य स्थिति लौह सुरक्षा और चुप्पी के पर्दे में छिपी रहती है। क्या एक बीमार नेतृत्व एक संकटग्रस्त देश को सही दिशा दे सकता है — यह सवाल अब ज़रूरी है।

नागरिकों को इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि देश की औसत आयु से लगभग दो गुना उम्र के जो लोग इस समय सत्ताओं पर क़ाबिज़ हैं या उसे हासिल करने के लिये संघर्षरत हैं वे किसी न किसी गंभीर या गंभीर बन जाने वाली बीमारी से पीड़ित हो सकते है। यह भी कि उन्हें उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा के नाम पर उपलब्ध कराए गए लौह आवरण की आड़ में वे जितने आश्वस्त नज़र आते हैं हक़ीक़त में उतने होंगे नहीं।

देश की आधी से ज़्यादा आबादी 28.8 से कम आयु की है। मोदी जी के मंत्रिमंडल की औसत उम्र 58 साल है। यानी जिस औसत आयु के लोग मंत्रिमंडल में हैं उनकी संख्या देश की 140 करोड़ की आबादी में सिर्फ़ पंद्रह करोड़ के क़रीब है। इसी तरह सांसदों की औसत आयु भी 56 साल है। हमारे 52 प्रतिशत सांसद 55 से ऊपर के हैं। यानि एक युवा देश का नेतृत्व बीमारियों के कगार पर खड़े बूढ़े होते हाथों में है !

पवित्र नदियों में भी धवल अथवा भगवा वस्त्र धारण कर स्नान करने वाली इन आत्माओं के शरीरों की अंदरूनी वास्तविकता बहुत मुमकिन है उनकी सेवा में चौबीसों घंटे तैनात रहने वाले चिकित्सकों को भी या तो पता नहीं हो या उन्हें बताई ही नहीं गई हो।

सत्ताओं में क़ाबिज़ नेताओं की औसत नींद को लेकर भी कई तरह के दावे किए जाते हैं। आकलन यही है कि उनकी कुल जमा नींद चार-पाँच घंटों से ज़्यादा की नहीं होती होगी । शीर्ष पर पहुँचने या शीष को बचाए रखने की चिंता या प्रतिस्पर्धा के कारण भी पर्याप्त नींद नहीं हो पाती है। सत्ता में सालों की संख्या जैसे-जैसे बढ़ती जाती है नींद के घंटे भी उतने ही कम होते जाते हैं और बीमारियां बढ़ती जाती हैं।

हमारे देखते-देखते के ऐसे कई उदाहरण हैं कि शीर्ष से बिदा होते ही सारे समर्थक एक साथ ग़ायब हो जाते हैं और सारी बीमारियां इस तरह प्रकट होने लगती हैं कि ‘देश-सेवा’ का ज़्यादा वक्त नहीं मिल पाता।

जिज्ञासा हो सकती है कि एक ऐसे कठिन समय जब कि देश युद्धकालीन परिस्थितियों से गुज़र रहा है इस तरह के अपशकुनी विषय चर्चा में क्यों लाए जाने चाहिए ? कारण यह है कि ऐसे ही नाज़ुक मौक़ों पर नेतृत्व कर रहे लोग सबसे ज़्यादा तनावग्रस्त पाए जाते हैं और कुछ अलग तरह की ज़ुबानें बोलने और अनपेक्षित व्यवहार करने लगते हैं। इस सबसे उनकी असली मानसिक और शारीरिक क्षमताओं के संकेत जनता को प्राप्त होते हैं। हाल की कुछ घटनाओं का अध्ययन करें तो ऐसा खुले आम सड़कों पर प्रकट भी हो रहा है !

विषय को चर्चा में लाने के पीछे एक और बड़ा कारण दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश ने प्राप्त कराया है। अमेरिका जैसे ताकतवर और सुविधा संपन्न मुल्क के (पूर्व )राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपने पूरे कार्यकाल के दौरान सूंघ तक नहीं पड़ने दी कि उनका प्रोस्टेट कैंसर फोर्थ स्टेज तक पहुँच गया है।

पूरा अमेरिका इस बात पर आश्चर्य व्यक्त कर रहा है कि जिस राष्ट्राध्यक्ष को दुनिया की श्रेष्ठतम चिकित्सा सुविधा निजी स्तर पर उपलब्ध थी वह इतनी गंभीर बीमारी के साथ न सिर्फ पद पर बना रहा दूसरी बार भी चुनाव लड़ने के लिए राज़ी हो गया  ! आरोप यह है कि सत्ता में बने रहने के लिये बाइडन की शारीरिक(मानसिक?) कमज़ोरियों पर पर्दा डाला गया। जनता के दबाव के चलते बाइडन द्वारा अंततः चुनावी मैदान से हटने की घोषणा के बाद कमला हैरिस को ट्रम्प से मुक़ाबले के लिए सौ दिन के क़रीब ही मिल पाए। हैरिस की पराजय तो बाइडन ने ही तय कर दी थी। ट्रम्प ने तो सिर्फ़ उस पर अपनी मोहर लगाई।

पूछा जा रहा है कि चार साल के शासनकाल के दौरान सत्तर साल से अधिक की उम्र के होने के बावजूद बाइडन के प्रोस्टेट कैंसर की जाँच क्यों नहीं की गई ? बताया गया है कि राष्ट्रपति पद सँभालने के सात साल पहले यानि 2014 में इस बीमारी के संबंध में खून की आख़िरी बार जाँच हुई थी। राष्ट्रपति-पद पर बने रहने के दौरान प्रोस्टेट को छोड़कर उनकी दूसरी सभी मेडिकल जाँचें हर साल होती रहीं। बाइडन इस समय 82 साल के हैं। बताया जाता है बाइडन का कैंसर हड्डियों में फैल गया है जिसे दवाओं के ज़रिए नियंत्रित ही किया जा सकता है ,समाप्त नहीं।

अमेरिका के मुक़ाबले भारत में योग्य चिकिसक ज़्यादा हो सकते हैं पर सुविधाएँ तो वहाँ जैसी निश्चित ही नहीं होंगी। कहा जाता है किसी समय हमारे एक ताकतवर मुख्यमंत्री अपने दांतों के इलाज के लिए भी अमेरिका जाते थे। बहुत मुमकिन है हमारे यहाँ के सक्षम राजपुरुष और उद्योगपति अपने घुटनों और रीढ़ की हड्डियों के इलाज के लिए अभी भी अमेरिका जाते हों।

देश की ग़रीब जनता को राजनीति के अपने सिद्ध पुरुषों की गंभीर बीमारियों का तब तक पता नहीं चल पता जब तक किसी प्रकरण में गिरफ़्तारी के अदालती आदेश के कारण उन्हें अस्पतालों  में भर्ती नहीं होना पड़ जाए या फिर सत्ता से बेदख़ली नहीं हो जाए। सोच कर बता सकते हैं कि सैंकड़ों की संख्या में उच्च पदों पर बैठे राजनेताओं की किसी एक भी बीमारी के बारे में जनता को जानकारी है क्या ? क्या ये लोग पूरी तरह स्वस्थ हैं और बीमार सिर्फ़ जनता है ? हमारा बूढ़ा होता नेतृत्व कितना बीमार है कैसे पता चलेगा ?

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