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विस्थापन का दर्द जीकर जनसंघर्षों की आवाज़ बने डॉ. रामप्रताप गुप्ता नहीं रहे

विस्थापन का दर्द जीकर जनसंघर्षों की आवाज़ बने डॉ. रामप्रताप गुप्ता नहीं रहे

93 वर्ष की उम्र में उज्जैन में निधन; बड़े बांधों, नई आर्थिक नीति और जल-जंगल-जमीन के सवालों पर जीवनभर करते रहे हस्तक्षेप उज्जैन, 2 मई। मध्यप्रदेश के वरिष्ठ अर्थशास्त्री, सामाजिक चिंतक, जनपक्षधर लेखक और जल, जंगल, जमीन के सवालों पर...

93 वर्ष की उम्र में उज्जैन में निधन; बड़े बांधों, नई आर्थिक नीति और जल-जंगल-जमीन के सवालों पर जीवनभर करते रहे हस्तक्षेप

उज्जैन, 2 मई। मध्यप्रदेश के वरिष्ठ अर्थशास्त्री, सामाजिक चिंतक, जनपक्षधर लेखक और जल, जंगल, जमीन के सवालों पर गहरी समझ रखने वाले डॉ. रामप्रताप गुप्ता (डॉ. आर.पी. गुप्ता) का शनिवार सुबह लगभग 8 बजे उज्जैन में निधन हो गया। वे 93 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से आयुजनित समस्याओं के कारण अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन की खबर से सामाजिक आंदोलनों, अकादमिक जगत, जनसंगठनों और मध्यप्रदेश के वैकल्पिक विकास की बहसों से जुड़े साथियों में गहरा शोक व्याप्त है।

डॉ. गुप्ता केवल एक अर्थशास्त्री नहीं थे, बल्कि उन दुर्लभ सार्वजनिक बुद्धिजीवियों में शामिल थे जिन्होंने अर्थशास्त्र को विश्वविद्यालयों की सीमाओं से निकालकर गांवों, आंदोलनों, विस्थापित समुदायों और आम लोगों के जीवन से जोड़ा। उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज, प्रकृति और आम जन के सवालों को समझने, समझाने और उन्हें सार्वजनिक बहस का विषय बनाने में समर्पित किया।

विस्थापन को खुद जिया, इसलिए दर्द को समझा

डॉ. रामप्रताप गुप्ता का जन्म वर्ष 1933 में राजस्थान के चित्तौड़ ज़िले के मातासरा गांव में हुआ था। विडंबना यह रही कि बाद में चंबल नदी पर बने राणा प्रताप सागर बांध की डूब में उनका पैतृक गांव समा गया और उनका परिवार स्वयं विस्थापन का शिकार हुआ। यही अनुभव आगे चलकर बड़े बांधों, विस्थापन और विकास की नीतियों पर उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता की बुनियाद बना।

अपने परिवार में वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले पहले व्यक्ति थे। कोटा से प्रारंभिक उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत राजगढ़ जिले के सारंगपुर में एक हाईस्कूल शिक्षक के रूप में की। बाद में वे उच्च शिक्षा में आए और अर्थशास्त्र को अपना जीवन विषय बनाया।

गोखले संस्थान से शोध, लेकिन जमीन से जुड़ा अर्थशास्त्र

डॉ. गुप्ता ने पुणे के प्रतिष्ठित गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स एंड इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में पीएचडी की। उन्होंने अर्थशास्त्र पर शोध, लेख और पुस्तकों के माध्यम से गंभीर बौद्धिक योगदान दिया, लेकिन उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि वे जटिल आर्थिक सवालों को बेहद सरल और जनभाषा में समझाने की क्षमता रखते थे।

वे लगातार नई दुनिया, सप्रेस, स्रोत और Economic and Political Weekly जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशनों में लिखते रहे। उनकी लेखनी अकादमिक होने के बावजूद आम जन की भाषा बोलती थी।

नई आर्थिक नीति के शुरुआती आलोचकों में शामिल

सन् 1990 में लागू हुई नई आर्थिक नीति—उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण—के दूरगामी सामाजिक और आर्थिक खतरों को डॉ. गुप्ता ने बहुत शुरुआती दौर में पहचान लिया था। लगभग पैंतीस वर्ष पहले उन्होंने गांव-कस्बों, अध्ययन शिविरों और सामाजिक आंदोलनों के मंचों पर सरल भाषा में लोगों को बताया कि बाजार केंद्रित नीतियां किस तरह किसानों, मजदूरों, स्थानीय अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक संसाधनों पर असर डालेंगी।

नर्मदा, तवा, बरगी और बड़े बांधों पर गहरा अध्ययन

डॉ. गुप्ता ने नर्मदा घाटी, तवा बांध और बरगी बांध सहित मध्यप्रदेश के अनेक जल-संघर्षों, विस्थापन आंदोलनों और विकास परियोजनाओं का गहन अध्ययन किया। उनका मानना था कि विकास का मूल्य सबसे पहले स्थानीय समुदाय, आदिवासी, किसान और प्रकृति चुकाते हैं।

मध्यप्रदेश के पहले बड़े बांध गांधी सागर बांध पर उनका विशेष अध्ययन रहा। उन्होंने विस्तार से बताया कि यह बांध वास्तविक जरूरत से बड़ा बनाया गया, जिसके कारण अनावश्यक रूप से अधिक लोग विस्थापित हुए। उन्होंने वर्षों पहले चेतावनी दी थी कि बांध की ऊंचाई और संरचनात्मक दबाव भविष्य में खतरा बन सकता है। बाद के वर्षों में जब बांध का एक गेट क्षतिग्रस्त हुआ, तो लोगों ने उनकी दूरदर्शिता को याद किया।

रामपुरा बना कर्मभूमि

नीमच जिले का रामपुरा डॉ. गुप्ता की कर्मभूमि बना। वर्ष 1969 में उनका स्थानांतरण वहां के सरकारी कॉलेज में हुआ और फिर उन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा वहीं बिताया। वे लंबे समय तक अर्थशास्त्र के प्राध्यापक रहे और बाद में उसी कॉलेज के प्राचार्य बने। वर्ष 1993 में प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त होने तक उन्होंने हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाया और समाज के प्रति जिम्मेदारी का बोध जगाया।

सिर्फ शिक्षक नहीं, समाज निर्माता भी

रामपुरा में उनका योगदान केवल शिक्षण तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने तालाबों के जीर्णोद्धार, टीबी मरीजों को निःशुल्क दवाइयां उपलब्ध कराने, मोतियाबिंद के मरीजों के लिए नेत्र शिविर आयोजित कराने और गरीब विद्यार्थियों के लिए महात्मा गांधी छात्र सहायता समिति जैसी पहलें शुरू कीं, जो लंबे समय तक आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को मदद देती रही।

एक परिवार, जिसने संघर्ष को विरासत बनाया

डॉ. गुप्ता का एक परिचय यह भी रहा कि वे मध्यप्रदेश के प्रिय जनसंघर्ष साथी स्वर्गीय सुनील के पिता थे। उनके गांधीवादी विचारों, सार्वजनिक जीवन और सामाजिक प्रतिबद्धता का गहरा प्रभाव अगली पीढ़ी पर भी पड़ा। उनकी पत्नी इंदिरा गुप्ता जीवनभर उनकी सहयोगी रहीं। वे अपने पीछे बेटियों, पुत्र, नाती-पोतों और एक विशाल वैचारिक परिवार को छोड़ गए हैं।

वरिष्‍ठ पत्रकार एवं सप्रेस के संपादक राकेश दीवान ने अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि डॉ. रामप्रताप गुप्ता का जाना केवल एक व्यक्ति का निधन नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े अर्थशास्त्र, जनपक्षधर चिंतन और वैकल्पिक विकास की एक सशक्त आवाज का मौन हो जाना है। सामाजिक और जनसंगठनों से जुड़े साथियों ने इसे मध्यप्रदेश ही नहीं, पूरे देश के जनआंदोलनकारी समाज के लिए अपूरणीय क्षति बताया है।

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