छतरपुर। स्थानीय गांधी स्मारक भवन में पिछले रविवार को केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना और उससे जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक में पर्यावरण संरक्षण, जल संकट, विस्थापन और जंगलों पर पड़ने वाले प्रभाव सहित लगभग 20 प्रमुख बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं, पर्यावरणविदों, शिक्षाविदों और ग्रामीण प्रतिनिधियों ने परियोजना को लेकर अपनी आशंकाएं व्यक्त करते हुए आंदोलन को और व्यापक बनाने की आवश्यकता बताई।
बैठक में विशेष रूप से झांसी से आए पर्यावरण चिंतक विपिन बिहारी तथा स्नातक महाविद्यालय के सेवामुक्त प्राकृत प्राध्यापक डॉ. कृष्ण गोपाल उपस्थित रहे। डॉ. कृष्ण गोपाल ने बैठक का संचालन करते हुए कहा कि केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना मूल रूप से मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के बीच बेतवा नदी के जल बंटवारे से जुड़ा विषय है। उन्होंने बताया कि पूर्व में हुए समझौते के अनुसार बेतवा नदी के जल में 60 प्रतिशत हिस्सा मध्यप्रदेश तथा 40 प्रतिशत हिस्सा उत्तरप्रदेश को दिए जाने का प्रावधान रखा गया था।
उन्होंने कहा कि भविष्य में बढ़ती आबादी, सिंचाई और औद्योगिक उपयोग के कारण जल की कमी की आशंका को देखते हुए केन नदी का पानी बेतवा में स्थानांतरित करने की योजना बनाई गई। किंतु इसके पर्यावरणीय दुष्परिणामों पर पर्याप्त गंभीरता से विचार नहीं किया गया। वक्ताओं ने कहा कि परियोजना के तहत बनने वाले बांध और जलाशय से पन्ना टाइगर रिजर्व सहित बड़े वन क्षेत्र प्रभावित होंगे, जिससे जैव विविधता, वन्यजीवों और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर असर पड़ सकता है।
बैठक में कहा गया कि केन घाटी बुंदेलखंड क्षेत्र की जीवन रेखा मानी जाती है। यदि बड़े स्तर पर जल दोहन और बांध निर्माण होता है तो अनेक गांव डूब क्षेत्र में आ सकते हैं तथा आसपास के क्षेत्रों में भूजल स्तर गिरने की आशंका बढ़ जाएगी। इससे ग्रामीणों, किसानों और पशुपालकों को भविष्य में भारी जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।
सामाजिक कार्यकर्ता एवं प्राकृतिक चिकित्सक डॉ. दिनेश मिश्रा ने कहा कि किसी भी बड़ी परियोजना का मूल्यांकन केवल आर्थिक लाभ के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। जंगलों, वन्यजीवों, आदिवासी समुदायों और ग्रामीण जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को भी समान महत्व मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते आवाज नहीं उठाई गई तो आने वाले वर्षों में जल, जंगल और जमीन का बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
गांधी आश्रम से जुड़े वक्ताओं ने कहा कि गांवों का विस्थापन केवल जमीन छिनना नहीं, बल्कि लोगों की संस्कृति, आजीविका और सामाजिक जीवन का टूटना भी है। ग्रामीण महिलाओं ने कहा कि परियोजना के विरोध और जनजागरण के लिए गांव-गांव और मोहल्लों में छोटे-छोटे समूह बनाकर अभियान चलाया जाएगा। उन्होंने आशंका जताई कि बांध निर्माण के बाद जल संकट और विस्थापन की स्थिति और गंभीर होगी।
सभा में अमित मित्र ने कहा कि यदि विस्थापन अपरिहार्य है तो प्रभावित परिवारों को पहले वैकल्पिक जमीन, मकान, जंगल और रोजगार उपलब्ध कराए जाएं। वहीं वक्ता किशोर ने आरोप लगाया कि परियोजना के नाम पर बड़े स्तर पर धन का दुरुपयोग हो रहा है।
कार्यक्रम के दौरान कवियित्री स्मृति सक्सेना ने “विनाशक बन प्रकृति विनाश” शीर्षक कविता का पाठ कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। सेवानिवृत्त प्राध्यापक डॉ. एस.आर. पाल ने कहा कि ऐसी बड़ी परियोजनाएं अक्सर कॉरपोरेट और बाहरी आर्थिक हितों से प्रेरित होती हैं, जबकि इसका वास्तविक भार ग्रामीण और आदिवासी समुदायों को उठाना पड़ता है।
बैठक में बदामलाल सेन, प्यारी राजपूत सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों ने भी अपने विचार रखे। अंत में तय किया गया कि इस मुद्दे पर अगली बैठक बांदा में आयोजित की जाएगी तथा जनजागरण अभियान को और व्यापक रूप दिया जाएगा।


