छिंदवाड़ा : ‘पेरिस समझौते’ से प्रभावित परासिया

अमिताभ पाण्डेय

जलवायु परिवर्तन के लिए 196 देशों के बीच हुआ ‘पेरिस समझौता’ ठेठ छिंदवाडा जिले के सुदूर परासिया इलाके में क्या और कितना असर डाल सकता है?

वेस्टर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड (डब्लूसीएल) भारत के कोयला मंत्रालय के अन्तर्गत ‘कोल इंडिया लिमिटेड’ का प्रमुख हिस्सा है। इसे भारत की ‘मिनीरत्न कंपनी’ माना जाता है। इसकी कोयला खदानें मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के परासिया, जुन्नारदेव क्षेत्र में भी हैं, जो अब बंद हो चुकी हैं। वजह है – जलवायु-परिवर्तन को रोकने की खातिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुआ ‘पेरिस समझौता।’ ‘पेरिस समझौता’ जलवायु परिवर्तन पर कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि है। इसे 12 दिसंबर 2015 को पेरिस, फ्रांस में ‘संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन’ (COP21) में 196 देशों द्वारा अपनाया गया था। यह 4 नवंबर 2016 को लागू हुआ था। इसका व्यापक लक्ष्य ‘वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2 डिग्री सेल्सियस नीचे रखना’ और ‘तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने’ के प्रयास करना है। इसके अनुसार भारत को वर्ष 2070 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करना है। इसके लिए कोयले से ऊर्जा के उत्पादन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना होगा।

नतीजे में कोयले से ऊर्जा उत्पादन करने वाले संयंत्रों को धीरे-धीरे बंद किया जा रहा है। कार्बन उत्सर्जन का एक प्रमुख स्रोत कोयला भी है इसलिए कोयले की खदानों को बंद किया जा रहा है। खदानों के बंद होने से इस क्षेत्र में बेरोजगारी बढ़ रही है और मजदूर परिवारों के लिए जिंदगी जीना मुश्किल हो गया है। ऐसे में मजदूर परिवारों ने वैकल्पिक रोजगार की तलाश शुरू की है। महिलाओं ने अब कृषि उत्पादन, जैविक खेती, पशुपालन, मछली पालन सहित अन्य घरेलू कार्यों को अपने रोजगार का माध्यम बनाया है। 

इस संबंध में घोरवाडी गांव में रहने वाली लगभग 64 वर्षीय उषा आम्रवंशी के बारे में बताना जरूरी होगा। कभी ‘डब्ल्यूसीएल’ की कोयला खदानों में मजदूर रही उषा आम्रवंशी के खेत में इन दिनों धान की फसल लहलहा रही है। वे धान, मक्का, सोयाबीन के साथ अपने खेत में आलू, टमाटर, लौकी जैसी सब्जियां भी उगाती हैं और इसमें रासायनिक दवाओं और खाद का उपयोग नहीं करतीं। वे जैविक खेती से फसल और सब्जी का उत्पादन करती हैं। यही कारण है कि उनकी फसल और सब्जियां बाजार में अधिक दाम पर बिकती हैं। इससे उनको रोजगार मिला है। 

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इससे उषा को रोजी-रोटी चलाने में सुविधा हो गई है। कोयला खदान बंद होने के बाद उषा और  उनके पति सुखलाल आम्रवंशी के सामने रोजगार खत्म हो जाने की जो समस्या आई थी, लेकिन उसे उन्होंने जैविक खेती करके दूर कर लिया है। इसी तरह गोरा उईके, कविता पंवार, सरोज इवनाती, सीमा कादरी, अंजना नागवंशी, प्रभा स्वामी, सविता सोनी, ज्योति सोनी, कौशल्या वर्मा, अभिलाषा सनोडिया, उमा प्रजापति, रामवती झरबडे, इन्दिरा विश्वकर्मा, अनिता नररे, पार्वती पंवार, सुनीता कुशवाहा, रोशनी श्रीवास्तव, मंगली चौकीकर,  कंचना नागले, प्रिया आरसे, कन्नाबाई, श्रध्दा नागले, भागवती, सुनीता मौर्य, दीपिका धुर्वे, सरिता वानवंशी,  अनुसुइया कलमे, कमला उईके जैसी जरुरतमंद महिलाएं भी समूह बनाकर जैविक कृषि उत्पादन कर रही हैं। 

उषा आम्रवंशी ने ‘उम्मीद स्व-सहायता समूह’ नाम से महिलाओं की एक टीम बनाई है। दांतला गांव में रहने वाली रीना खेत्रपाल के महिला समूह का नाम ‘साईं स्व-सहायता समूह’ है। विशाला गांव में रहने वाली पार्वती पंवार, उषा झरखडे सहित लगभग 200 महिलाओं ने ‘शिवा समूह’ बनाया है। इन्होंने जैविक खेती, मोटे अनाज का उत्पादन, पशुपालन, मछली पालन, जैविक खाद बनाने जैसे काम करके अपनी आर्थिक स्थिति बेहतर बना ली है। ये सभी महिलाएं ‘ग्रामीण आजीविका मिशन’ के वित्तीय सहयोग से कृषि संबंधी कार्यों के लिए तकनीकी मार्गदर्शन लेकर जैविक उत्पादन, जैविक खाद, मोटे अनाज का उत्पादन, पशुपालन सहित अन्य कार्य कर रही हैं जिससे महिलाओं की आमदनी बढ़ी है। 

उषा बताती हैं – ‘कोयला खदान बंद होने के बाद मेरे सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया था। मैं घर-परिवार चलाने के लिए काम की तलाश कर रही थी। मैंने जरूरतमंद महिलाओं को इकट्ठा कर समूह के माध्यम से आर्थिक गतिविधियां शुरू कीं। इसमें मुझे मेरे पति, परिवार के सदस्यों के साथ ही ‘ग्रामीण आजीविका मिशन’ का भी सहयोग मिला।’ उषा अपने गांव घोरवाडी से लेकर विशाला, करमोहिनी बंधी, दांतला, पनारा, डूंगरिया सहित अन्य गांवों में 100 से अधिक स्व-सहायता समूहों का गठन करवा चुकी हैं। इनमें लगभग 2000 महिलाएं विभिन्न कार्यों से जुड़कर रोजगार प्राप्त कर रही हैं। 

उल्लेखनीय है कि शासन ने छिंदवाड़ा सहित मध्यप्रदेश के सभी 52 जिलों में 5 लाख 3 हजार 170 से ज्यादा स्व-सहायता समूहों के माध्यम से 62 लाख 16 हजार 370 ग्रामीण परिवारों की महिलाओं को रोजगार उपलब्ध करवाया है। प्राकृतिक खेती, मिलेट उत्पादन संबंधी कार्य को बढ़ाने के लिए इस वित्तीय वर्ष 2024-25 में 30 करोड़ रुपए का बजट स्वीकृत किया गया है। मध्यप्रदेश में ‘ग्रामीण आजीविका मिशन’ के अन्तर्गत वर्ष 2024-25 में ग्रामीण महिलाओं को रोजगार देने के लिए विभिन्न योजनाओं हेतु 800 करोड रुपए का बजट रखा गया है। यह राशि पिछले वर्ष के बजट से लगभग 33 प्रतिशत अधिक है।

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मध्यप्रदेश में इस तरह के समूह के माध्यम से 5 लाख से अधिक महिलाओं को कृषि उत्पादन या अन्य घरेलू कार्यों में रोजगार के अवसर उपलब्ध हुए हैं। यहां यह बताना जरूरी है कि ज्यादातर महिलाएं पिछड़े, कमजोर, आदिवासी समुदाय से आती हैं। इस समुदाय के पुरूषों, महिलाओं ने छिंदवाड़ा जिले की कोयला खदानों में लंबे समय तक काम किया। अब ये महिलाएं सर्वाधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाले कोयला खनन क्षेत्र को छोड़कर प्रदूषण मुक्त, ‘इको फ्रेंडली’ काम करके अपना घर चला रही हैं। इन महिलाओं ने कोयला खदानों की मजदूरी को छोड़कर जैविक कृषि उत्पादन, जैविक खाद बनाने, जंगल से उत्पन्न होने वाले उत्पादों का संग्रहण और विक्रय करके हरित क्षेत्र में रोजगार को बढ़ाया है। 

इस बारे में छिंदवाड़ा जिले के जुन्नारदेव विधानसभा क्षेत्र के ‘राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन’ के सहायक-प्रबंधक फिरोज दीवान ने बताया कि मध्यप्रदेश के कोयला खदान बहुल छिंदवाड़ा जिले के जुन्नारदेव विकासखंड में भी महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण के लिए पर्यावरण-हितैषी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं जिनसे महिलाओं को रोजगार भी रहा है। ‘हम महिलाओं को बैंक से जोड़कर ऋण दिलवाते हैं और उनके रोजगार की व्यवस्था करते हैं।’  फिरोज दीवान के मुताबिक ‘हमें खुशी है कि हम कोयला खदान जैसे प्रदूषण क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को कृषि गतिविधियों से जोड़ पाए। ये महिलाएं अब हरित क्षेत्र के माध्यम से रोजगार प्राप्त कर अपनी आर्थिक स्थिति बेहतर बना रही हैं। इनकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ गई है। महिलाएं समूह बनाकर इतना अच्छा काम कर रही हैं कि इसमें उनके पति और परिवार के अन्य सदस्य भी पूरा सहयोग करते हैं।’

छिंदवाड़ा जिले में कृषि संबंधी विषय पर महिलाओं को मार्गदर्शन करने वाली युवा आम्रपाली जावलकर बताती हैं – ‘जिले में 16 हजार 324 स्व-सहायता समूहों के माध्यम से 25 हजार से अधिक महिलाओं को कृषि संबंधी रोजगार का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। उन्हें पशुपालन, मछली पालन की गतिविधियों से जोड़कर उनकी आय बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे हैं।’ परासिया क्षेत्र में बंद कोयला खदानों में काम कर चुकी महिलाएं हरित क्षेत्र में रोजगार करके ऐसा उदाहरण खडा कर रही हैं जिससे प्रेरणा मिलती है। ये महिलाएं ऊर्जा परिवर्तन के लिए बेहतरीन साबित हो रही हैं। इनकी सोच, संघर्ष और सफलता ने महिलाओं को प्रगति के नए रास्ते दिखाए हैं। (सप्रेस)

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