पर्वत संरक्षण कानून के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान का आह्वान

तीन प्रमुख हस्तियों न्यायमूर्ति गौड़ा, डॉ. राजेंद्र सिंह और बोलिसेट्टी सत्यनारायण ने जारी किया घोषणा पत्र

बैंगलोर, 24 मई 2026 जमशेदपुर, झारखंड में 22 एवं 23 मई 2026 को आयोजित राष्ट्रीय नदी-पर्वत सम्मेलन में सर्वसम्मति से स्वीकृत घोषणा पत्र को क्रियान्वित करने के उद्देश्य से दक्षिण भारत के बैंगलोर में रविवार को महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई। इस अवसर पर न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) वी. गोपाला गौड़ा, जलपुरुष डॉ. राजेंद्र सिंह तथा बोलिसेट्टी सत्यनारायण ने प्रेस मीडिया के समक्ष घोषणा पत्र जारी करते हुए देश के पर्वतीय और नदी पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान का आह्वान किया।

इस बैठक में पारित घोषणा-पत्र में कहा गया कि  तरुण भारत संघ, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद, जल बिरादरी, युगांतर भारती, नेचर फाउंडेशन, स्वर्णरेखा क्षेत्र विकास ट्रस्ट, मिशन-वाई जमशेदपुर  में सम्‍पन्‍न राष्ट्रीय पर्वत एवं नदी सम्मेलन के प्रतिनिधिगण  भारत के पर्वतीय और नदी पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण, सुरक्षा और संवर्धन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः दृढ़ करते हैं। घोषणा पत्र में कहा गया है कि :

1. हम यह स्वीकार करते हैं कि पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र जल सुरक्षा, नदी पुनर्जीवन, जैव विविधता तथा करोड़ों लोगों की आजीविका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

2. हम उन पर्वतीय जलग्रहण क्षेत्रों की सुरक्षा का संकल्प लेते हैं, जो नदियों और भूजल भंडारों को जल उपलब्ध कराते हैं।

3. हम यह मान्यता देते हैं कि आदिवासी एवं स्थानीय पर्वतीय समुदाय पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र के प्राथमिक संरक्षक हैं तथा पर्वतीय पारिस्थितिकी प्रबंधन संबंधी उनके पारंपरिक ज्ञान का सम्मान करते हैं।

4. हम पर्वतीय क्षेत्रों को प्रभावित करने वाली गतिविधियों के दीर्घकालिक नियमन हेतु एक व्यापक, पारिस्थितिकी-आधारित एवं अधिकार-सम्मत विधिक ढांचा विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

5. हम नदियों और पर्वतों के अधिकार सुनिश्चित करने तथा उनके सुशासन हेतु संस्थागत व्यवस्थाएँ स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

6. हम नदियों और पर्वतों के अधिकार सुनिश्चित करने तथा उनके सुशासन हेतु संस्थागत व्यवस्थाएँ स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

7. हम भारत के पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए विधिक ढांचे के निर्माण हेतु देशव्यापी परामर्श आयोजित करने का संकल्प लेते हैं।

8. हम इस घोषणा की तिथि से एक वर्ष की अवधि के भीतर विधिक ढांचे को तैयार करने का कार्य पूर्ण करने का संकल्प लेते हैं।

9. हम नागरिक समाज संगठनों, शिक्षाविदों, पर्यावरण वैज्ञानिकों, सामाजिक वैज्ञानिकों, विधि विशेषज्ञों, आदिवासी समुदायों के प्रमुखों तथा अन्य हितधारकों से पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्रों हेतु विधिक ढांचे के प्रारूपण में सहयोग देने का आह्वान करते हैं।

10. हम राज्य सरकारों और केंद्र सरकार से आग्रह करते हैं कि विकसित किए गए विधिक ढांचे पर विचार कर उसे “पर्वत संरक्षण अधिनियम” के विधेयक के रूप में संबंधित विधानसभाओं तथा लोकसभा एवं राज्यसभा के समक्ष प्रस्तुत किया जाए, ताकि उसे स्वीकृत किया जा सके। हम इस घोषणा-पत्र को विधिवत अंगीकृत करते हैं तथा इसके क्रियान्वयन के प्रति स्वयं को प्रतिबद्ध करते हैं।

मीडिया को संबोधित करते हुए डॉ. राजेंद्र सिंह ने भारत के पर्वतों को कानूनी संरक्षण दिलाने के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि देश की नदियों का स्वास्थ्य, जल सुरक्षा, कृषि और सामूहिक भविष्य पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्रों के अस्तित्व से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। वास्तविक संरक्षण केवल नीतियों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए लोगों का प्रकृति से भावनात्मक और नैतिक जुड़ाव आवश्यक है। उन्होंने समाज से अपील की कि “जनमानस के मस्तिष्क और हृदय को पर्वतों से जोड़ा जाए,” और जनजागरूकता, जिम्मेदारी तथा सहभागिता को सार्थक संरक्षण की पहली और सबसे आवश्यक सीढ़ी बताया।

डॉ. सिंह ने चिंता व्यक्त की कि स्वतंत्रता के बाद दशकों से कानून बनने के बावजूद, क्रियान्वयन की कमियों और कानूनी खामियों के कारण पर्यावरण संरक्षण व्यवहार में अक्सर कमजोर रहा है। उन्होंने ऐसे मजबूत, पारदर्शी और जवाबदेह ढांचे की आवश्यकता बताई जो वास्तव में पारिस्थितिक संरक्षण को सुनिश्चित कर सके।

मीडिया से बात करते हुए न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) वी. गोपाला गौड़ा ने कहा कि स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद भी भारत में ऐसा कोई समर्पित कानून नहीं है जो विशेष रूप से पर्वतों और नदियों की रक्षा के लिए बनाया गया हो। इन पारिस्थितिक तंत्रों के अविभाज्य संबंध पर बल देते हुए कहा कि पर्वत नदियों के जीवनदायी स्रोत हैं और उनका विनाश सिंचाई, पेयजल उपलब्धता, पर्यावरणीय स्थिरता और अंततः मानव जीवन पर व्यापक दुष्प्रभाव डालता है।

न्यायमूर्ति गौड़ा ने यह भी रेखांकित किया कि भारत का संविधान इस प्रकार के कानून के लिए आवश्यक कानूनी आधार पहले से उपलब्ध कराता है। संविधान की सातवीं अनुसूची का उल्लेख करते हुए — जिसमें खनिज विनियमन, अंतरराज्यीय नदियों और संसद की अवशिष्ट शक्तियों से संबंधित प्रावधान शामिल हैं। उन्होंने कहा कि व्यापक राष्ट्रीय पारिस्थितिक संरक्षण ढांचा स्थापित करने के लिए पर्याप्त संवैधानिक क्षमता मौजूद है।

उन्होंने नीति-निर्माताओं से अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय शासन के उदाहरणों का अध्ययन करने और भारत की प्राकृतिक प्रणालियों के संरक्षण हेतु अधिक मजबूत एवं समन्वित कानूनी तंत्र अपनाने का आग्रह किया।

लोकचर्चा की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति गौड़ा ने मीडिया—लोकतंत्र के चौथे स्तंभ— से इस अभियान को व्यापक रूप से उठाने और पर्वतों एवं नदियों के संरक्षण के प्रति राष्ट्रीय चेतना विकसित करने में सहयोग देने की अपील की।

बोलिसेट्टी सत्यनारायण ने घोषणा की कि यह आंदोलन देशभर में जनजागरूकता अभियान, जनसंपर्क कार्यक्रम, जागरण यात्राएं और प्रेस संवाद आयोजित करेगा, ताकि नागरिकों को संगठित किया जा सके और राज्य सरकारों तथा केंद्र सरकार पर लोकतांत्रिक दबाव बनाया जा सके।

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