चिकित्सा और ई वेस्ट का निपटान: उपेक्षित नजरिया

कुमार सिद्धार्थ

प्रतिदिन 550.9 टन चिकित्सा अपशिष्ट उत्सर्जित करने वाला और 70 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक कचरे को पैदा करने वाला अपना देश दुनिया का पाँचवां सबसे बड़ा देश है। मोबाइल फोन, कंप्यूटर और ढेरों इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स की रद्दी में भरमार हैं, लेकिन इन से मनुष्य और पर्यावरण को होने वाला नुकसान ज्यों का त्यों बना रहता है। भारत में हर साल पैदा होने वाले 18.5 लाख टन ई-वेस्ट और चिकित्सा अपशिष्ट को ठिकाने लगाना एक बड़ी समस्या है। इन अपशिष्टों के सुरक्षित और प्रभावी प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए कड़ी निगरानी और मूल्यांकन ढांचे के जरूरत है।

औद्योगिक संगठन एसोचैम और वेलोसेटी के एक संयुक्त अध्ययन से जानकारी मिली है कि भारत में सन् 2020 तक प्रतिदिन 775.5 टन चिकित्सा अपशिष्ट पैदा होने की संभावना है। वर्तमान में प्रतिदिन 550.9 टन अपशिष्ट उत्सर्जित होता है। हर साल उत्सर्जित होने वाले चिकित्सा अपशिष्ट में सात प्रतिशत की बढ़ौत्री संभावित है। ‘अनअर्थिंग द ग्रोथ कर्व एंड नसेसिटी ऑफ बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट इन इंडिया 2018’ नामक इस अध्ययन में कचरे के सुरक्षित और प्रभावी प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए कड़े निगरानी और मूल्यांकन ढांचे के जरूरत पर जोर दिया गया है।

अध्ययन के मुताबिक अपशिष्ट प्रबंधन का बाजार अपने देश में सन् 2025 तक 136.20 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की संभावना है। चिकित्सा अपशिष्ट के खराब प्रबंधन के कारण आमजन के स्वास्थ्य को खतरा हो सकता है। गौरतलब है कि चिकित्सा अपशिष्ट के अलावा अपना देश भारत 70 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक कचरे को पैदा करने वाला दुनिया का पाँचवां सबसे बड़ा देश है। मोबाइल फोन, कंप्यूटर और ढेरों इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स देखते-देखते बेकार होकर रद्दी हो जाते हैं, लेकिन इनसे मनुष्य और पर्यावरण को होने वाला नुकसान ज्यों का त्यों बना रहता है। भारत में हर साल पैदा होने वाले 18.5 लाख टन ई-वेस्ट को ठिकाने लगाना एक बड़ी समस्या है।

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वायु और जल प्रदूण बढ़ाने में चिकित्सा और ई-वेस्ट अहम भूमिका निभा रहे हैं। दरअसल, बायोमेडिकल वेस्ट के निस्तारण को लेकर बनाए गए नियम कायदों से खुद चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति जागरूक नहीं है। खतरनाक और संक्रमण फैलाने वाले वेस्ट का निस्तारण अलग ढंग से होता है जबकि सामान्य वेस्ट का अलग ढंग से। इसी तरह ई-वेस्ट के निस्तारण को लेकर भी जागरूकता का अभाव है। इलेक्ट्रॉनिक कचरे को कहां फेंका जाना है, किस स्तर पर और कैसे इसका निस्तारण होना है, इसकी जानकारी ज्यादातर लोगों को नहीं है।

एसोचैम और केपीएमजी का अध्ययन बताता है कि जनसंख्या के विस्तार,बढ़ते शहरीकरण और बाजार संस्कृति के चलते ई-वेस्ट इतना बढ़ गया है कि इससे वैश्विक स्तर पर पर्यावरण के लिए खतरा पैदा होने लगा है। हाल में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक ई-वेस्ट मैनेजमेंट के मामले में मौजूदा हालात अच्छे संकेत नहीं दे रहे। दुनिया में हर रोज 26 लाख टन ई-वेस्ट ठिकाने लगाने की स्थिति संभवतः 2075 तक ही बन पाएगी। कनाडा में पिछले चार बरसों में ई-वेस्ट तीन गुना बढ़ चुका है। अनेक देशों में इसके लिए रचनात्मक प्रयास जारी हैं।

वहीं दूसरी ओर पर्यावरण मंत्रालय ने इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-वेस्ट) और बायो मेडिकल कचरे के प्रबंधन के लिए नए नियम अधिसूचित किए हैं। ये नियम पिछले नियमों से बेहतर हैं लेकिन उनके क्रियान्वयन में कठिनाइयां बनी रहेगी। इन नए नियमों के मुताबिक ई-वेस्ट प्रबंधन के मामले में सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के निर्माता, आयातकों और अन्य आपूर्तिकर्ताओं को पहले साल यानी वर्ष 2017-18 में अपने कुल कचरे का 10 फीसदी निपटाने की जवाबदेही होगी । इसके बाद 2023 तक यह हर साल 10 फीसदी बढ़ेगी। सन् 2023 के बाद सालाना लक्ष्य 70 फीसदी होगा। लेकिन स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े जोखिम कम करने का लक्ष्य इससे आंशिक रूप से ही हासिल होगा। जो कचरा निपटाया नहीं जाएगा वह इकट्ठा होता रहेगा क्योंकि व्यक्तिगत तौर पर और छोटे पैमाने पर इनका इस्तेमाल जारी रहेगा। 

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हम जान लें कि देश में ई-वेस्ट का 95 फीसदी कूड़ा-कचरा बीनने वाले लोगों से आता है। ऐसे में स्वैच्छिक संगठनों और नागरिकों के स्तर पर जागरूकता और सक्रियता जरूरी है। उत्पाद निर्माण करने वाली कंपनियों को ऐसे नियम बनाना चाहिए कि वे स्वयं उपयोग में न आने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को वापस ले सके। इन उपकरणों की रिसाइकलिंग ऐसे उपयुक्त स्थान पर की जाए, जहां किसी प्रकार की जनहानि या पर्यावरण को नुकसान न हो। इसके अलावा कबाड़ में फेंके गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उचित तरीके से ठिकाने लगाने के लिए असंगठित क्षेत्र से जुड़े लोगों के व्यापक प्रशिक्षण के प्रबंध भी आवश्यक है।

हम सब जानते है कि बायोमेडिकल कचरा मनुष्यों और वन्य प्राणियों के स्वास्थ्य के लिए ई-कचरे से भी अधिक नुकसानदेह हो सकता है। सरकार ने नई नीति में क्लोरिनेटेड प्लास्टिक बैग, दास्तानों और ब्लड बैग के रूप में ऐसा कचरा उत्पादित करने वाली चीजों के निपटान के लिए और वक्त दिया है। साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्देशों के अनुरूप ही इसे संक्रमणहीन करने की सुविधा भी स्थापित की जा रही है। अस्पताल, पशु चिकित्सालय तथा अन्य स्वास्थ्य केंद्रों आदि को एक वर्ष का समय दिया गया है कि वे बार कोडिंग और जीपीएस के साथ ऐसी व्यवस्था बना लें जिससे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दिशा-निर्देशों के मुताबिक जरूरत पड़ने पर उनके चिकित्सकीय कचरे को ट्रैक किया जा सके।

केवल गाइडलाइंस बना देने से लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। इसके लिए संबंधित पक्षों को जागरूक किया जाना भी उतना ही जरूरी है। एक तरफ अपनी आने वाली पीढियों के लिए हम बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार इत्यादि की कामना के साथ अग्रसर हैं लेकिन उनको एक बेहतर और सुरक्षित पर्यावरण देना भी हमारा ही कर्तव्य है। (सप्रेस)

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