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भोटकोशी बाढ़ से सबक लेकर हिमालयी देशों को संयुक्त मंच बनाना चाहिए : पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट

राष्ट्रीय हिमालय आयोग के गठन की पैरवी, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आयोग बनाने की मांग

चमोली (उत्‍तराखंड), 28 अगस्‍त। प्रख्यात पर्यावरणविद्, चिपको आंदोलन के नेता और गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित चंडी प्रसाद भट्ट ने शुक्रवार को नेपाल के रसुवा क्षेत्र में भोटकोशी नदी में आई बाढ़ से सबक लेने की जरूरत बताई। उन्होंने हिमालय से जुड़े देशों के राष्ट्राध्यक्षों से एक मंच पर आकर ऐसी घटनाओं से होने वाले जान-माल के नुकसान को कम करने के लिए संयुक्त प्लेटफार्म विकसित करने की पहल करने का आग्रह किया। उनका कहना था कि इससे समय रहते ऐसी घटनाओं के प्रभाव और उनसे होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।

श्री भट्ट ने हिमालय के लिए राष्ट्रीय आयोग के गठन की पैरवी करते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर हिमालय के संरक्षण और विकास के लिए आज से कुछ दशक पूर्व में प्रो एम एस स्वामीनाथन कमेटी द्वारा सुझाए गए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले हिमालयन विकास आयोग का गठन किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि हिमालय में होने वाली गड़बड़ियों का असर पूरे देश पर पड़ता है। हिमालय से निकलने वाली नदियां केवल पर्वतीय क्षेत्रों को ही नहीं, बल्कि पूरे देश को जीवन प्रदान करती हैं और देश की समृद्धि का आधार हैं। इसलिए हिमालय का संरक्षण हमारी प्राथमिकता में होना चाहिए। उन्होंने कहा कि पालतू, केदारनाथ,रेणी-तपोवन, तिस्ता, धराली जैसी घटनाओं की त्रासदी को कम करने की पहल हो सकती है।

हिमालय दुनिया की सबसे संवेदनशील पर्वतमालाओं में एक

93 वर्षीय श्री भट्ट ने कहा कि हिमालय दुनिया की सबसे संवेदनशील पर्वतमालाओं में से एक है। अन्य पर्वतमालाओं की अपेक्षा यहां भू-गर्भीय हलचलें तेजी से जारी हैं। भू-गर्भविद हिमालय को दुनिया की सबसे नवीन और विकासशील पर्वत श्रृंखलाओं में से एक मानते हैं। इसलिए हिमालय में होने वाली बाहरी और भीतरी गतिविधियों के कारण इस तरह की घटनाओं का लंबा इतिहास रहा है।

उन्होंने कहा कि पुरानी आपदाओं को छोड़ दें और इसी सदी की बात करें तो उत्तराखंड जैसे छोटे इलाके में वर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा के दौरान न केवल मंदाकिनी नदी अपितु ग्लेशियरों से उद्गमित होने वाली उत्तराखंड में उत्तरकाशी में टौंस से लेकर पिथौरागढ़ में काली गंगा तक सभी नदियों में बाढ़ आयी थी। केदारनाथ में इस बाढ़ ने आपदा का रुप धारण कर हजारों तीर्थयात्रियों की जान ले ली थी। आठ साल बाद ऋषि गंगा की तबाही, फिर सिक्किम में तीस्ता के उपरी जलग्रहण क्षेत्र में आयी बाढ़, पिछले साल उत्तरकाशी के धराली की आपदा साभी कमोवेश नेपाल के भोटकोशी के ही रुप हैं।

श्री भट्ट ने कहा कि आठ साल बाद ऋषिगंगा की तबाही, फिर सिक्किम में तीस्ता के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में आई बाढ़ और पिछले साल उत्तरकाशी के धराली की आपदा सभी कमोबेश नेपाल के भोटकोशी में आई बाढ़ जैसी ही घटनाएं हैं।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ी उच्च हिमालय की संवेदनशीलता

श्री भट्ट ने बताया कि मौसम में हो रहे बदलावों के कारण उच्च हिमालय की संवेदनशीलता और बढ़ गई है। हमारे पास अभी भी इन क्षेत्रों को लेकर प्रमाणिक और सटीक जानकारी का अभाव है। जलवायु परिवर्तन से यहां के हिमनदों, हिमानियों और हिम झीलों पर किस तरह के प्रभाव पड़ रहे हैं, इस पर सतत निगरानी रखने और जानकारी जुटाने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि इन प्रभावों से हिमनदों और हिम झीलों से निकलने वाली जलधाराओं के जलग्रहण क्षेत्रों के भूगोल, वहां के समाज और उनकी आजीविका पर किस तरह के संभावित असर पड़ सकते हैं, इसका भी अध्ययन किया जाना चाहिए।

इन प्रभावों का इनसे निकलने वाली जलधाराओं के के जलग्रहण क्षेत्र के भूगोल, वहां के समाज और उनकी आजीविका पर किस तरह के संभावित असर पड़ सकते हैं। इन दुष्प्रभावों को कम करने के लिए हिमालय से जुड़े देशों को सामुहिक स्तर पर किस तरह के प्रयास किए जाने चाहिए, देशों के स्तर पर जिम्मेदारी निश्चित होनी चाहिए। इसी के साथ अपने देश में केंद्र,राज्य, जिला और भुग्तभोगी इकाई गांव स्तर पर क्या जिम्मेदारी और तैयारी होनी चाहिए इस पर सकारात्मक रुप से कार्य किए जाने की जरूरत है।

दो दशक से संयुक्त मोर्चे की मांग

1982 में चिपको आंदोलन को नेतृत्व प्रदान करने के लिए सामुदायिक नेतृत्व श्रेणी में रैमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित भट्ट ने कहा कि वह पिछले दो दशक से इन दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं की मारक क्षमता कम करने के लिए हिमालय से जुड़े देशों से इस मसले पर संयुक्त मोर्चा बनाने की लगातार मांग करते आ रहे हैं। इस संबंध में वे तत्‍कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी से भी निवेदन कर चुके हैं।

श्री भट्ट ने कहा कि क्षेत्रीय स्तर पर जहां चीन, नेपाल, भूटान और भारत को इसके रोकथाम के लिए एक मंच बनाना चाहिए वहीं राष्ट्रीय स्तर पर हिमालय के संरक्षण और विकास के लिए राष्ट्रीय हिमालय आयोग की स्थापना कर इस दिशा में शोध और विकास के कार्य किए जाने चाहिए।

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