शहर के 6 लाख में से आधे घरों में ही वैध नल कनेक्शन, पानी पर खर्च होने वाले धन का पांचवा हिस्सा ही मिल रहा निगम के खजाने में- निगमायुक्त क्षितिज सिंघल
इंदौर, 31 मई। शहर में पानी संकट के बीच संस्था सेवा सुरभि द्वारा रविवार को सुबह साउथ तुकोगंज स्थित एक होटल के सभागृह में आयोजित रचनात्मक विमर्श कार्यक्रम में जहाँ शहर के प्रबुद्धजनों ने पानी की बचत के लिए सुझावों से लेकर नर्मदा के प्रथम चरण से लेकर अब तक के अभियानों पर अपनी-अपनी बातें रखीं, वहीं नगर निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल ने इस संकट का दूसरा पहलू भी नगर निगम में दर्ज आंकड़ों की खाताबही के हवाले से यह कहते हुए उजागर किया कि शहर में पेयजल का संकट नहीं बल्कि समस्या उसके वितरण व्यवस्था की है।
निगमायुक्त श्री सिंघल ने कहा कि शहर में रोजाना करीब 400 एमएलडी पानी आने के बावजूद कुल 6 लाख से अधिक घरों में से केवल 2 लाख 99 हजार घरों में ही वैध जल कनेक्शन है। बहुत से लोगों ने एक हजार वर्गफीट वाले प्लाट पर बहुमंजिले भवन बना रखे हैं, जहाँ पहले 5 लोगों के परिवार को पानी की जरूरत थी, वहां अब 25 से 30 लोग रह रहे हैं। इस स्थिति में उन्हें भी टैंकर की जरूरत महसूस होने लगी है। स्थिति यह है कि नर्मदा का पानी जलूद से शहर में लाने पर जो खर्च हो रहा है, उसका पांचवा हिस्सा भी नगर निगम के खजाने में जमा नहीं हो पा रहा है।
उन्होंने कहा कि शहर में पानी वितरण पर निगरानी रखने के लिए तकनीकी स्टाफ बहुत कम है। 40 लाख उपभोक्ताओं को पानी देने की निगरानी के लिए मात्र 100-125 लोगों का स्टाफ हमारे पास है। तकनीकी स्टाफ की कमी के कारण भी किसी एक संस्था के भरोसे नहीं रहा जा सकता, इसलिए जल संकट के इस दौर में आम नागरिकों का भी दायित्व है कि वे पानी बचाने का प्रयास करें। अब ग्रीष्मकाल में पानी बचाने के लिए एक अभियान चलाने की जरूरत है।

संस्था सेवा सुरभि द्वारा आयोजित इस वैचारिक मंथन में भोपाल से आए वरिष्ठ पत्रकार एवं विचारक राकेश दीवान, वरिष्ठ अभिभाषक अनिल त्रिवेदी, पर्यावरणविद ओपी जोशी, डॉ. एसएल गर्ग, प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष अरविन्द तिवारी ने प्रारम्भ में तुलसी के पौधे को जल समर्पित कर विमर्श का शुभारंभ किया।
इस मौके पर संस्था से जुड़े पर्यावरण संबंधी विषयों पर लिखने वाले कुमार सिद्धार्थ को नागपुर में आयोजित कांफ्रेंस में केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी के हाथों सम्मानित होने पर संस्था की ओर से भी सम्मानित किया गया। कलाकर्मी संजय पटेल, वीरेन्द्र गोयल, वीके गुप्ता एवं सेवा सुरभि के संयोजक ओमप्रकाश नरेडा ने उन्हें स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया।

चर्चा की शुरुआत वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीवान ने यह कहते हुए की कि हम पेड़ कितने ही लगा लें, जंगल नहीं बसा सकते। हमारे घर रहने की जगह के बदले सामान भरने के काम आ रहे हैं। जरूरत से ज्यादा सामान जुटाकर हम बरसों से यही सब करते आ रहे हैं। पर्यावरण की स्थिति बिगडती जा रही है। हम जिन्हें अनपढ़ और गंवार कहते हैं, वे हमसे ज्यादा बेहतर तरीके से पानी बचा लेते हैं। हमने गाड़ियों को धोने से लेकर सड़कों को साफ़ करने में पानी बहा दिया। शहरी मध्यम वर्गीय पाखंड में डूबा है। हमें स्वयं पर सवाल खड़े करना होंगे कि यह कथित मध्यम वर्गीय इन सब अभियानों से दूरी ही बनाए हुए हैं।
भूगर्भ जल विशेषज्ञ डॉ. सुधीन्द्र मोहन शर्मा ने कहा कि हम ऐसे गिने-चुने शहरों में हैं, जहाँ कोई नदी नहीं है। हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई जैसे बड़े शहरों में कोई नदी नहीं है और यही स्थिति इंदौर की भी है। हमारे तालाब सूखते जा रहे हैं। पिछले वर्ष लगभग 40 इंच वर्षा के बावजूद अचानक इस बार जल संकट क्यों बढ़ गया। 5 वर्षों से हम भूजल स्तर के मामले में आगे रहे हैं। इसके बावजूद हमारे बोरवेल सूख गए हैं। मतलब हम प्रकृति की उदारता का फायदा उठा रहे हैं। नर्मदा के आगमन और संस्था सेवा सुरभि द्वारा 25 वर्ष पहले शुरू किए गए वाटर रिचार्जिंग अभियान का मैं स्वयं साक्षी रहा हूँ। फिर भी आज हम वहीं के वहीं हैं। जल संकट के साथ अब जल प्रदूषण भी चिंता का एक बड़ा विषय बन गया है। पानी से जुड़े अलग-अलग तरह के संकट हमारे सामने आते जा रहे हैं। वाटर रिचार्जिंग की मॉनिटरिंग के साथ ही हमें अपनी पानी की जरूरतों को भी कैसे कम करना है यह चिंतन भी जरुरी है।
औद्योगिक संगठन पीथमपुर के अध्यक्ष गौतम कोठारी ने पीथमपुर की जल समस्या पर ध्यानाकर्षण करते हुए कहा कि घरों में पानी का कम से कम दुरुपयोग हो इसका भी ध्यान रखना होगा। पर्यावरणविद दिलीप वाघेला ने सुझाव देते हुए कहा कि सरकारी दफ्तरों और भवनों की छतों पर जल पुर्नभरण की व्यवस्था अनिवार्य होना चाहिए। बाग-बगीचों में भी वाटर रिचार्जिंग व्यवस्था होना चाहिए। जल वितरण प्रणाली का आधुनिकीकरण भी जरुरी है। हमारा 40 प्रतिशत पानी व्यर्थ जा रहा है। सीवरेज के पानी का अधिकतम उपयोग करना हमारी आदत में आना चाहिए।
सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती मेघा बर्वे ने कहा कि शहर के आसपास के 16 तालाब और जिले के 45 बड़े तालाबों का जल स्तर कम हो गया है। तालाबों के आसपास के लोगों को पानी बचाने और बेहतर उपयोग करने की समझाइश देना होगी। कुएं- बावड़ी साफ तो किए गए पर उनके पानी का उपयोग नहीं हो पा रहा है। सीमेंटेड और टाइल्स वाले घरों में वाटर हार्वेस्टिंग करने के लिए प्रयास होना चाहिए। शहर के 1200 बगीचों को जिन्दा रखना भी बड़ी चुनौती है।
केट के सेवानिवृत्त वरिष्ठ वैज्ञानिक निकेतन सेठी ने कहा कि नर्मदा जल की आपूर्ति करने वाली पाइपलाइन का वाल्व जलूद से इंदौर के बीच कुछ स्थानों पर खोल लिया गया है जिससे नर्मदा का पानी दतोदा के पास बह रहा है। ऐसे अनेक लीकेज हैं जिन पर ध्यान देना होगा। जैन इंजीनियरिंग सोसायटी ने 2 तालाबों को गहरा करने का काम हाथ में लिया है। इसी तरह अन्य तालाबों पर भी ध्यान देना होगा।
इंदौर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष अरविन्द तिवारी ने कहा कि शहर में पानी तो पर्याप्त है पर मूल समस्या वितरण की है। पानी आपूर्ति का नियमित ऑडिट होते रहना चाहिए। रिचार्जिंग सिस्टम का भी ऑडिट कराना जरुरी है। प्रेस्टीज विवि के डॉ. हिमांशु उपाध्याय ने कहा कि नियम तो बहुत से बने हुए हैं लेकिन उनपर अमल भी कराना जरुरी है। जल जनित बीमारियों के बारे में वर्ष 2019 में ही बता दिया गया था, सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट और सिफारिशों पर भी ध्यान देना चाहिए।
जीएसआईटीएस के वैज्ञानिक डॉ. संदीप नारुलकर ने कहा कि हम 70 किमी दूर से महंगा पानी ले तो आएं हैं पर जो नुकसान हो रहा है उसपर कोई ध्यान नहीं है। हम सबके घरों में आरओ लगे हुए हैं क्योंकि हम विश्वास नहीं करते कि नर्मदा से हमें शुद्ध पानी मिल रहा है। हम सबको अपने-अपने घरों में संपवेल लगाकर तीसरी-चौथी मंजिल तक पानी चढाना पड़ रहा है। अब चौथे चरण की बात चल रही है। यह दावा किया जा रहा है कि हमें 24 घंटे पानी मिलेगा लेकिन जब तक हम पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्र में नए जल स्त्रोत नहीं तैयार करेंगे, पानी का संकट बना रहेगा। चर्चा के बीच सूत्रधार संजय पटेल ने निगामयुक्त क्षितिज सिंघल को सुझाव दिया कि नगर निगम को ऐसा पर्यावरण प्रकोष्ठ बना लेना चाहिए जो दो-तीन माह में एक बार बैठक कर पानी से जुडी समस्याओं पर विचार मंथन करता रहे। पूर्व पार्षद अरविन्द बागड़ी ने कहा कि शहर में ड्रेनेज कर्मियों की कमी है। 6 हजार घरों की समस्याओं को एक या दो व्यक्ति नहीं ठीक कर सकते। नर्मदा की पाइपलाइन के जॉइंट भी पुराने और कमजोर हैं कि पानी के दबाव के कारण 15 से 25 प्रतिशत पानी फालतू बह जाता है।
नर्मदा प्रोजेक्ट से जुड़े पूर्व आईएएस डॉ. मुकेश चौहान ने नर्मदा योजना के तकनीकी पक्ष को प्रस्तुत किया और सुझाव दिया कि भूजल रिचार्ज की स्थिति सुधर जाए तो बहुत हद तक हमारी समस्या हल हो जाएगी।
सामाजिक कार्यकर्त्ता संदीप खानवेलकर ने सुझाव देते हुए कहा कि हम जल के साथ हिंसा कर रहे हैं। हम पानी का दोहन करने में तो पूरा समय लगा रहे हैं पर बचाने पर न तो समय दे रहे हैं और न ही ध्यान। सुन्दरता पानी को खा रही है। शहर से पानी सहेजने वाले वृक्ष गायब होते जा रहे हैं। विकास की बात तो हो रही है लेकिन हमारे पौधों के पत्ते गंदे हो गए हैं। लोगों ने पेड़ काटना शुरू कर दिए हैं। हम समस्या की तो बात करते हैं पर समाधान में तत्परता नहीं दिखा रहे हैं। सीमेंटीकरण के कारण शहर के नाले भी खत्म हो रहे हैं।
इस विमर्श में डॉ. एसएल गर्ग, सुनील व्यास, पंकज कासलीवाल, वीरेन्द्र गोयल, अजीतसिंह नारंग ने भी अपने महत्वपूर्ण सुझाव दिए।
प्रारम्भ में विषय प्रवर्तन करते हुए सूत्रधार संजय पटेल ने कहा कि मालवा का मौसम बदल रहा है। हमारी आबोहवा और प्रकृति में भी बदलाव आ रहा है। कैलाश विजयवर्गीय के महापौर कार्यकाल में संस्था सेवा सुरभि ने एक हजार से ज्यादा घरों में वाटर रिचार्जिंग और विभिन्न सड़कों पर पौधरोपण का काम शुरू किया था, जो लगातार चल रहा है पर इसमें और गति लाने की जरूरत है। समस्याएँ सबको पता है लेकिन हमें अब समाधान की जरूरत है। इंदौर पर्यावरण की राजधानी बन गया है। हमें फक्र होता है कि हम एक बढ़िया मौसम वाले शहर के नागरिक हैं। इस मौके पर नगर निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल को संस्था की ओर से मोहित सेठ एवं अरविन्द बागड़ी ने स्मृति चिन्ह भेंट किए।

इस विमर्श का समापन वरिष्ठ अभिभाषक अनिल त्रिवेदी ने अपने प्रभावी उद्बोधन में यह कहते हुए किया कि हम सब शार्टकट में सोचते हैं, लॉन्गटर्म में नहीं। हमारे पास 50 साल का नर्मदा को उठाकर लाने का अनुभव है। जो पानी हमारे घरों में आ रहा है वो नाली के माध्यम से नर्मदा के रुख में कहीं न कहीं कान्ह नदी की प्राण प्रतिष्ठा करते आ रहा है। नर्मदा को लाने से हमारे पास जितने परम्परागत जल स्त्रोत थे, उन पर से हमारा ध्यान हट गया। हमने बावडियों पर घर बना लिए, कुएं और हैण्डपम्प जो मानव श्रम से चलते थे, उनका उपयोग बंद कर दिया। अब हम बटन दबाकर एक माह में ही पूरे साल का पानी खर्च कर रहे हैं। हमारा टास्क यह होना चाहिए कि नर्मदा आने के बाद हम फिर से कैसे पानीदार बनें। जोधपुर, बाड़मेर में 2 से 4 इंच वर्षा के बाद भी राजस्थान के शहर शान से जी रहे हैं लेकिन हमारे यहाँ गत वर्ष 42 इंच बारिश के बाद भी हम पानी के लिए तरस रहे हैं तो यह वितरण व्यवस्था की गडबडी है। गडबडी पानी में नहीं है हमारे सोच में है। हमें सरकार से बड़ा खतरा बाजार का है। बाजार से हम जो उपकरण लेकर आएं हैं वे सब बिजली से चलते हैं। पानी के मामले में भी हमें उतनी ही खपत करना चाहिए जितनी जरूरत हो।
कार्यक्रम में संस्था के संयोजक ओमप्रकाश नरेडा ने बताया कि संस्था द्वारा जल्द ही शहर के विभिन्न क्षेत्रों में पानी की बचत के लिए जागरूकता और चेतना लाने का उद्देश्य से एक अभियान चलाया जाएगा। इसमें एक ई-रिक्शा पर पानी बचाने के प्रेरक स्लोगन और सन्देश भी लिखे हुए हैं और संस्था के सदस्य भी करीब 15 हजार पर्चे घर-घर जाकर लोगों को समझाइश देकर बाटेंगे कि पानी की बचत कैसे की जाए। यह अभियान अगले सप्ताह से शुरू किया जाएगा। नगर निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल ने रविवार को कार्यक्रम स्थल पर इस ई-रिक्शा का अवलोकन भी किया और संस्था द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना भी की।
संचालन संजय पटेल ने किया और आभार माना संयोजक ओमप्रकाश नरेडा ने। अतिथियों ने इस अवसर पर संस्था द्वारा प्रकाशित पानी बचाने के 5 विभिन्न तरह के पोस्टरों का लोकार्पण भी किया जिनका वितरण अभियान के दौरान किया जाएगा। संस्था के सदस्य मोहन अग्रवाल ने देवी अहिल्या के 301वें जन्मोत्सव के प्रसंग पर सबको देवी अहिल्या के चित्र वाले पोस्टकार्ड भी भेंट किए।


