इंदौर, 19 मई। मध्य प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री, समाजवादी नेता ओमप्रकाश रावल की धर्मपत्नी एवं नर्मदा बचाओ आंदोलन की वरिष्ठ सहयोगी कृष्णा रावल (90 वर्ष) का मंगलवार सुबह निधन हो गया। उनके निधन की खबर से सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षकों, नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े साथियों और विभिन्न जन आंदोलनों, संस्थाओं के कार्यकर्ताओं में शोक की लहर फैल गई।
उनकी अंतिम यात्रा सुबह इंदौर के सुदामा नगर स्थित निवास से निकली, जिसमें बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद, राजनीतिक सहयोगी और नर्मदा आंदोलन से जुड़े लोग शामिल हुए। इसके बाद पंचकुइयां मुक्ति धाम में उनका अंतिम संस्कार किया गया। मुक्तिधाम पर संक्षिप्त शोक सभा में अनिल त्रिवेदी, रामबाबू अग्रवाल, रामस्वरूप मंत्री, अमूल्य निधि, चिन्मय मिश्र सहित अनेक स्नेहीजनों ने श्रद्धासुमन अर्पित किये।
श्रीमती कृष्णा रावल एक कुशल शिक्षिका, संवेदनशील समाजसेवी और जन आंदोलनों की आत्मीय सहयोगी के रूप में जानी जाती थीं। उनका व्यक्तित्व सरलता, स्नेह, करुणा और संघर्षशीलता का प्रतीक माना जाता था। नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता उन्हें स्नेहपूर्वक “कृष्णा मौसी” कहकर पुकारते थे।
नर्मदा आंदोलन के संघर्षों की मजबूत सहयोगी रहीं
नर्मदा बचाओ आंदोलन के वरिष्ठ साथी श्रीपाद धर्माधिकारी और नंदिनी ओझा ने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कहा कि कृष्णा रावल ने आंदोलन के शुरुआती दौर से ही नर्मदा घाटी के लोगों के संघर्ष को अपना सक्रिय समर्थन दिया। उनके पति स्वर्गीय ओमप्रकाश रावल 1980 के दशक में बड़े बांधों के खिलाफ वैचारिक हस्तक्षेप करने वाले प्रमुख लोगों में रहे। उन्होंने उस दौर में बड़े बांधों के सवालों पर साहित्य तैयार किया, जिनमें ‘बड़े बांध कई सवाल’ जैसी पुस्तिका उल्लेखनीय रही।

कृष्णा रावल ने भी इस संघर्ष में हमेशा एक मजबूत सहयोगी की भूमिका निभाई। नर्मदा आंदोलन से जुड़े वरिष्ठ कार्यकर्ता आलोक अग्रवाल ने कहा कि इंदौर स्थित उनका घर नर्मदा आंदोलन के कार्यकर्ताओं के लिए हमेशा खुला रहता था। देशभर से आने वाले कार्यकर्ताओं को वहां घर जैसा अपनापन, भोजन और रहने की व्यवस्था मिलती थी।
आलोक अग्रवाल ने भावुक होकर कहा, “कृष्णा जी का घर हम जैसे कार्यकर्ताओं का घर जैसा था। उनमें वही मातृत्व भाव था। जब भी हम वहां जाते थे, घर जैसी आत्मीयता मिलती थी। वे अत्यंत सरल स्वभाव की, सुलझी हुई और करुणा से भरी महिला थीं।”
नर्मदा आंदोलन से जुड़े साथियों का कहना है कि उन्हें स्नेहपूर्वक “कृष्णा मौसी” इसलिए कहा जाता था क्योंकि वे केवल कार्यक्रमों में उपस्थित होकर नैतिक समर्थन ही नहीं देती थीं, बल्कि आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं को अपने परिवार जैसा स्नेह और अपनापन भी देती थीं। उनका घर दिन-रात आंदोलनकारियों के लिए खुला रहता था।
रावल जी के निधन के बाद भी सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रहीं
नर्मदा आंदोलन से जुड़े लोगों ने बताया कि ओमप्रकाश रावल के निधन के बाद भी कृष्णा रावल ने अपने सामाजिक सरोकारों को कभी नहीं छोड़ा। वे लगातार नर्मदा घाटी, विस्थापन, पानी और क्षेत्रीय जन संघर्षों से जुड़े कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी करती रहीं। उनकी उपस्थिति आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए हमेशा ऊर्जा, स्नेह और नैतिक बल का स्रोत रही। कार्यकर्ताओं का कहना है कि कृष्णा रावल केवल एक सहयोगी नहीं थीं, बल्कि आंदोलन के परिवार की अभिन्न सदस्य थीं।
नर्मदा आंदोलन से जुड़े वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने कहा कि हाल के दिनों में आंदोलन के कई वरिष्ठ सहयोगियों के निधन से वह पूरी पीढ़ी धीरे-धीरे विदा हो रही है, जिसने दशकों तक संघर्ष की नींव रखी और उसे मजबूती दी। उनका योगदान, समर्पण और साहस हमेशा याद किया जाएगा।
शिक्षिका से आंदोलन की ‘कृष्णा मौसी’ तक
श्रीमती कृष्णा रावल ने लगभग तीन दशक तक शिक्षिका के रूप में सेवाएं दीं। वे इंदौर के अहिल्या आश्रम क्रमांक-1 में प्राचार्य के पद से सेवानिवृत्त हुई थीं। वे कन्नड़ भाषा की भी अच्छी जानकार थीं। इसी विशेषज्ञता के कारण वे करीब 20 वर्षों तक माध्यमिक शिक्षा मंडल में बोर्ड परीक्षा के पेपर सेटर के रूप में भी जुड़ी रहीं। उनका एकमात्र पुत्र असीम रावल वर्तमान में अमेरिका में निवास करते हैं।
श्रीमती कृष्णा रावल की सादगी, मातृत्व भाव और संघर्षरत लोगों के प्रति उनका समर्पण उन्हें विशेष बनाता था। नर्मदा घाटी और सामाजिक आंदोलनों से जुड़े कार्यकर्ताओं के बीच उनका घर, उनका स्नेह और उनका सहयोग हमेशा याद किया जाएगा।
अनेक सामाजिक संगठनों ने दी श्रद्धांजलि
श्रीमती कृष्णा रावल के निधन पर सर्वोदय प्रेस सर्विस के संपादक राकेश दीवान, गांधी शांति प्रतिष्ठान, सर्वोदय शिक्षण समिति के कुमार सिद्धार्थ, डॉ. सम्यक जैन, नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर, विसर्जन आश्रम के अध्यक्ष करूणाकर त्रिवेदी, गांधी भवन, भोपाल के अध्यक्ष संजय सिंह सहित अनेक सामाजिक संगठनों, शिक्षकों और विभिन्न जन आंदोलनों से जुड़े लोगों ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
शोक संदेशों में कहा गया कि कृष्णा रावल का योगदान, उनका समर्पण, स्नेह और साहस संघर्ष की सामूहिक स्मृति में हमेशा जीवित रहेगा। उनके निधन से सामाजिक आंदोलनों ने अपनी एक आत्मीय संरक्षक और संवेदनशील साथी को खो दिया है।


