नई दिल्ली, 20 अप्रैल । जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) फसलों के आयात और उनके संभावित प्रभाव को लेकर देश में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। ‘जीएम-मुक्त भारत गठबंधन’ (Coalition for a GM-Free India) ने केंद्र सरकार को एक विस्तृत पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि विदेशी, विशेषकर अमेरिकी हित समूह, व्यापारिक समझौतों और संस्थागत सहयोग के माध्यम से भारत के कृषि और खाद्य तंत्र को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे गठबंधन ने कृषि, वाणिज्य, पर्यावरण और स्वास्थ्य मंत्रियों से आग्रह किया है कि वे अमेरिकी दबाव के आगे न झुकें और देश की जैव-विविधता व जन-स्वास्थ्य की रक्षा करें।
कोएलिशन फॉर जीएम-फ्री इंडिया गठबंधन के श्रीधर राधाकृष्णन ने बताया कि हाल के वर्षों में खाद्य तेल और पशु-आहार के रूप में उपयोग होने वाले उत्पादों के आयात में वृद्धि के साथ जीएम मक्का, सोयाबीन तेल और डीडीजीएस (DDGS) जैसे उत्पादों के भारत में प्रवेश की संभावनाएं बढ़ी हैं। गठबंधन ने साक्ष्यों के साथ बताया है कि कैसे अमेरिकी संस्थाएं भारत की नियामक व्यवस्थाओं को प्रभावित कर रही हैं। पत्र में दावा किया गया है कि अमेरिकी राज्य आयोवा और भारतीय औद्योगिक समूहों के बीच हुए समझौतों के जरिए महाराष्ट्र जैसे राज्यों को जीएम मक्का और इथेनॉल आयात के लिए संभावित ‘प्रवेश द्वार’ बनाया जा रहा है। अमेरिकी एजेंसियां दावा कर रही हैं कि जीएम सोयाबीन तेल और DDGS में आनुवंशिक सामग्री नहीं होती, जबकि स्वतंत्र वैज्ञानिक परीक्षणों ने इन प्रसंस्कृत उत्पादों में भी जीएम अंशों की उपस्थिति की पुष्टि की है।
भारत में अवैध जीएम फसलों की मौजूदगी न केवल पर्यावरण के लिए खतरा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय कृषि उत्पादों (जैसे चावल) की साख को भी खत्म कर रही है।
इन परिस्थितियों में गठबंधन ने केंद्र सरकार से कई मांगें की हैं, अमेरिका से आने वाले जीएम बिनौला तेल, सोयाबीन तेल और DDGS के आयात को तुरंत रोका जाए। भारत सरकार के नीतिगत निर्णयों में हस्तक्षेप करने वाले विदेशी वित्तपोषित संस्थानों (SABP, BCIL, AFSI) की भागीदारी समाप्त की जाए। ‘सोया एक्सीलेंस सेंटर’ और USGC के कार्यालयों को बंद किया जाए जो भारतीय किसानों के हितों के विरुद्ध काम कर रहे हैं।
फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से इस पत्र पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन यह मुद्दा आने वाले समय में व्यापक नीति बहस का केंद्र बन सकता है। गठबंधन का कहना है कि यह केवल व्यापार का मामला नहीं, बल्कि देश की खाद्य संप्रभुता और भविष्य की कृषि दिशा से जुड़ा प्रश्न है, जिस पर निर्णय लेते समय दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।


