चंबल घाटी से फिर उठी अहिंसा की आवाज

भारत डोगरा

            इस वर्ष 14 अप्रैल को चंबल घाटी में बागियों-डाकुओं के समर्पण के 54 वर्ष पूर्ण हुए। इस अवसर पर समर्पण करने वाले अनेक बागी यहां एकत्र हुए व उन्होंने अहिंसा व अमन-शांति की राह के लिए अपनी प्रतिबद्धता नए सिरे से दोहराई। अहिंसा व अमन के लिए दुनिया के सामने एक बड़ा उदाहरण रखने के लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया।

            इस समारोह का आयोजन महात्मा गांधी सेवा आश्रम ने किया जो मुरैना जिले के नगर जौरा (मध्य प्रदेश) में स्थित र्है। इस आश्रम की चंबल घाटी के सबसे बड़े बागी समर्पणों और उससे जुड़ी व्यापक शान्ति प्रक्रिया में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। यहां के जाने-माने अमन-शांति के कार्यकर्ताओं जैसे ‘भाई जी’ सुब्बा राव और पी वी राजगोपाल और उनके अनेक साथियों ने बहुत स्मरणीय योगदान दिया। इस प्रयास की बुनियाद मजबूत करने में रण सिंह परमार जैसे अनेक गांधीवादी कार्यकर्ताओं ने दशकों तक बहुत मेहनत की।

            हाल के समय में भाई जी सुब्बाराव और रण सिंह परमार के निधन से इस अहिंसा श्क्ति प्रयास को जो आधात लगा है, उसके उभरने के लिए व नई ऊर्जा से शांति प्रयासों को बढ़ाने के लिए भी आवश्यक हो गया था कि ऐसे किसी प्रेरणादायक समारोह के माध्यम से इस अमन-शांति के अभियान में निरंतरता लाई जाए।

            पी.वी. राजगोपाल ने इस समारोह में कहा कि आज जिस तरह युद्ध व हिंसा से मानवता त्रस्त है, उस माहौल में शान्ति प्रयासों व अहिंया के संदेश की जरूरत बहुत बढ़ गई है। इस संदर्भ में पूरी दुनिया महात्मा गांधी की ओर देखती है और महात्मा गांधी के देश से अमन-शान्ति के लिए दुनिया को महत्त्वपूर्ण संदेश भी मिलने चाहिए और अहिंसा शक्ति की सफलता के प्रेरणादायक उदाहरण भी मिलते रहने चाहिए। चम्बल घाटी के बागियों का बंदूक छोड़कर अहिंसा की राह पर आना तथा इससे पहले व बाद की व्यापक शान्ति प्रक्रियाएं एक ऐसा ही प्रेरणादायक उदाहरण है। उन्हांने कहा कि अब चंबल की घाटी में हिंसा व अमन-शान्ति को और मजबूत कर हमें पूरी दुनिया के लिए एक और भी अधिक असरदार अहिंसा का संदेश यहां से भेजना चाहिए।

            पी वी. राजगोपाल ने आगे कहा कि समाज में हिंसा की अनेक परत होती है। एक बार बागियों का समर्पण हो जाने से ऐसा नहीं होता है कि सभी तरह की हिंसा समाप्त हो जाती हैं। अतः न्याय आधारित शान्ति के प्रयास व पर्यावीरण की रक्षा के प्रयास निरंतरता से जारी रहने चाहिए। उन्होंने कहा कि इसके लिए हम सभी को अथक प्रयास जारी रखने होंगे। जाने-माने गांधीवादी विद्वान मनोज कुमार ने कहा कि वे शोध-प्रयास से नवीनतम जानकारी उपलब्ध करने में प्रयास करेगे कि आज की स्थिति में कौन सी समस्याएं अधिक विकट हुई हें व उनके क्या समाधान हो सकते हैं। जिल कार हैरिस ने महिलाओं के एक शान्ति प्रयास ‘वुमैन्स काल फार ग्लोबल पीस’ की जानकारी दी।

            पूर्व उच्च पुलिस अधिकारी (डीजीपी) अनुराधा बहन अब इन शान्ति प्रयासों को सशक्त करने के लिए बहुत प्रयासरत हैं। उन्होंने लिंग, जाति व धर्म आधारित भेदभाव, संकीर्णता व हिंसा को समाप्त करने पर जोर दिया। उपस्थित गांववासियों पर उनके संदेश का इतना असर हुआ कि उन्होंने इसे दोहराने के लिए कहा।

            जाने-माने लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता राकेश दीवान ने कहा कि मौजूदा आर्थिक मान्यताओं और उनपर आधारित तथाकथित विकास में अनेक भ्रांतिया हैं, अंधाधुंध उपभोक्तावाद व लालच है तथा इस कारण भी हिंसक सोच कई स्तरों पर बढ़ती है। यदि इसके स्थान पर गांधीजी के सादगी-समता-सहयोग के मूल्य प्रतिष्ठित हों तो हिंसा की संभावना अपने आप कम हो जाएगी।

       एस एन सुब्‍बराव की स्‍मृति में आयेाजित प्रथम व्‍याख्‍यानमाला में विख्यात सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता रघु ठाकुर ने कहा कि हमें जिन महापुरुषों की विरासत प्राप्त है, उनसे आपसी विरोध की किसी अतिश्योक्ति के स्थान पर उनके समान उद्देश्यों और इनके लिए किए उनके अथक प्रयासों की एकता पर अधिक ध्यान देना चाहिए। गांधी-आंबेडकर विवादों के तीखेपन को नकारते हुए उन्होंने समान उद्देश्यों के लिए सामाजिक भेदभाव की समाप्ति के उनके प्रयासों की एकता को प्रतिष्ठित किया।

            समपर्ण करने वाले लगभग 15 बागी यहां एकत्र हुए थे व उन्होंने बताया कि पुनर्वास संबंधी सभी वायदे पूरे न होने पर भी वे बहुत प्रसन्न हैं कि उन्होंने हिंसा व बंदूक की राह को छोड़ा तथा अमन-शांति का मार्ग अपनाया। उनमें से अनेक ने कहा कि उनके जो भूमि-विवाद आज तक फंसे हुए हैं, उन्हें यदि प्रशासन सुलझा दे तो उन्हें बहुत राहत मिलेगी।

            इस आयोजन में उस समय माहौल बहुत भावुक हो गया है जब एक पूर्व बागी की बेटी ने मंच पर आकर कहा कि उनके पूरे परिवार को व विशेषकर नई पीढ़ी को समर्पण से कितना बड़ा सहारा मिला जिससे वे सामान्य जीवन व सामाजिक प्रतिष्ठा की ओर लौट सके।

            इस बेटी के संदेश में दुनिया के लिए एक बहुत व्यापक संदेश भी है। आज जब युद्ध और हथियारों की होड़ से दुनिया सकंटग्रस्त है, उस समय यह युवा पीढ़ी की व बच्चों की भी पुकार है कि उनके भविष्य को युद्ध व तबाही से बचाने के लिए अमन-शांति व अहिंसा की राह को अपनाया जाए।

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