डॉ. विश्वजीत
रायगढ़ा (ओडिशा), 11 अप्रैल। ओडिशा के रायगढ़ा जिले के कंटामाल गाँव में Sijimali Bauxite Mining Project के संदर्भ में 7 अप्रैल की भोर में हुई पुलिस कार्रवाई पर गांधीवादी जन संगठनों ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया है। गांधी शांति प्रतिष्ठान, उत्कल सर्वोदय मंडल, राष्ट्रीय युवा संगठन सहित विभिन्न संगठनों ने संयुक्त बयान जारी कर इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा की है और इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध बताया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, 7 अप्रैल को तड़के लगभग तीन बजे 100 से अधिक पुलिसकर्मी कुछ निजी व्यक्तियों के साथ कंटामाल गाँव में पहुंचे। आरोप है कि ग्रामीणों को घरों से बाहर निकालने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया और बाहर आने पर उन पर लाठियों से हमला किया गया। इस कार्रवाई में 50 से अधिक ग्रामीणों के घायल होने की सूचना है, जिनमें अनी माझी, नारिंग देई माझी, लाली माझी, कुमुटी माझी, बामणी माझी, बुरसा माझी, निंगी माझी, अगाध नायक और रामचंद्र नायक प्रमुख रूप से शामिल हैं। घटना के दौरान दो महिलाओं के सिर में गंभीर चोटें आईं, जबकि एक मवेशी की मृत्यु की भी जानकारी सामने आई है। ग्रामीणों में भय का वातावरण बनाने के लिए हवाई फायरिंग किए जाने के आरोप भी लगाए गए हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में दहशत फैल गई। यह कार्रवाई कई घंटों तक जारी रहने की बात कही जा रही है। दूसरी ओर, जिला पुलिस अधीक्षक ने प्रेस वार्ता में बताया है कि इस झड़प में 50 से अधिक पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं।
सिजीमाली खनन परियोजना एवं जन-आक्रोश
यह पूरा विवाद सिजीमाली बॉक्साइट खनन परियोजना से जुड़ा हुआ है, जिसका केंद्र कंटामाल गाँव बना हुआ है। कालाहांडी और रायगढ़ा जिलों के थुआमुल रामपुर और काशीपुर ब्लॉकों में विस्तारित इस परियोजना के लिए मार्च 2023 में ओडिशा सरकार ने वेदांत लिमिटेड को 1549 हेक्टेयर क्षेत्र में 50 वर्षों के लिए खनन पट्टा प्रदान किया था। स्थानीय ग्रामीण ‘मां माटी माली सुरक्षा मंच’ के नेतृत्व में इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह खनन उनके जल, जंगल और जमीन पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा और उनकी पारंपरिक आजीविका को संकट में डाल देगा। इस परियोजना से संबंधित मामला वर्तमान में राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष विचाराधीन है।
ग्रामसभाओं में धांधली एवं संवैधानिक उल्लंघन
सिजीमाली क्षेत्र में खनन परियोजना हेतु आयोजित की गई ग्रामसभाएं पूर्णतः अलोकतांत्रिक और फर्जी रही हैं। जब विभिन्न गाँवों में ग्रामसभाओं का आयोजन किया गया था, उस समय वेदांता से खनन का ठेका लेने वाली ‘मैत्री कंपनी’ तथा स्थानीय पुलिस प्रशासन द्वारा स्थानीय निवासियों को भयभीत किया गया एवं उन्हें ग्रामसभा स्थल पर जाने से रोका गया। प्रशासन द्वारा अत्यंत आनन-फानन में ग्रामसभा की कार्यवाही पूर्ण की गई ताकि जन-विरोध को दबाया जा सके।
उपलब्ध आधिकारिक अभिलेखों के अनुसार एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि एक ही अधिकारी द्वारा एक ही तिथि और एक ही समय पर 8 विभिन्न गाँवों में ग्रामसभाएं आयोजित दिखाई गई हैं। यह कृत्य स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि कंपनी और सरकार किस प्रकार संवैधानिक प्रावधानों और ‘पेसा’ (PESA) कानून का खुलेआम उल्लंघन कर रहे हैं।
प्रशासनिक हस्तक्षेप एवं निषेधाज्ञा
3 अप्रैल को रायगढ़ा उप-जिलाधिकारी द्वारा खनन परियोजना हेतु सड़क चौड़ीकरण के उद्देश्य से ग्रामीण सड़कों पर BNSS की धारा 163 (तत्कालीन धारा 144 IPC) के अंतर्गत एक महिने के लिये निषेधाज्ञा लागू की गई। सोशल मीडिया पर प्रसारित साक्ष्यों के अनुसार, जिलाधिकारी सुरेश कुलकर्णी द्वारा ग्रामीणों को यह कहकर धमकाया गया कि— “यह भूमि वेदांत की है, यदि आपकी है तो पट्टा दिखाएं।” यह अत्यंत खेदजनक है कि वन अधिकार अधिनियम-2006 के अंतर्गत पट्टा प्रदान करने का उत्तरदायित्व स्वयं जिलाधिकारी का है।
7 अप्रैल की घटना से पहले भी क्षेत्र में तनाव की स्थिति बनी हुई थी। मार्च 2026 में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां की गई थीं। 11 मार्च को तलआमपदर गाँव के 21 आदिवासियों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें 10 महिलाएं शामिल थीं। इनमें एक गर्भवती महिला और दो धात्री माताएं भी थीं। इन पर हत्या के प्रयास और दंगे जैसी गंभीर धाराएं लगाई गईं। आरोप है कि छापेमारी के दौरान पुलिस और निजी व्यक्तियों ने घरों में तोड़फोड़ की और ग्रामीणों के आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड जैसे आवश्यक दस्तावेज भी जब्त कर लिए। वर्तमान में ये सभी ग्रामीण भवानीपटना जिला जेल में निरुद्ध हैं। इसके अतिरिक्त 25 मार्च को आंदोलन के प्रमुख नेताओं लिंगराज आजाद और सुरेश संग्राम को भी गिरफ्तार कर रायगढ़ा जेल भेज दिया गया।
गांधीवादी जन संगठनों ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि कंटामाल और आसपास के गांवों में निर्दोष ग्रामीणों की तत्काल रिहाई सुनिश्चित की जानी चाहिए और आंदोलनकारी नेता लिंगराज आजाद एवं सुरेश संग्राम की तत्काल दोषमुक्ति सुनिश्चित की जाए। संगठनों ने यह भी स्पष्ट किया है कि ग्रामीणों पर हिंसा, हवाई फायरिंग और दमनकारी कार्रवाइयों को तुरंत रोका जाना चाहिए तथा सिजीमाली खनन क्षेत्र में सड़क निर्माण हेतु जारी 3 अप्रैल की निषेधाज्ञा (धारा 163) को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाना चाहिए। अवैध छापेमारी, हिंसा और संपत्ति के नुकसान के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही यह भी मांग की गई है कि सिजीमाली परियोजना से संबंधित ग्रामसभाओं का पुनः पारदर्शी और निष्पक्ष आयोजन किया जाए, जिसमें स्थानीय समुदाय की वास्तविक सहमति को आधार बनाया जाए। संगठनों का यह भी कहना है कि राज्य की खनिज संपदा के अनियंत्रित दोहन को रोकने के लिए एक स्वतंत्र खनिज नीति बनाई जानी चाहिए तथा उत्खनित खनिज संपदा से ‘फिनिश्ड प्रोडक्ट’ तैयार करने हेतु स्थानीय स्तर पर ही उद्योगों की स्थापना की जाए ताकि क्षेत्र का आर्थिक विकास सुनिश्चित होना चाहिए।
कंटामाल की यह घटना एक बार फिर विकास परियोजनाओं और आदिवासी समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन के प्रश्न को सामने लाती है। एक ओर औद्योगिक विकास की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय समुदायों के जल, जंगल और जमीन से जुड़े अधिकारों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता, संवैधानिक प्रावधानों का पालन और संवाद आधारित प्रक्रिया ही इस प्रकार के टकराव का स्थायी समाधान सुनिश्चित कर सकती है।


