विज्ञान और अध्यात्म : प्रकृति से प्रेम ही सनातन है

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विकास, खासकर भौतिक विकास को हिंसक विनाश में तब्दील कर रहे नीति-निर्धारक, राजनेता और पूंजीपति एक बात में समान हैं। वे सब खुद को धार्मिक, सनातनी कहते-मानते हैं, लेकिन क्या उनका धर्म उन्हें प्रकृति के प्रति प्रेम, सरोकार नहीं सिखाता? क्या वे नहीं जानते या जानना चाहते कि ईश्वर का एक रूप प्रकृति, पर्यावरण भी है?


पंचमहाभूतों से निर्मित प्रकृति ही परमात्मा है। भारतीय विज्ञान और अध्यात्म दोनों ने उक्त ‘सत्य’ को सिद्ध किया था। इस सत्य को जब तक हमने अपने व्यवहार और संस्कार में मानकर जीवन जिया था, तभी तक हमारे पास केवल कुछ लिखने के लिए ही नहीं, परन्तु सीखने और दुनिया को सिखाने लायक था। उस काल-खण्ड में भारत सिखाने वाली भूमि थी, इसीलिए हमने  स्वयं को विश्वगुरु मान लिया था। हम थे भी, पर आज नहीं रहे हैं, क्योंकि अब हम भी दुनिया की नकल करने में रुचि रखते हैं।

यहाँ संस्कृति और प्रकृति के योग से ही क्रान्ति, परिवर्तन और विकास की प्रक्रिया चली थी। उसमें भारतीय मानव अपने आप को प्रकृति का अंग मानकर जटिलताओं से मुक्त जीवन का व्यवहार करता था। इसी आवर्तन, परावर्तन को जानकर हमने अपने आप सम्पूर्ण काल-खण्ड को चार भागों में बाँटा था। सत्ययुग में, जब इंसान भी प्रकृति के अन्य अंगों के समान सादगी, सहजता और सरलता का अहिंसक व्यवहार करके जीवन जीता था। उस काल में लोभ, लालच, क्रोध, मोह, महत्वाकांक्षा से मुक्ति थी। तब किसी के भी मन में विद्वान् या राजा बनने का भाव नहीं आता था।

त्रेतायुग में विद्वान् या राजा बनने का भाव आने लगा। प्रकृति के चार पाँवों में से एक पाँव टूटा, तीन पाँव बचे तो ‘त्रेता’ कहलाया। कुछ लोग विद्वान्, ज्ञानदेव बनने लगे और कुछ लोग राजा बने, लेकिन तब भी वे मोह, माया आदि से मुक्त थे। इसलिए विद्वान् और राजा भी प्रकृति के साथ जुड़े रहे। जैसे, राजा जनक की घटना – अकाल मुक्ति हेतु अपनी रानी के साथ मिलकर हल चलाना आदि।

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द्वापरयुग में मथुरा का राजा कंस, आसपास के क्षेत्र को लूटने लगा था। राजा और विद्वानों में धोखेबाज़ी और कलाबाजियों ने जन्म ले लिया था। प्रकृति के दो पैर टूट गये, इसलिए द्वापरयुग कहलाया, लेकिन इस काल में भी कृष्ण जैसा इंसान गोवर्द्धन पर्वत का सहारा लेकर लोगों को बाढ़ से बचा लेता था। वह अतिवृष्टि के कारण आयी बाढ़ से बचाने के लिए गायों सहित सब ग्वालों को लेकर गोवर्द्धन पर्वत पर चला जाता था, जिससे ग्वाल और गायें बाढ़ के प्रकोप से बच जाते थे।

उस काल में भी प्राकृतिक आपदा का समाधान प्रकृति में ही खोजा जाता था। पहाड़ आपदा में सहारा थे। ये ही जलवायु के मददगार बनते थे। द्वापर में कंस भी जब तक सोना निकालने हेतु पहाड़ों को नहीं काट रहा था, तब तक प्रकृति के लुटेरों ने भी इसे ही जीवन का सहारा माना था।

कलियुग आज का युग है, जिसमें आपदा का समाधान भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता में ही खोजा जाने लगा है। यह हमें प्रकृति और परमात्मा दोनों से दूर कर रहा है। प्रकृति से दूर होने के कारण अब प्रकृति के तीन पैर टूट चुके हैं। अब प्रकृति नहीं, कलाओं और कल (मशीन) का युग है। इसीलिए इसे कलयुग कहते हैं, पर इस कलियुग में भी अभी कुछ सम्भावनाएँ शेष हैं। इसलिए हम अपने मूल ज्ञान की तरफ लौटें और प्रकृति व संस्कृति के योग वाले भू-सांस्कृतिक मानचित्र के अनुरूप क्रान्ति, परिवर्तन और विकास की रूपरेखा तैयार करके, कार्य-योजना बनाकर काम करने की तैयारी करें।

इसमें सृष्टि के निर्माता पंचमहाभूत – भूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीर ही भगवान् हैं। नीर -‘जल’, जिसे हम ‘ब्रह्म’ भी मानते हैं, वही ब्रह्माण्ड का सृजन करने वाला है। उसे केन्द्र में रखकर पुनः अपने विस्थापन, बिगाड़, विनाशमुक्त-विकास की योजना बनाकर विकास का रास्ता पकड़ें। कलयुग में भी जटिलताओं से मुक्त होकर सहज, सरल, सादगी से समता और आनन्द भाव सबके जीवन में प्राप्त होगा। यह सनातन विकास ही सतयुग की तरफ ले जायेगा।

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पंचमहाभूत (भ-भूमि, ग-गगन, व-वायु, अ-अग्नि और न-नीर) ही भगवान् हैं। यही परमात्मा, नारायण सब कुछ हैं। इसी के साथ हम अपने शरीर और आत्मा को जोड़कर देखें और जियें, तो कलयुग भी सतयुग बन जायेगा, हमारा जीवन आज भी जटिलता मुक्त बन जायेगा। हमारा ‘कृत’ प्रकृतिमय बनकर सतयुग पुनः स्थापित कर सकता है। बस! प्रकृति को परमात्मा ‘सत्य’ मानकर अहिंसामय जीवन जीना शुरू करें।

पंचमहाभूतों में जल 3.6 खरब वर्ष पहले एक महाविस्फोट में आग के गोले से ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के रूप में छिटककर अलग होने से तथा पुनः इन्हीं तत्वों के मिलने से ‘जल’ बना था। जल से ही धीरे-धीरे जीव बना और यही जीव मिट्टी बनाने लगा। फिर मिट्टी और जल के योग से भूमि व जलीय जीव-जन्तु, जलीय वनस्पति तथा अन्य जीव जन्म लेने लगे थे। जब भूमि, पहाड़, नदी आदि बनने शुरू हुए तो इन जीव-जन्तु, वनस्पतियों को चलाने हेतु ऊर्जा वायु बनकर जीवन देने और जीवन को चलाने लगी। सूर्य तो ऊर्जा का साधन पहले ही था। गगन में वायु भी बन ही गयी थी।

प्रकृति के इसी विस्तार को जानकर प्राचीन भारतीयों ने इसे ही अपने अध्यात्म और विज्ञान का आधार मानकर पंचमहाभूतों को परमात्मा मान लिया था। वे इन पंचमहाभूतों को ही अपना भगवान, नारायण, ब्रह्म मानकर इन्हीं शब्दों द्वारा इसका सम्मान करने लगे थे। यह प्रत्यक्ष सत्य सिद्ध है। हमारे प्राणरूपी जीवन को चलाने वाली ऊर्जा ‘वायु’ को प्राण (आत्मा) मान लिया था। श्वाँस ही तो प्राण है। आयुर्वेद में आरोग्य रक्षण हेतु स्वस्थ श्वाँस को जीवन के लिए जरूरी बताया गया है। वायु ही आत्मा है। इसी ‘सत्य’ ने हमें सनातनी बना दिया। क्योंकि वायु कभी मरती ही नहीं, नष्ट भी नहीं होती, चलती ही रहती है। यही ‘सनातन’ है। इसका आरम्भ और अन्त नहीं है।

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यह सत्य हम भारतीय स्वीकारते हैं। सभी धर्म इस ‘सत्य’ को हमारी तरह नहीं स्वीकारते। जो भारतीय स्वीकारते हैं, वे भी आज इस सत्य को अपने व्यवहार में जीते नहीं हैं। वे भी अपने को ‘सनातनी’ कहने का भी गौरव जरूर प्राप्त कर लेते हैं। मैं सनातनी हूँ, सनातन को जीता हूँ, प्राकृतिक हिंसा नहीं करता, नदियों को पुनर्जीवित करता हूँ। पहाड़ों को काटता नहीं हूँ। पहाड़ हमारी धरती माँ के स्तन हैं। इन्हें काटने से रुकवाने हेतु तथा अरावली में खनन को रोकने हेतु जीवन-भर संघर्ष और ‘सत्याग्रह’ करता रहा हूँ, अभी भी कर रहा हूँ। मेरा सनातन तो ‘जय जगत्’ है, यही कहता हूँ और यही जीता हूँ। (सप्रेस)

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