कितना हिमालय के हक में है, एक परियोजना का अंत

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डेढ़ दशक पहले खारिज की गई उत्तराखंड की ‘लोहारीनाग पाला जलविद्युत परियोजना’ अब अपने अंत की शुरुआत में है, लेकिन क्या समझ का यह कमाल हिमालय के सभी पहाड़ी राज्यों में एक-सा लागू होगा? क्या इस परियोजना के ‘अंत’ से लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, मेघालय, असम, मणिपुर, त्रिपुरा जैसे अन्य हिमालयी राज्यों की विकास नीतियां भी प्रेरित होंगी?


उत्तराखंड सरकार ने भगीरथी नदी पर प्रस्तावित 600 मेगावाट की ‘लोहारीनाग पाला’ जलविद्युत परियोजना को पूरी तरह समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। करीब 14 किलोमीटर लंबी सुरंगों को मिट्टी और मलबे से स्थायी रूप से भरा जा रहा है। इस काम पर लगभग 52 करोड़ रुपए खर्च होंगे। यह वही परियोजना है, जिसकी अनुमानित लागत 2000 करोड़ रुपए थी, जिस पर लगभग 60 प्रतिशत काम हो चुका था और जिस पर पहले ही 650 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके थे।

यह फैसला पहली नज़र में हिमालय और गंगा संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम लगता है, लेकिन असली सवाल यही है—क्या यह किसी व्यापक नीतिगत बदलाव का संकेत है या फिर एक ऐसे प्रोजेक्ट को दफन करने का प्रयास, जो वर्षों पहले ही राजनीतिक और सामाजिक दबाव में दम तोड़ चुका था?

जिस परियोजना ने सरकार को पीछे हटने पर मजबूर किया

‘लोहारीनाग पाला’ जलविद्युत परियोजना उत्तराखंड की सबसे बड़ी ‘रन ऑफ द रिवर’ परियोजनाओं में से एक थी। 2006 में ‘एनटीपीसी’ (नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन) ने इसका निर्माण शुरू किया। इसमें भगीरथी के पानी को लंबी सुरंगों के जरिए मोड़कर बिजली पैदा की जानी थी, लेकिन 2008–09 में गंगा घाटी में इस परियोजना के खिलाफ जोरदार विरोध खड़ा हुआ।

पर्यावरणविद और आईआईटी-कानपुर के पूर्व प्राध्यापक जीडी अग्रवाल (स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद) ने आमरण अनशन कर इसे गंगा के प्राकृतिक प्रवाह के खिलाफ बताया। उनकी दलील साफ थी—गंगा सिर्फ एक जलधारा नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता है। सुरंगों में डालकर उसका पानी मोड़ना उसके अस्तित्व से छेड़छाड़ है। आख़िरकार 2010 में केंद्र सरकार को यह परियोजना रद्द करनी पड़ी। आज, डेढ़ दशक बाद, उन्हीं अधूरी सुरंगों को पूरी तरह भरने का फैसला लिया गया है।

सवाल यह है कि बाकी हिमालय का क्या?

अगर सरकार मानती है कि ‘लोहारीनाग पाला’ में बनी सुरंगें भविष्य में खतरा बन सकती हैं—आपदाओं को बढ़ा सकती हैं, नदी की सुरक्षा को चुनौती दे सकती हैं—तो यह स्वीकारोक्ति बेहद अहम है, लेकिन यहीं से विरोधाभास शुरू होता है।

इसी हिमालय में ‘चारधाम ऑल वेदर रोड परियोजना’ के तहत पहाड़ों को चौड़ा करने के लिए बड़े पैमाने पर कटिंग हो रही है। रेल परियोजनाओं के लिए लंबी और गहरी सुरंगें खोदी जा रही हैं। नदियों पर नई जलविद्युत और सिंचाई परियोजनाओं की योजनाएं अब भी चल रही हैं। अगर भगीरथी की सुरंगें पर्यावरणीय खतरा हैं, तो क्या चार-धाम और रेल परियोजनाओं की सुरंगें सुरक्षित हैं? क्या हिमालय की भू-गर्भीय संवेदनशीलता परियोजना-दर-परियोजना बदल जाती है?

टिहरी जैसे बड़े बांध : वादे और वास्तविकता

हिमालय में बड़े बांधों का सवाल केवल ऊर्जा उत्पादन का नहीं है, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय कीमत का भी है। टिहरी बांध को ही लें। इसे देश की सबसे महत्वाकांक्षी जलविद्युत परियोजनाओं में गिना गया—बिजली, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण के बड़े वादों के साथ, लेकिन वास्तविकता यह है कि हजारों परिवारों का विस्थापन हुआ। भूकंपीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में विशाल जलाशय खड़ा किया गया। स्थानीय स्तर पर लाभ सीमित रहे, जबकि जोखिम स्थायी बन गए। टिहरी कोई अपवाद नहीं है। बड़े बांधों के साथ यही कहानी बार-बार दोहराई गई है—लागत बढ़ती गई, लाभ के दावे बदले और पर्यावरणीय जोखिम स्थायी होते गए।

गंगा और हिमालय: जीडी अग्रवाल की अनसुनी चेतावनी

प्रो. जीडी अग्रवाल केवल किसी एक परियोजना का विरोध नहीं कर रहे थे, उनकी मांगें कहीं ज़्यादा बुनियादी थीं। गंगा के अविरल और निर्मल प्रवाह की कानूनी गारंटी, ‘रन ऑफ द रिवर’ जैसी परियोजनाओं पर भी पुनर्विचार, हिमालय को केवल संसाधन नहीं, बल्कि एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र मानने की नीति। ‘लोहारीनाग पाला’ जलविद्युत परियोजना का बंद होना उनकी चेतावनियों को सही ठहराता है, लेकिन जब वही सरकार अन्य हिस्सों में समान प्रकृति के हस्तक्षेप को जारी रखती है, तो यह फैसला अधूरा लगता है।

तो क्या यह पहला जरूरी कदम है?

भगीरथी की सुरंगों को भरना निस्संदेह एक सही कदम है। यह स्वीकार करता है कि अतीत में की गई कुछ परियोजनाएं गलत थीं और भविष्य में खतरा बन सकती थीं, लेकिन यह कदम पर्याप्त नहीं है।

जब तक हिमालय के लिए एक समग्र, वैज्ञानिक और दीर्घकालिक नीति नहीं बनेगी, हर परियोजना को अलग-अलग नहीं, बल्कि पूरे पर्वतीय तंत्र के संदर्भ में नहीं देखा जाएगा और विकास को सिर्फ़ आर्थिक लाभ के चश्मे से नहीं, बल्कि पर्यावरणीय सीमा के भीतर नहीं परखा जाएगा, तब तक ‘लोहारीनाग पाला’ परियोजना एक मिसाल कम और अपवाद ज़्यादा बनी रहेगी। हिमालय को बचाने के लिए एक परियोजना को दफन करना काफी नहीं है। ज़रूरत उस सोच को दफन करने की है, जो हिमालय को सिर्फ़ खोदने योग्य जमीन मानती है।

इस विकास की कीमत कौन चुका रहा है?

पूरे फैसले में एक सवाल ऐसा है, जिस पर अब तक खुलकर बात नहीं हुई है। अगर भगीरथी परियोजना को लेकर सरकार और तंत्र को यह समझ बनने में लगभग डेढ़ दशक लग गए कि यह हिमालय के लिए नुकसानदेह है, तो इस “देर से आई समझ” की कीमत किसने चुकाई? इस परियोजना पर करीब 650–700 करोड़ रुपये पहले ही खर्च हो चुके थे—यह पैसा किसी निजी कंपनी का नहीं, बल्कि जनता की गाढ़ी कमाई का था।

अब यह पूछना बिल्कुल जायज़ है कि अगर आने वाले वर्षों में ‘चार-धाम सड़क परियोजना,’ रेल सुरंगों या अन्य बड़े बांधों को लेकर भी यही निष्कर्ष निकला कि वे हिमालय की स्थिरता के लिए खतरनाक हैं, तो क्या हम हज़ारों या लाखों करोड़ रुपये इसी तरह डुबाने को तैयार हैं? क्या हर बार आपदा, विरोध और नुकसान के बाद ही हमें “गलती” का एहसास होगा?

यह सवाल केवल आर्थिक नुकसान का नहीं है, बल्कि विकास की सोच का है। क्या विकास का मतलब सिर्फ़ बड़ी परियोजनाएं, भारी निवेश और तेज़ निर्माण है? या फिर हमें अब उस विकास मॉडल पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, जो ज़रूरत, स्थानीय संदर्भ, पर्यावरणीय सीमा और सामाजिक सहमति को केंद्र में रखे? हिमालय जैसे नाज़ुक भू-भाग में विकास का पैमाना “कितना बड़ा” नहीं, बल्कि “कितना ज़रूरी और कितना सुरक्षित” होना चाहिए? अगर ऐसा नहीं हुआ, तो ‘लोहारीनाग पाला’ जलविद्युत परियोजना जैसी परियोजनाएं अपवाद नहीं रहेंगी—वे भविष्य की एक महंगी, लेकिन बार-बार दोहराई जाने वाली भूल बन जाएंगी। (सप्रेस)

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