विवाद के सभी मसलों को आपसी बातचीत से सुलझायें, युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं

सर्व सेवा संघ की अपील

सेवाग्राम :  दुनिया में कहीं भी युद्ध हो हम उसके विरोधी हैं। सरकारों के निर्णयों के अनुसार सेनाओं को युद्ध में झोंक दिया जाता है। मंत्रीगण तो अपने कक्ष में बैठे रहते हैं, पर किसी मां का बेटा, किसी बहन का भाई तथा किसी पत्नी के पति को अपनी जान गंवानी पड़ती है। दुनिया के विभिन्न अस्त्र-शस्त्र निर्माता चाहते ही हैं कि कहीं न कहीं युद्ध होता रहे, ताकि उनके अस्त्र-शस्त्रों की खपत होती रहे। वे तो आतंकवादियों तक को हथियार बेचने में गुरेज नहीं करते।

सर्व सेवा संघ (अखिल भारत सर्वोदय मंडल) के अध्यक्ष श्री महादेव विद्रोही द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा है कि दुनिया ने दो-दो विश्वयुद्धों की विभीषिका को देखा है तथा इसके परिणामों को भुगता है। फिर युद्ध न हो, इसी उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गयी थी। बावजूद इसके, कहीं न कहीं युद्ध होते ही रहते हैं। इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका के बारे में भी पुनर्चिन्तन किया जाना चाहिए।

उन्‍होंने कहा कि पिछले दिनों भारत चीन सीमा पर उत्पन्न हुए तनाव में दोनों देशों के अनेक सैनिक हताहत हुए हैं। बीच-बीच में समाचार आते रहे हैं कि चीन की सेनाएं भारतीय क्षेत्र में अनेक किलोमीटर तक घुस आयी हैं। अभी कुछ महीने पहले भारतीय जनता पार्टी के अरुणाचल प्रदेश इकाई के अध्यक्ष के बयान के अनुसार चीनी सेनाएं अरुणाचल प्रदेश में 25 किमी तक घुस आयी थीं। इस पर भी भारत सरकार मौन रही। भारत सरकार के इस मौन का अर्थ कहीं समर्पण तो नहीं है?

आजादी की लड़ाई में हमारे स्वतंत्रता सेनानी बड़े उत्साह के साथ गाते थे— तन हो स्वदेशी, मन हो स्वदेशी, मर जायें अगर तो, कफन हो स्वदेशी। स्वदेशी हमारी आजादी की लड़ाई का एक महत्त्वपूर्ण मूल्य रहा है। पर बाद के दिनों में इसे मद्धिम कर दिया गया और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए दरवाजे खोल दिये गये। इतना ही नहीं, कोर सेक्टर में भी इन्हें प्रवेश की अनुमति प्रदान कर दी गयी। जिन चीजों का उत्पादन हम खुद करते थे, उन्हें भी विदेशी कंपनियों से खरीदा जाने लगा। उदाहरण के लिए भारत सरकार की एक कंपनी उच्च क्षमता वाले रेल इंजनों का निर्माण करती है, बावजूद इसके विदेशों से रेल इंजन मंगाये जाते हैं।

चीन पर तो हम इतने निर्भर हो गये हैं कि हमें पतंग से लेकर गणपति की मूर्ति तक चीन से मंगानी पड़ती है। हद तो तब हो गयी, जब सरदार पटेल की प्रतिमा का निर्माण भी चीन की किसी कंपनी से करवाया गया।

पहले हम गौरव के साथ अपने उत्पादों पर मेड इन इंडिया लिखते थे। एनडीए सरकार ने उसे किनारे छोड़कर मेक इन इंडिया शुरू किया। इसका मतलब है कि सरकार ने यह मान लिया है कि बिना विदेशी कंपनियों के हमारा उद्धार नहीं होने वाला है। हमें गुलामी की इस मानसिकता से निजात पानी ही होगी।

सर्व सेवा संघ सीमा पर शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करता है तथा दुःख की इस घडी में उनके परिवार जनों के प्रति अपनी गहरी संवेदना प्रकट करता है। हम दोनों सरकारों से अपील करते हैं कि विवाद के सभी मसलों को आपसी बातचीत से सुलझायें। युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है। युद्ध में जान हानि ही नहीं होती, बल्कि सारी अर्थव्यवस्था भी बरबाद हो जाती है। शुक्र है कि इस संघर्ष में हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया गया। अच्छा होता, दुनिया की सारी सेनाएं हथियारों को तिलांजलि दे देतीं।                                                               

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