वैश्विक पर्यावरण समसामयिक

विकास की दौड़ में खोती प्रकृति की सांसें

विकास की दौड़ में खोती प्रकृति की सांसें

प्रकृति से बढ़ती दूरी अब केवल भावनात्मक संकट नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न बन चुकी है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के अध्ययन के अनुसार, प्रकृति से अलगाव पर्यावरणीय विनाश का मूल कारण है। औद्योगिकीकरण और शहरीकरण ने विकास तो दिया, पर...

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प्रकृति से बढ़ती दूरी अब केवल भावनात्मक संकट नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न बन चुकी है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के अध्ययन के अनुसार, प्रकृति से अलगाव पर्यावरणीय विनाश का मूल कारण है। औद्योगिकीकरण और शहरीकरण ने विकास तो दिया, पर मनुष्य का प्रकृति से मानसिक रिश्ता तोड़कर मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा और धरती—सभी के संतुलन को गंभीर खतरे में डाल दिया है।


प्रकृति से बढ़ती दूरी अब केवल एक भावनात्मक या सांस्कृतिक मुद्दा नहीं रह गई, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बन चुकी है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक माइकल रिचर्डसन का हाल ही में प्रतिष्ठित पत्रिका ‘अर्थ’ जर्नल में प्रकाशित अध्ययन का निष्कर्ष सीधा और सटीक है, प्रकृति से अलगाव ही पर्यावरणीय विनाश का मूल कारण बन गया है। जब इंसान प्रकृति के साथ अपने भावनात्मक संबंध को खो देता है, तो उसके संरक्षण की चिंता भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। यही वजह है कि आज पृथ्वी के संसाधन बेतहाशा गति से खत्म हो रहे हैं और उसका संतुलन डगमगा रहा है।

पिछली दो शताब्दियों में औद्योगिकीकरण और शहरीकरण की रफ्तार ने विकास के अनेक नए आयाम खोले। विज्ञान, तकनीक और अर्थव्यवस्था में आश्चर्यजनक प्रगति हुई, पर इसका एक दूसरा चेहरा भी है, धरती का निरंतर क्षरण। वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 1800 से 1990 के बीच पृथ्वी की लगभग 60 प्रतिशत प्राकृतिक संपदा नष्ट हो चुकी है और जैव विविधता आधे से भी कम रह गई है। खेती की जमीन सिकुड़ती जा रही है, जंगलों का क्षेत्र घट रहा है और शहरों का फैलाव बेलगाम होता जा रहा है। जहां कभी पेड़ों की छाया और मिट्टी की गंध होती थी, वहां अब मॉल, पार्किंग स्थल, फैक्टरियां और ऊंची इमारतें हैं।

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यह परिवर्तन केवल भौतिक नहीं है, बल्कि गहरे मानसिक स्तर पर भी असर डाल रहा है। रिचर्डसन ने इस स्थिति को ‘मानसिक अलगाव’ कहा है यानी मनुष्य का प्रकृति से भावनात्मक रिश्ता टूट जाना। जब हम नदियों के सूखने, पहाड़ों के कटने या पेड़ों के गिरने से केवल असुविधा महसूस करते हैं, लेकिन भीतर से कोई पीड़ा नहीं होती, तब हम उस संवेदनहीनता की अवस्था में पहुंच जाते हैं जो विनाश का सबसे बड़ा कारण बनती है।

यह अलगाव सबसे स्पष्ट रूप से नई पीढ़ी में देखा जा सकता है। महानगरों में पले-बढ़े बच्चों का बचपन कंक्रीट के जंगलों में बीतता है। वे पार्कों तक तो जाते हैं, पर वहां की हरियाली भी कृत्रिम होती है, सिंथेटिक घास, फूलों की सजावट और सीमित पेड़। उन्हें असली जंगलों की नमी, मिट्टी की गंध, कीड़ों, तितलियों या पक्षियों के साथ जुड़ने का अनुभव नहीं मिल पाता। धीरे-धीरे उनका प्रकृति से रिश्ता केवल तस्वीरों, मोबाइल स्क्रीन या किताबों तक सीमित रह जाता है।

कई अंतरराष्ट्रीय शोध इस बात की पुष्टि करते हैं कि प्रकृति के नजदीक रहने वाले बच्चे मानसिक और शारीरिक रूप से अधिक स्वस्थ होते हैं। ब्रिटिश जर्नल ऑफ साइकोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि जो बच्चे हरियाली वाले इलाकों में रहते हैं, वे पढ़ाई में अधिक एकाग्र होते हैं और गणित जैसे कठिन विषयों में भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं। वहीं जर्नल ऑफ एन्वॉयरमेंटल साइकोलॉजी में अमेरिका और यूरोप के पांच हजार से अधिक बच्चों पर किए गए अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि जब बच्चों को प्राकृतिक वातावरण में पढ़ाया जाता है, तो उनकी एकाग्रता, संतुलन और रचनात्मकता कृत्रिम वातावरण की तुलना में कहीं अधिक होती है।

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प्रकृति से दूरी केवल शिक्षा को प्रभावित नहीं करती, बल्कि हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डालती है। ‘साइंस रिपोर्टर्स’ जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन ने दिखाया है कि हरियाली और स्वच्छ पर्यावरण के पास रहना मानसिक तनाव को घटाता है, अवसाद और चिंता को कम करता है तथा शारीरिक रोगों से रक्षा करता है। इसके विपरीत, प्रदूषण और शोर से भरे शहरी इलाकों में रहने वाले लोगों में अवसाद, अनिद्रा और हृदय रोग जैसी समस्याएं अधिक देखी गई हैं।

आज मानसिक स्वास्थ्य एक वैश्विक संकट बन चुका है। तनाव, अवसाद और एकाकीपन की समस्याएं बच्चों और युवाओं तक पहुंच चुकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका एक बड़ा कारण हमारी प्रकृति से दूरी है। इंसान अब अधिक समय बंद कमरों, स्क्रीन और कृत्रिम रोशनी के बीच बिताने लगा है, जहां न मिट्टी का स्पर्श है न हवा की ताजगी। यह जीवनशैली धीरे-धीरे मनुष्य को भीतर से निर्जीव बनाती जा रही है।

यह सच है कि आधुनिक जीवन को पूरी तरह प्रकृति के अनुरूप ढालना संभव नहीं, लेकिन इसे नजरअंदाज करना और भी घातक है। रिचर्डसन और अन्य वैज्ञानिकों का सुझाव है कि शहरों में हरित क्षेत्र का दायरा कम से कम 30 प्रतिशत तक बढ़ाया जाना चाहिए। पेड़-पौधे केवल सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि जीवनदायिनी ऑक्सीजन, ठंडक और पारिस्थितिक संतुलन के लिए आवश्यक हैं।

माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका इस दिशा में निर्णायक हो सकती है। बच्चों को स्कूल की चारदीवारी से बाहर निकालकर खुले वातावरण, पार्कों, खेतों और पहाड़ियों तक ले जाना चाहिए। यह न केवल शिक्षा को जीवन के अनुभव से जोड़ेगा, बल्कि बच्चों को उस धरती से जोड़ने में मदद करेगा जिससे उनका अस्तित्व जुड़ा है। शिक्षा केवल परीक्षा और प्रमाणपत्र का माध्यम नहीं, बल्कि ऐसी प्रक्रिया होनी चाहिए जो जीवन के प्रति संवेदनशीलता और जिम्मेदारी पैदा करे।

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हमारे समाज और नीति-निर्माताओं को यह समझना होगा कि विकास केवल कंक्रीट, उपभोग और उत्पादकता से नहीं मापा जा सकता। असली विकास वही है जो मनुष्य और प्रकृति दोनों के संतुलन को बनाए रखे। यदि हम विकास की दौड़ में इस संतुलन को भुला देंगे, तो आने वाली पीढ़ियों के पास न हरियाली बचेगी, न स्वच्छ हवा, न जीवन की सहजता।

आज मानवता एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। एक ओर तेज़ी से भागता विकास है, दूसरी ओर थकी हुई, घायल धरती। यदि हमने इस मानसिक अलगाव को दूर नहीं किया, तो आने वाले समय में मानव सभ्यता का अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता है। रिचर्डसन का अध्ययन हमें केवल चेतावनी ही नहीं देता, बल्कि रास्ता भी दिखाता है, शिक्षा, जीवनशैली और नीतियों में प्रकृति को फिर से केंद्र में लाने का रास्ता। हमें अपने बच्चों, समाज और नीति में यह भाव लौटाना होगा कि प्रकृति कोई संसाधन नहीं, बल्कि हमारी सह-जीवन संगिनी है।

यदि मनुष्य प्रकृति से पुनः जुड़ने का प्रयास करे,उसकी आवाज़ सुने, उसकी लय को समझे और उसके साथ तालमेल बैठाएतो शायद धरती फिर से मुस्कुरा सके। क्योंकि अंततः हम जो भी हैं, जो भी बन सकते हैं, वह सब इसी प्रकृति से संभव है। उसके बिना न जीवन है, न सभ्यता।

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