डॉ. आंबेडकर का धम्मचक्र प्रवर्तन — समानता और न्याय का नया अध्याय

प्रो. कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. आंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर की दीक्षाभूमि में बौद्ध धर्म ग्रहण कर सम्राट अशोक की धम्म परंपरा को पुनर्जीवित किया। यह ऐतिहासिक क्षण भारतीय समाज में समता, नैतिकता और मानवता के नए अध्याय की शुरुआत थी। उनके इस कदम ने जातिगत भेदभाव के विरुद्ध सामाजिक परिवर्तन की गूंज को सशक्त किया।

14 अक्टूबर 1956 उस ऐतिहासिक घटना का स्मरण है। इसी दिन डॉ. बाबासाहेब भीमराव रामजी आंबेडकर ने अपने लाखों अनुयायियों के साथ नागपुर की दीक्षाभूमि में हिंदू धर्म का त्याग कर बौद्ध धर्म को स्वीकार किया था। उन्होंने यह दिन इसलिए चुना था क्योंकि सम्राट अशोक ने भी इसी दिन बौद्ध धर्म ग्रहण किया था। वह तिथि थी विजयादशमी जिसे आज भारत के बुद्धिष्ट अशोक विजयादशमी के नाम से जानते हैं। यह दिन बुद्ध की शिक्षाओं के प्रसार और भारत में बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान का प्रतीक है।

समानता के उद्घोष के इस अवसर पर डॉ. आंबेडकर ने यह सन्देश दिया कि सभी मनुष्य समान हैं और उनमें कोई भेद नहीं है। बंधुत्व के बारे में डॉ. आंबेडकर ने कहा हमें एक-दूसरे के प्रति भाईचारे और प्रेम की भावना रखनी चाहिए। न्याय के विषय में आंबेडकर का मत था कि हमें निष्पक्ष और न्यायपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। नैतिक आचरण के बारे में उनकी इच्छा थी कि हमें सही समझ, सही बोल, सही कर्म और सही प्रयास के अष्टांगिक मार्ग का पालन करना चाहिए।

नए धम्म का आविष्कार के बारे में बुद्ध एवं उनका धम्म में स्पष्ट विवरण मिलता है कि नया प्रकाश प्राप्त करने के लिए गौतम जब ध्यानस्थ हुए, तो उन दिनों सांख्य-दर्शन का अत्यधिक प्रभाव था। बुद्ध ने सोचा कि संसार में दुःख और कष्ट के अस्तित्व में कोई विवाद नहीं है। फिर भी गौतम की रुचि यह पता लगाने में थी कि दुःख से छुटकारा कैसे पाया जाए? सांख्य-दर्शन के पास इस समस्या का कोई उत्तर नहीं था। इसलिए दुःख और कष्ट से कैसे छुटकारा पाया जाए, इसी समस्या पर उन्होंने सारा ध्यान लगाया। स्वभावतः पहला प्रश्न बुद्ध ने अपने आपसे किया कि किसी व्यक्ति के दुःख और कष्ट के क्या कारण हैं? उसका दूसरा प्रश्न था कि कष्ट से छुटकारा कैसे पाया जाए? इन दोनों प्रश्नों का बुद्ध ने एक सही उत्तर पा लिया, जिसे सम्यक बोध, सम्यक ज्ञान कहा जाता है। इसी प्रकार उस पीपल के वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को गौतम बुद्ध होने का बोध हुआ यानि महाज्ञान की प्राप्ति हुई थी, उस को बोधि-वृक्ष के नाम से जाना जाता है।

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इस महान यात्रा से निकले धम्म से डॉ. आंबेडकर को आत्मतोष था क्योंकि यह बुद्ध की पराकाष्ठा थी। बुद्ध ने समानता, न्याय, बंधुता और नैतिकता के बारे में तभी कुछ कहा जिसमें कोई भेद नहीं थे। उनके ज्ञान से ज्ञानोदय में सबके लिए समत्व था। डॉ. आंबेडकर इसे पसंद करते थे।


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डॉ. आंबेडकर ने यह आग्रह किया कि धर्म विशुद्ध सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। बुद्ध कभी वर्णाश्रम धर्म में विश्वास नहीं रखते थे। हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि हम सब एक से हैं। मनुष्य-मनुष्य के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए। जन्म पर कोई श्रेष्ठ या निम्न नहीं हो सकता। श्रेष्टता या नीचता केवल अपनी करनी के आधार से ही प्राप्त होती है। बुद्ध ने ये बातें बताई हैं। लोग अगर फिर बौद्ध धर्म का स्वीकार करेंगे तो यह देश एक बार फिर वैभवसंपन्न बनेगा। किसी और तरह से जातिभेद खत्म होना संभव नहीं है। सचमुच अगर कोई जाति-धर्म खत्म करना चाहते हैं तो उनके लिए केवल यही एक उपाय हे कि वे बौद्ध धर्म को स्वीकार करें। (बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वांगमय को पढ़ें) दिल्‍ली शेड्यूल्ड कास्टस्‌ वेलफेयर एसोसिएशन की बैठक में डॉ. आंबेडकर द्वारा दिए गए इस वक्तव्य को बार-बार पढ़ना चाहिए कि वास्तव में डॉ. आंबेडकर की सोच क्या थी और वह क्यों इतना बौद्ध धर्म अपनाने को लेकर आग्रही बन गए थे।

मुंबई के नरे पार्क में 27 मई, 953 की शाम को डॉ, आंबेडकर ने अपने सार्वजनिक व्याख्यान में कहा था मैं बौद्ध धर्म का एक उपासक हूं। मैंने केवल बोध नहीं लिया है और न ही मैं केवल बोलता रहता हूं। मैं प्रत्यक्ष कृति करके दिखाऊंगा। मेरी जिंदगी के आखिरी दिनों में अब मैंने तय किया है कि मैं बुद्ध का प्रचार करूंगा। बुद्ध धर्म प्रचार की खेती मैं करूंगा और देखूंगा कि उसमें कौन-सी फसल उगती है। यह उनकी दृढ़ता बुद्ध के प्रति व बुद्ध के संदेशों के प्रति बहुत गहरी थी। धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस उसी का परिणाम है। वैचारिक परिवर्तन यह डॉ. आंबेडकर का नहीं था अपितु सच्चे मायने में उनका हृदय परिवर्तन था। वह बुद्धमय हो जाना चाहते थे। वह बुद्ध की शरण में रहकर एक ऐसे भारत को बनाने के लिए संकल्प ले रहे थे जिससे अस्पृश्य समाज को आत्मशक्ति व उनकी गरिमा को पुनर्जीवित किया जा सके।

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इसी नरे पार्क में ही उन्होंने यह भी कहा कि मानवता की रक्षा के लिए भारत ही क्या पूरी दुनिया को आखिर इसी धर्म की ओर देखना पड़ेगा। इसीलिए बौद्ध धर्म का बाइबिल मैंने लिखी है जो जल्द ही प्रकाशित होगा। उसे पढ़ने के बाद बौद्ध धर्म को स्वीकारना है, अथवा नहीं इस बात का फैसला करना आपके हाथ में होगा।

डॉ. आंबेडकर ने कभी भी किसी बात को लेकर आग्रह नहीं किया कि आप हमारे साथ ही आएं। वह उन पर छोड़ते हैं, उनके विवेक पर छोड़ते हैं जो अस्पृश्यता की मार झेल रहे थे और उसी में दुबककर जी लेना चाहते थे। उन्होंने इसीलिए यह कहा कि जो मैं महसूस किया हूँ और जो तथ्य है धम्म और बुद्ध का उसका आप अवलोकन करें, तत्पश्चात आप निर्णय लें कि आप इसे स्वीकार करें अथवा नहीं। लेकिन इन सबके साथ डॉ. आंबेडकर ने बहुत ही विश्वास और आत्मविश्वास के साथ यह ज़रूर कह दिया कि मेरा पूरा-पूरा विश्वास है कि केवल बुद्ध का धम्म ही विश्व को विनाश से बचा सकता है और समूचे जीवित प्राणियों का कल्याण कर सकता है।

एक बार उन्होंने कहा अपना बौद्ध धर्म बताता है कि अगर मानवी जीवन सुख से, संतोष के साथ बिताना हो तो मानव को चाहिए कि वह आचरण शुद्ध रखे, अहिंसा, समता और बंधुत्व को धारण करे। इसके अलावा कोई दूसरा मार्ग नहीं है। इन बातों को गौतम बुद्ध के धर्म के सिद्धांत कहा जाता है और मैंने यही सिद्धांत अपने छह करोड़ अनुयायियों से कहे हैं। पैसों की कमी के कारण मैं आज उनके लिए कुछ भी कर नहीं पाया।

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धन की कमी के कारण डॉ. आंबेडकर बहुत से अपने स्वप्न को साकार नहीं कर पा रहे थे, इसका उन्हें अफ़सोस था। दिंसबर 1954 में वह रंगून में तीसरे जागतिक बौद्ध धर्म अधिवेशन में डॉ. आंबेडकर गए हुए थे वहां उन्होंने यह बात कही। धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस 14 अप्रैल 1956 को आता है। उसके पहले रंगून में अपने किए पर उनके मन में जो शांति थी वह कुछ इस प्रकार थी कि पार्लियामेंट में था तभी बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान के लिए कुछ बातें मैंने कर दी हैं। मैं भारतीय संविधान का शिल्पकार हूं। मैंने वह संविधान बनाया है। एक बात यह कि उसमें पाली भाषा के उत्थान का प्रबंध मैंने कर रखा है, और, दूसरी बात यह कि, राष्ट्राध्यक्ष के राजवाड़े के ऊपर गौतम बुद्ध के उपदेशों में से पहला चरण धम्मचक्र परिवर्तन लिखा दिया है। ब्रह्मदेश के अध्यक्ष डॉ. जी. पी. मललशेखर के ध्यान में मैंने यह बात ला दी है। देख कर उन्हें भी बड़ा अचरज लगा।

तीसरी बात यह कि, भारतीय पार्लियामेंट के निशान पर भारत सरकार के प्रतीक के रूप में अशोक चक्र को संविधान में मान्यता दिला दी है। यह सब करते हुए मुझे हिंदू, मुसलमान, ईसाई और पार्लियामेंट के अन्य सदस्यों की ओर से कोई विरोध नहीं हुआ। इतना सुस्पष्ट और हर मुद्दे का विश्लेषण करने वाला कार्य मैंने पार्लियामेंट में किया था। इसके बाद वह अपने छः लाख अनुयायियों के साथ धम्मचक्र प्रवर्तन बुद्धत्व की शरण में जाते हैं। इस दिवस की यही विशेषता है। ऐसे थे डॉ. आंबेडकर। अब आज का समाज उनके हृदय की बात समझे और वैसा आचरण करे तो निश्चय ही डॉ. आंबेडकर जहाँ होंगे उन्हें आत्मसंतोष होगा।

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