जटिल है, जातिवार जनगणना 

अरविन्द मोहन

एन बिहार चुनाव के पहले की गई ‘केन्द्रीय चुनाव आयोग’ की गफलतों ने राजनीतिक जमातों में उथल-पुथल मचा दी है, लेकिन इसी की टक्कर का एक और मुद्दा देशभर में खदबदा रहा है, जातिवार जनगणना का । यह मुद्दा ऊपरी तौर पर जितना सीधा दिखाई देता है, वैसा है नहीं। क्या हैं, इसकी पेचीदगियां?

बिहार चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूची में सुधार या नए नाम जोड़ने की कवायद के नाम पर जो कुछ चल रहा है वह देश की राजनीति और सुप्रीम कोर्ट के कार्य-व्यापार के प्रमुख मुद्दों में है। बिहार में तो इससे गहमा-गहमी है ही। वहां विपक्ष इसके खिलाफ आवाज उठा रहा है तो सत्ता पक्ष के कई दल भी इन कदमों का खुला समर्थन नहीं कर रहे हैं। जगह-जगह वोटर फार्म न भरने की मुहिम चल रही है तो कई जगहों से फार्म लेकर आए बूथ लेवल अधिकारी को खदेड़े जाने की खबर भी आई है। कई लोग इसे असम जैसी स्थिति की शुरुआत मानते हैं तो कई पश्चिम बंगाल चुनाव का रिहर्सल, लेकिन सुदूर दक्षिण में भी इसी तरह का एक हंगामा चल रहा है।

वहां अनुसूचित जातियों के लोगों की जातिवार जनगणना का काम चल रहा है। वहां भी विपक्षी भाजपा हंगामा मचा रही है तो कैबिनेट के दो दलित मंत्री मुनियप्पा और महादेवप्पा मुख्यमंत्री पर दबाव बना रहे हैं और गिनती के तरीके पर अपनी आपत्ति जता रहे हैं। आपत्ति का मुद्दा 101 दलित जातियों को अलग-अलग गिनना है, जिसे दलित अपने समाज में विभाजन की राजनीति से जोड़ रहे हैं तो सरकार सही संख्या जानकर संसाधनों के उचित बंटवारे का तर्क दे रही है। वहां भी ‘क्यूआर कोड’ के जरिए अप्रकट ढंग से जाति दर्ज कराने का विकल्प दिया जा रहा है, पर पर्याप्त सचेत दलित समूहों, खासकर शहरों में रहने वालों को इस तरह की गिनती पर आपत्ति है।

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सबको मालूम है कि कर्नाटक में जातिवार गणना हो चुकी है, लेकिन उससे सामने आई संख्या और प्रतिशत को लेकर कांग्रेस के अंदर ही बवाल है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैय्या और कांग्रेस सांसद राजशेखर लगातार आमने-सामने रहे हैं। कई बार दोबारा गिनती का सवाल भी उठा, लेकिन आम जनगणना कराने की रुकी घोषणा सामने आने और जातिवार गिनती कराने के फैसले के बाद यह सवाल कुछ हल्का पड़ा है। जो फैसला हुआ है उससे जातिवार गनगणना कराने का राजनैतिक हंगामा थम गया है। अब श्रेय लेने की राजनीति ऊपर आ गई है।

सबसे बड़ा दावा तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का ही है। उनके समर्थक जातिवार जनगणना कराने वाली बिहार सरकार के उपमुख्यमंत्री रहे तेजस्वी के दावे को भी पीछे कर रहे हैं। भाजपा ने तब भी सहमति दी थी और अब उसका ही फैसला है, सो वह दावेदार है। वह सुविधा से यह भुला दे रही है कि बिहार सरकार द्वारा जातिवार गिनती के बाद लाई नई आरक्षण नीति के खिलाफ उनकी सरकार ही सुप्रीम कोर्ट गई थी और अब भी वह मुकदमा चल रहा है।

इस हंगामे में किसी को यह होश नहीं है कि बिहार, कर्नाटक, तेलंगाना के फैसलों की ही नहीं, पिछली जनगणना में जुटाए जातिवार गिनती के आँकड़े जाहिर न करने के पीछे क्या अच्छाई या बुराई रही है? क्यों पार्टियां इसके पक्ष में भी दिखना चाहती हैं, विरोध भी करती हैं और टालना भी चाहती हैं? क्यों जातियों के अंदर से ही खुद को इस तरह गिनवाने के खिलाफ आवाजें आने लगी हैं? कर्नाटक में जो खुलकर दिखता है वैसा हर जगह का दलित समाज खुद के बंटवारे और श्रेणीकरण के खिलाफ है। अब ओबीसी जातियों के अंदर से भी अलग-अलग जातियों की गिनती के खिलाफ आवाजें उठने लगी है।

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हम जानते हैं कि बिहार और हरियाणा जैसे राज्यों ने दलितों की दो श्रेणियां बनाई हैं तो अधिकांश राज्यों ने अनुसूचित और ओबीसी जातियों की सूची में जोड़-घटाव किए हैं। ऐसा इन समूहों के राजनैतिक दबाव से हुआ है, तो अक्सर शासक जमात की अपनी राजनीतिक गिनती भी प्रभावी रही है। बिहार में नीतीश कुमार ने ओबीसी जातियों की दो श्रेणियां बनाने के साथ-साथ दलित और महादलित का बंटवारा किया है और लगातार जातियों को इधर-से-उधर भी करते रहे हैं।

जो काम वे कर रहे हैं उसमें उनके अपने सामाजिक-राजनैतिक समर्थन का खयाल रहता है, लेकिन यही काम कांग्रेसी भी करते रहे हैं। भाजपा तो आरक्षण की घोषित विरोधी ही रही है, पर दांव-पेंच में वह भी कम नहीं है। नीतीश से बात ज्यादा अच्छी तरह समझ आती है इसलिए उनका उदाहरण बार-बार देने में हर्ज नहीं है। उनको अहीरों से राज लेना था, पासवानों को हाशिए पर रखना था, पचपनिया जातियों को साथ रखना था जो अगड़ों के साथ अहीर राज से भी त्रस्त थीं। इसलिए यह बंटवारा उनको बहुत लाभ दे गया और बिना संगठन और नीति के वे लगातार बीस साल राज पूरा करने जा रहे हैं।

आज अति पिछड़ों के पीछे हर दल भाग रहा है क्योंकि उनकी आबादी 37 फीसदी है, पर इसी से छोटी-छोटी संख्या वाले डर भी रहे हैं। बिहार में एक लाख से कम आबादी वाली सौ से ज्यादा जातियां हैं। इन समूहों में डर व्याप्त है कि अगर उनको अकेला कर दिया गया तो उनकी पूछ-परख खत्म हो जाएगी। हालांकि राजनैतिक चेतना जगने के बाद उनको यह भी समझ आ रहा है कि पिछड़ा नाम से सारा लाभ अहीर न लें, तो अति-पिछड़ा कोटे से कलवार, तेली, सूढी ही क्यों सांसद-विधायक बनें या उनके बच्चे ही सरकारी नौकरियों में जाएँ? क्यों दलित नाम की मलाई, संख्या में बहुत कम धोबी खा लें और हलखोर, बंसफोड़ और डोम जैसी जातियों को कुछ भी न मिले?  

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असल में हमारे समाज में जितने किस्म की वंचनाएं हैं और जितने किस्म के भेद-भाव हैं, जाति आधारित आरक्षण उनमें से सिर्फ एक का निदान करता है और वह भी आधा-अधूरा। इससे आने वाली राजनैतिक-सामाजिक चेतना जरूर बाकी विसंगतियों को भी उजागर करती है, लेकिन यह सारी वंचनाओं का जबाब नहीं है। हमारे यहां जन्मजात भेदभाव सिर्फ जाति के आधार पर नहीं होता। यह लिंग, शिक्षा, क्षेत्र, गाँव-शहर, हिन्दी-अंगरेजी और आर्थिक कारणों से भी होता है। मौजूदा आरक्षण बहुत कम समय में इन सबका एहसास करा देता है। दलित-आदिवासी आरक्षण ने ही ओबीसी आरक्षण का आधार बनाया। इससे गाँव-शहर, हिन्दी-अंगरेजी या लड़का-लड़की के भेद को समझना भी आसान हुआ है, अमीर-गरीब का अंतर समझना भी, लेकिन सरकारों की इच्छा अभी वोट से ज्यादा आगे नहीं गई है। वह समता लाने में दिलचस्पी नहीं रखती। वह तो अब समाजवाद शब्द पर भी आपत्ति करने लगी है। आरक्षण का तर्क इतना मजबूत नहीं हुआ है कि बड़ा बदलाव करे। उसके लिए आरक्षण को अपने अंदर भी बदलाव करने होंगे। (सप्रेस)

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