वरिष्‍ठ पत्रकार, लेखक हृदयेश जोशी ने कहा– लोगों को बचाए बिना नहीं बच सकता पर्यावरण

विश्व पर्यावरण दिवस पर स्टेट प्रेस क्लब, म.प्र. के संवाद कार्यक्रम में व्याख्‍यान

इंदौर, 5 जून। “अगर आप पर्यावरण को बचाना चाहते हैं, तो सबसे पहले लोगों को बचाना होगा। जन बचेगा तो जंगल बचेगा और जंगल बचेगा तो वन्य जीवन भी बचेगा — यही प्रकृति का नियम और संतुलन है। सवा सौ साल पहले जितनी बड़ी दुनिया की आबादी थी, उतनी आज भारत की आबादी है। तकरीबन 140 करोड़। सबसे बड़ी चिंता बढ़ती आबादी की नहीं है, अपितु बदलती हुई जीवन शैली की है।”

ये विचार सुप्रसिद्ध पत्रकार, लेखक और पर्यावरण शोधार्थी हृदयेश जोशी ने आज विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर स्टेट प्रेस क्लब, मध्यप्रदेश द्वारा आयोजित संवाद कार्यक्रम में व्‍यक्‍त किये।

हृदयेश जोशी पर्यावरण और आपदाओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने केदारनाथ आपदा, चिपको आंदोलन, हिमालयी पारिस्थितिकी, जल संकट और जन आंदोलनों पर विस्तार से काम किया है। ‘रिपोर्टिंग इंडिया’ / न्यूज़ लॉन्ड्री/ एनडीटीवी जैसे प्रतिष्ठित मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े रहे हृदयेश जोशी की पुस्तकें और शोधकार्य पर्यावरण पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के रूप में मान्य हैं।

बदलती जीवनशैली और पर्यावरणीय संकट

श्री जोशी ने अपनी बात की शुरुआत मौजूदा जनसंख्या दबाव और बदलती जीवनशैली से की। उन्होंने कहा कि आज भारत की जनसंख्या सवा सौ साल पहले की पूरी पृथ्वी की जनसंख्या के बराबर है, लेकिन चिंता बढ़ती जनसंख्या की नहीं, बल्कि हमारी बदलती जीवनशैली की है। डिजिटल और लक्ज़री जीवनशैली, अनियंत्रित यात्रा, ऊर्जा की बेतहाशा खपत और सुविधा आधारित आदतों ने प्रकृति पर अप्रत्याशित बोझ डाल दिया है।

‘ग्रीन’ ऊर्जा की असल चुनौती

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उन्होंने इलेक्ट्रिक वाहनों के उदाहरण से स्पष्ट किया कि केवल ‘ग्रीन’ लेबल लगाने से कोई तकनीक पर्यावरण हितैषी नहीं हो जाती। उन्होंने कहा यदि आप ग्रीन व्हीकल चला रहे हैं, लेकिन उसे चार्ज करने के लिए बिजली कोयले से बना रहे हैं, तो आप असल में सिर्फ प्रदूषण का स्थान बदल रहे हैं, न कि समाधान खोज रहे हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हमें ऊर्जा उत्पादन की प्रणाली को भी ग्रीन बनाना होगा।

नदियाँ जंगलों से चलती हैं, सिर्फ ग्लेशियर से नहीं

उत्‍तराखंड के दूधतौली गाँव से निकलने वाली रामगंगा नदी, जंगलों से निकलती है। जंगल जलधाराओं को समेटते हैं और धीरे-धीरे पानी छोड़ते हैं। मध्यप्रदेश के अमरकंटक से निकलने वाली नर्मदा नदी के साथ भी यही कहानी है। जंगलों से इन्हें जल मिलता है। नदी में कई छोटी नदियाँ आकर मिलती हैं। हमें नदियों को प्रदूषण से बचाना है और बडे से बडे बाँध बनाने से भला क्या फायदा होगा?

दूधतौली गाँव से निकलने वाली रामगंगा नदी, जंगलों से निकलती है। जंगल जलधाराओं को समेटते हैं और धीरे-धीरे पानी छोड़ते हैं। मध्यप्रदेश के अमरकंटक से निकलने वाली नर्मदा नदी के साथ भी यही कहानी है। जंगलों से इन्हें जल मिलता है। नदी में कई छोटी नदियाँ आकर मिलती हैं। हमें नदियों को प्रदूषण से बचाना है और बडे से बडे बाँध बनाने से भला क्या फायदा होगा?

वेटलैंड्स नहीं, ‘वेस्टलैंड्स’ समझने की भूल

उन्होंने सिरपुर तालाब, भरतपुर के पक्षी विहार और अन्य वेटलैंड्स का उदाहरण देते हुए कहा कि हम गलती से इन पारिस्थितिक तंत्रों को अनुपयोगी समझते हैं, जबकि ये पर्यावरण संतुलन के अहम स्तंभ हैं। भरतपुर राजस्थान में किस तरीके से माइग्रेटरी वर्ड्स आते हैं। इंदौर के सिरपुर तालाब में भी यही नजारा देखने को मिलता है। लेकिन वेटलैंड को हम ‘वेस्टलैंड’ मान लेते हैं, मतलब अनुपयोगी। मरुस्थल, ग्रास लैंड्स, वेटलैंड्स, माउन्टेन्स सब ‘पारिस्थितिकी’ का हिस्सा है और इनकी पर्यावरण में अपनी-अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है।

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मास ट्रांजिट ही है भविष्य का समाधान

श्री हृदयेश जोशी ने एक विस्तारित प्रेजेंटेशन के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, संरचना निर्माण, जीवन शैली, कृषि और आने वाले भविष्य को लेकर उदाहरण सहित जानकारी दी। श्री जोशी ने बढ़ते निजी वाहनों और पर्यटन स्थलों पर भीड़ के संदर्भ में कहा कि “मास रैपिड ट्रांजिट” ही एकमात्र पर्यावरण-सम्मत समाधान है। दिल्ली मेट्रो जैसे उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि जब सुविधाजनक और भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध हो, तो लोग निजी वाहनों से दूरी बना सकते हैं।

स्वास्थ्य और कृषि में कीटनाशकों का खतरा

उन्होंने चिंता जताई कि देश में अभी भी कीटनाशकों पर नियंत्रण के लिए 1968 का कानून चल रहा है। संसद में दो बार नया बिल लाया गया, लेकिन अभी तक पारित नहीं हो पाया है। इस स्थिति का गंभीर असर मानव स्वास्थ्य, खासकर महिलाओं और बच्चों पर पड़ रहा है। उन्‍होंने चर्चा के दौरान सिलकोसिस, आर्सेनिक जल से होने वाली खतरनाक बीमारियों की ओर भी आगाह किया।

पर्यावरण आंदोलनों की विरासत

उन्होंने भारत में जारी जनआंदोलनों का हवाला देते हुए कहा कि उत्तराखंड का ‘पानी बोओ, पानी उगाओ’, कर्नाटक का ‘अप्पिको आंदोलन’ और अन्य स्थानों पर चल रहे स्थानीय आंदोलन उम्मीद की किरण हैं। “पर्यावरण की रक्षा केवल नीति से नहीं, बल्कि जन भागीदारी और जन चेतना से होगी,” उन्होंने कहा।

कार्यक्रम में कई प्रतिभागियों — कुमार सिद्धार्थ, डॉ. जयश्री सिक्का, संजय पटेल, राजेंद्र कोपरगांवकर, राकेश द्विवेदी, अभिषेक सिंह सिसोदिया, दीपक माहेश्वरी और राजदीप मल्होत्रा — ने सवाल पूछे और विचार साझा किए।

कार्यक्रम के प्रारंभ में वरिष्ठ पर्यावरणविद ओपी जोशी, स्टेट प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल, सेवा सुरभि के समन्वयक ओम नरेड़ा और अन्य अतिथियों ने हृदयेश जोशी का स्वागत किया। प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट गोविंद लाहोटी ‘कुमार’ ने उन्हें कैरिकेचर भेंट किया। संवाद का संचालन पंकज क्षीरसागर और आभार यशवर्धन सिंह ने व्यक्त किया।

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इस अवसर पर हृदयेश जोशी एवं साथियों ने गांधी हॉल परिसर में चीकू का पौधा रोपा और स्टेट प्रेस क्लब द्वारा हरियाली जागरूकता हेतु तैयार पोस्टर का विमोचन भी किया।

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