इतिहास की खोई हुई समझ और समाज का भ्रमित रुख

कुलभूषण उपमन्यु

करीब सवा तीन सौ साल पहले रुखसत हुए औरंगजेब की कब्र उखाड़ने से लगाकर बरसों पुराने गैर-हिन्दू उपासना-गृहों को खोदकर उन्हें हिन्दू साबित करने की मौजूदा हुलफुलाहट ने, एक समाज की हैसियत से हमें बेहद अज्ञानी और इतिहास-विमुख साबित कर दिया है। क्या यह हमारी इतिहास की कमजोर समझ का नतीजा है? क्या हमें अपने इतिहास को नए सिरे से समझना-लिखना होगा?

भारत में इन दिनों इतिहास पुनर्लेखन बहस का विषय बना हुआ है। इतिहास लेखन में आमतौर पर वस्तुपरकता का दावा किया जाता है, किन्तु यह दावा आंशिक रूप से ही सही है। इतिहास लेखन में व्यक्ति-परक लेखन की संभावना हमेशा बनी रहती है। ज्यादातर इतिहास विजेताओं द्वारा लिखे गए, इसलिए उनमें विजेताओं का महिमा मंडन या उनके पक्ष को ही सही ठहराने की वृत्ति हमेशा बनी रहती है, किन्तु जहां भी किसी पक्ष से असंबद्ध लेखकों द्वारा लेखन हुआ वहां इतिहास की वस्तुनिष्ठता, विश्वसनीयता तुलनात्मक रूप से खरी उतरती है।  

भारत का आधुनिक प्रचलित इतिहास मुस्लिम आक्रान्ताओं, अंग्रेजी शासन और वामपंथी विचार धारा से जुड़े इतिहासकारों की देन है। इसमें बहुत मेहनत से काम हुआ है, किन्तु उसमें निष्पक्षता का स्तर असंदिग्ध नहीं है। उन सभी के अपने-अपने निहित स्वार्थ हैं या भारत को देखने की अपनी विशिष्ट दृष्टि है, जो किसी भी बाहरी व्यक्ति के लिए स्वाभाविक है। मुस्लिम आक्रान्ता ऐसे देशों से आये थे जहां खाने-जीने के साधन पर्याप्त नहीं थे। इसलिए लूट के अतिरिक्त दूसरा लक्ष्य था कि भारत में ही बसकर यहाँ की सुख-सुविधाओं का अपनी इच्छा से उपभोग करना। उनके लिए दूसरे देशों में जाकर इस्लाम को फैलाना भी पुण्य का काम था इसलिए अनेक देशों को जीतकर इस्लाम फ़ैलाने के लिहाज से इतिहास लेखन हुआ।  

अंग्रेजों की दृष्टि तत्कालीन ईसाई दृष्टि थी। इसके अनुसार जो लोग ईसाइयत का ज्ञान नहीं रखते और मानते वे बर्बरता में फंसे हुए हैं। उनकी मुक्ति के लिए हमें वहां ईसाईयत का संदेश लेकर जाना है, यह हमारा धार्मिक कर्तव्य है। हालांकि यूरोप की ठंडी जलवायु, प्राकृतिक संसाधनों का अभाव भी उसके पीछे का कारण रहा है, जिस कमी को पूरा करने के लिए उपनिवेशवाद का सहारा लिया गया और तमाम एशियाई, अफ़्रीकी और दक्षिण अमरीकी देशों पर कब्जा करने की मुहिम शुरू हुई। वे कुछ देशों की आबादी को पूरी तरह नष्ट करके खुद वहां के मालिक बन गए, जैसे – अमेरिका, आस्ट्रेलिया। जहां इस तरह का कब्जा करके पूरी आबादी को ही प्रतिस्थापित करना संभव नहीं था, वहां उन्होंने स्थानीय सभ्यताओं और संस्कृतियों को घटिया साबित करने और पाश्चत्य सभ्यता को स्थापित करके अपने शासन को सुनिश्चित करने का कार्य किया।  

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इतिहास लेखन अंग्रेजों की इसी दृष्टि से किया गया। ज्यादातर परिकल्पनाएं जिनकी स्थापना की गई वे उनके उपरोक्त लक्ष्यों को पूरा करने वाली थीं। बड़ी चालाकी से उन्होंने, जो तथ्य या घटनाएं उन्हें अपने उपयुक्त नहीं लगीं, उनका विलोपन कर दिया गया या अनदेखा किया गया। हालांकि उन्होंने तथ्यात्मकता और वस्तुपरकता को आधार बनाकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण की स्थापना भी की, किन्तु तथ्यों और घटनाओं की व्याख्या अपने यूरोपीय दृष्टिकोण से करने के कारण जाने-अनजाने बहुत सी गलतियाँ कीं जो उनके लक्ष्यों की पूर्ति के लिए जरूरी थीं। उदाहरण के लिए भारत की दयनीय स्थिति का झूठा चित्रण करके अपने आप को उन्नत साबित करने का काम नई शिक्षा द्वारा किया गया।

दूसरी तरफ, धर्मपाल द्वारा इकठ्ठे किये गए ब्रिटिश दस्तावेजों से साबित होता है कि अंग्रेजों का यह कथानक झूठा है।मसलन, सन् 1822-25 के ‘मद्रास प्रेसीडेंसी’ में किये गए सर्वे के अनुसार, उस समय वहां  11,575 स्कूल और 1,094 कॉलेज थे जिनमें क्रमश: 1,57,195 और 5,431 विद्यार्थी पढ़ रहे थे। जातिगत बनावट के बारे में भी हैरान करने वाले आंकड़े सामने आते हैं, जिनके अनुसार तमिल-भाषी क्षेत्र में शूद्र और उनसे निचली जातियों से संबंधित 70 से 80% विद्यार्थी थे, उड़िया क्षेत्र में 62%, मलयालम-भाषी क्षेत्रों में 54% और तेलगु क्षेत्रों में 50% थे।  

यही बात तकनीकी ज्ञान के बारे में भी लागू होती है। उत्तरप्रदेश के अतिरंजी-खेड़ा में 12वीं शताब्दी ईसा पूर्व में लोहे का प्रयोग होता था और 18वीं शताब्दी तक बढिया किस्म का स्टील बनाया जाता था। उस समय प्रति वर्ष उच्च कोटि का स्टील बनाने वाली कम-से-कम 10,000 ऐसी भट्टियां कार्यरत थीं जो साल में बीस टन तक स्टील तैयार करती थीं। चेचक के इलाज के लिए टीकाकरण (इनोक्युलेशन) किया जाता था और ‘प्लास्टिक सर्जरी’ द्वारा अंग मरम्मत की जाती थी। सुश्रुत के सदियों बाद, 18 वीं शताब्दी तक यह विद्या मौजूद थी। यह ‘भारतीय सिविल सेवा’ के एक अफसर डा. बैरी द्वारा वर्णित, पूना में उनके द्वारा देखे गए एक आपरेशन से पता चलती है।  

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उसके बाद वामपंथी इतिहासकारों का युग आया। उन्होंने भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उपयोग पाश्चात्य दृष्टि से ही किया जिसमें एक बात ईसाई दृष्टिकोण के समान ही थी कि जो भी पाश्चात्य नहीं है, वह घटिया है। इसके चलते उन्होंने भी तथ्यों, घटनाओं का विश्लेषण और व्याख्या अपने लक्ष्य वामपंथ को फ़ैलाने के लिए उपयुक्त वातावरण बनाने के लिए की। उसके लिए जरूरी था कि भारतीय चिंतन को घटिया साबित किया जाये, ताकि नई प्रस्थापनाएँ समाज में घर कर सकें। हालांकि उन्होंने मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाने में कोई कोताही नहीं की, किन्तु कार्ल मार्क्स का यह कथन स्वयं वाम सोच को समझने के लिए काफी है, कि ‘ब्रिटिश भारत में चाहे कितने भी निर्दयी रहे हों, भारत के लिए समाधान केवल उसके पश्चात्यीकरण में ही है जो विजेता यूरोपीय श्रमिक वर्ग के द्वारा ही संभव है।’   

इतिहासकार धर्मपाल ने भारत में ‘ईस्ट इण्डिया कंपनी’ और ब्रिटिश प्रशासन से जुड़े अफसरों द्वारा किये गए सर्वेक्षणों के रिकार्ड ब्रिटिश संग्रहालयों से खोजकर, ब्रिटिश-पूर्व भारतीय इतिहास का एक छिपा हुआ पक्ष सामने लाने का कार्य किया है। वर्तमान इतिहास लेखन में भारतीय दृष्टि की स्थापना के लिए इसे उपयोग में लाया जाना चाहिए। खासकर इसलिए कि यह पूर्णतः तथ्यों पर आधारित है। ये तमाम आंकड़े जिनका प्रयोग धर्मपाल ने किया है वे किसी भारतीय पक्षपाती द्वारा नहीं जुटाए गए हैं, बल्कि ब्रिटिश रिकार्ड से ही लिए गए हैं।  

अंग्रेजों ने उस समय उन आंकड़ों को अपने निहित स्वार्थों के कारण सार्वजनिक नहीं किया, किन्तु उनकी इस बात के लिए प्रशंसा करनी चाहिए कि भले ही उन्होंने उन आंकड़ों के आधार पर भारतीय समाज को गुलाम बनाने की योजनाएं बनाईं, किन्तु एक तथ्यपरक जानकारी को जिन्दा रखने का काम भी किया। भारत को देखने का एक प्रयास जेम्स मिल द्वारा किया गया है जिसने ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ नामक पुस्तक लिखी जो 1820 के बाद भारत आने वाले हर ब्रिटिश अफसर को पढाई जाती थी। उसके अनुसार सभ्यता का उच्चतर स्तर, सफल सैनिक सभ्यता है। इस दृष्टि से भारत बहुत ज्यादा स्त्रियों जैसा है, इसलिए सभ्यता के पैमाने पर निचले स्तर पर है।

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अभी इतिहास लेखन की बात जोर-शोर से उठाने वाले भाजपा से जुड़े लोग हैं। वे भी कितना निष्पक्ष लेखन कर पाएंगे यह समय ही बताएगा, क्योंकि उनकी सोच में सब कुछ जो हिन्दू संस्कृति से जुड़ा है वह अच्छा ही है। जबकि किसी भी समाज में अच्छाई – बुराई दोनों ही विद्यमान रहती हैं। इतिहासकारों को उनका तथ्यपरक वर्णन करना चाहिए और गुण-दोष का विश्लेषण भी निष्पक्षता पूर्वक किया जाना चाहिए। दोष को छुपाना और गुण को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की मानव सहज वृति से बचना होगा। पूर्ववर्ती इतिहासकारों से मदद लिए बिना कोई भी इतिहास का पुनर्लेखन संभव नहीं, बल्कि ऐसी मदद अपरिहार्य है। ज्यादा जरूरत विलोपन दूर करने और निहित स्वार्थवश प्रस्थापनाओं के विश्लेषण और व्याख्याओं की त्रुटियों को दूर करने की है।

इतिहास में कोई भी बदलाव प्रामाणिकता के आधार पर ही किया जाना चाहिए, ताकि विद्वत समाज में उसे वैश्विक स्तर पर मान्यता मिल सके। मुस्लिम आक्रान्ताओं ने मुख्य अपराध भारतीय पुस्तकालयों को नष्ट करके ज्ञान भंडार को नष्ट करने का किया, जिसके साथ इतिहास से जुड़े ग्रन्थ भी निसंदेह नष्ट हुए होंगे। अंग्रेजों ने अधिक चालाकी से काम लिया। उन्होंने भारतीय समाज की कमजोरियों और शक्तियों को समझा और उनका उपयोग अपने हित में करने के लिए ऐसी व्याख्याएँ कीं, नीतियाँ बनाई जिससे हमारी कमजोरियां बढती जाएं और शक्तियां समाप्त होती जाएं। उदाहरण के लिए भारतीय सामुदायिक व्यवस्था को तोड़ना, शिक्षा पद्धति को नष्ट करना, कुटीर उद्योगों को नष्ट करना आदि। कोई भी राष्ट्र आत्मसम्मान को त्यागकर आगे नहीं बढ़ सकता।

इतिहास आत्मसम्मान को बनाए रखने का माध्यम भी है और अपनी कमियों और शक्तियों को समझकर मार्ग चयन करने में मार्ग-दर्शक भी। इसी दृष्टि से इतिहास का सचाई से लेखन किया जाना चाहिए, ताकि इतिहास की गलतियाँ न दोहराई जाएं और सुधार के काम दृढ़ता से किये जा सकें। (सप्रेस)

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