Global Warming : पृथ्वी की सेहत की चिंता करना भी जरुरी

सुदर्शन सोलंकी

पृथ्वी की केवल 15 फीसदी जलमग्न भूमि ही प्रदूषण से अप्रभावित है क्योंकि चार करोड़ टन की भारी धातु, जहरीला कीचड़ और अन्य औद्योगिक कचरा दुनियाभर में पानी में फेंका जा रहा है जिससे 85 फीसदी जलमग्न भूमि प्रदूषित हो चुकी है। तीन अरब से ज्यादा लोग भूमि निम्नीकरण से प्रभावित हैं जिसके अतिगंभीर परिणाम समस्त जीवधारियों को ही भोगने पड़ेंगे।

जीवाश्मों के अध्ययन से ज्ञात हुआ है की पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को करीब 3.5 अरब साल हो चुके हैं। इतने समय में पृथ्वी कई तरह की आपदाओं से गुजरी है। मानव ने पृथ्वी के संसाधनों का अनुचित दोहन किया है. जिसके परिणाम स्वरुप जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग और जैवविविधता इत्यादि की क्षति हुई है। मानवजनित गतिविधियों के कारण पृथ्वी की आवासीयता खत्म होती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव का कहना है कि ‘प्रकृति के बिना हम जिंदा ही नहीं रह सकते हैं. उसके खिलाफ हम लंबे समय से एक युद्ध में उलझे हैं’।

लाइव साइंस आईपीसीसी अर्थात जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल के अनुसार 1880 के बाद से समुद्र स्तर 20 फीसदी बढ़ गया है, और यह लगातार बढ़ता ही जा रहा है। यह 2100 तक बढ़ कर 58 से 92 सेंटीमीटर तक हो सकता है, जो की पृथ्वी के लिए बहुत ही खतरनाक होगा। आईपीसीसी के पर्यावरणविद के अनुसार 2085 तक मालदीव पूरी तरह से जलमग्न हो सकता है।

पृथ्वी की केवल 15 फीसदी जलमग्न भूमि ही प्रदूषण से अप्रभावित है क्योंकि चार करोड़ टन की भारी धातु, जहरीला कीचड़ और अन्य औद्योगिक कचरा दुनियाभर में पानी में फेंका जा रहा है जिससे 85 फीसदी जलमग्न भूमि प्रदूषित हो चुकी है। तीन अरब से ज्यादा लोग भूमि निम्नीकरण से प्रभावित हैं जिसके अतिगंभीर परिणाम समस्त जीवधारियों को ही भोगने पड़ेंगे।

समस्त जीव पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भर है. इसलिए पृथ्वी को रहने लायक बनाए रखने में पारिस्थितिकी तंत्र की भूमिका सबसे बड़ी होती है। यह स्वस्थ होगा तब ही पृथ्वी और इस पर रहने वाले जीव भी उतने ही स्वस्थ होंगे, किंतु हमारे अनुचित क्रिया-कलापों ने पारिस्थितिकी तंत्र को अस्वस्थ कर दिया है. जिसके परिणामस्वरूप भूमि, जल और वायु, इन सभी की उपलब्धता और गुणवत्ता में न केवल तीव्र गिरावट हुई है, बल्कि इनके अनेक घटक विषाक्त भी हो गए हैं। यह मानव और पर्यावरण, दोनों के लिए चिंताजनक है। यदि इसका समाधान नहीं किया गया तो पृथ्वी पर जीवन की संभावना लगभग ख़त्म हो जाएगी।

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पृथ्वी इस समय अतिरिक्त 1.9 डिग्री गर्म होने की ओर है जो पेरिस समझौते के लक्ष्य से कहीं ज्यादा है। हर साल 90 लाख लोग प्रदूषण से मरते हैं। पृथ्वी पर पौधों और जानवरों की प्रजातियों में से दस लाख प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा है।

हम शरीकरण या विकास को रोक नहीं सकते क्योंकि मानव प्रगति के लिए उद्योग एवं शहरीकरण भी आवश्यक है। लेकिन हमें इस पर भी ध्यान देना आवश्यक है कि हम जितने वृक्षों को काट रहे है क्‍या उतने वृक्षों को रोपित भी कर रहे है? वायुमंडल में कार्बन की मात्रा कम करने के लिए सोलर पावर तथा स्वच्छ ईंधन के उपयोग को बढ़ावा भी देना चाहिए। जब हम हमारी पृथ्वी की चिंता पूरी जगरूकता से करने लगेंगे तभी हम हरी-भरी प्रकृति, हरा भरा जीवन की संकल्‍पना को मूर्त रुप दे सकेंगे।

पृथ्वी को स्वस्थ रखने के लिए पौधारोपण के साथ ही तालाब और कुएं में पानी संरक्षित करने के कारगर उपाय अपनाने की आवश्यकता है। पॉलीथिन हमारी पृथ्वी को कई तरह से नुकसान पहुंचा रही है, इसके इस्तेमाल को रोकने के लिए सख्त कानून की जरूरत है। इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट से भी पृथ्वी की आवासीयता को नुकसान हो रहा है इसलिए ई-कचरे का सही तरीके से प्रबंधन और निपटान करना जरुरी है। (सप्रेस)

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