महिलाओं, बच्चों को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से बचाना जरूरी 

अमिताभ पाण्डेय

 ‘संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ (यूएनईपी) के द्वारा किए गए शोध के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण विस्थापित होने वाले 80 प्रतिशत महिलाएँ या बच्चे हैं। इनमें किशोरी और युवा लड़कियां भी शामिल हैं जो कि गरीबी, हिंसा या अनपेक्षित गर्भधारण, असमय गर्भपात के बढ़ते जोखिम का सामना कर रही हैं।

जलवायु परिवर्तन समाज के हर वर्ग से जुड़ा विषय है। इसके कारण सबके लिए मानव अधिकार, सबके लिए सामाजिक समानता के लक्ष्य को पूरा करना मुश्किल हो रहा है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं और बच्चों को समस्याएं अधिक हो रही हैं।

‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ (डब्ल्यूएचओ) द्वारा किए गए एक शोध के अनुसार जलवायु परिवर्तन से महिलाएं, नवजात बच्चे अधिक प्रभावित होते हैं। महिलाएं अपने स्वास्थ्य की तरफ ध्यान दिए बिना घर-परिवार से लेकर अपने कार्यस्थल के काम को पूरा करने में लगी रहती हैं। ऐसा करते हुए वे कई बार गंभीर बीमारियों की शिकार हो जाती हैं जिसका उपचार मुश्किल से हो पाता है। ऐसी बीमार महिलाओं की मौत कभी कभी समय पर उपचार नहीं मिलने या पैसे के अभाव में त्वरित उपचार नहीं मिलने के कारण हो जाती है। 

भारत में वंचित, कमजोर समुदाय की महिलाओं के साथ ऐसी घटनाएं ज्यादा देखने, सुनने में आती हैं। ‘संयुक्त राष्ट्र महिला’ (यूएन वुमॅन) द्वारा ‘सीओपी – 28’ के दौरान जारी की गई एक रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2050 तक जलवायु परिवर्तन के कारण 15.8 करोड से अधिक महिलाएँ और लड़कियाँ गरीबी में चली जाएँगी। इस वर्ष तक लगभग 23.2 करोड महिलाओं, बच्चों को खाद्य-असुरक्षा का सामना करना पड़ सकता है।

तूफ़ान, बाढ़ या गर्मी जैसी चरम मौसम की स्थितियाँ बढ़ रही हैं, जिससे दुनिया भर में हज़ारों लोगों को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। ‘संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ (यूएनईपी) के द्वारा किए गए शोध के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण विस्थापित होने वाले 80 प्रतिशत महिलाएँ या बच्चे हैं। इनमें किशोरी और युवा लड़कियां भी शामिल हैं जो कि गरीबी, हिंसा या अनपेक्षित गर्भधारण, असमय गर्भपात के बढ़ते जोखिम का सामना कर रही हैं।

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उल्लेखनीय है कि भारत जैसे विकासशील देशों में रहने वाले कमजोर आय वाले समूहों पर इसका प्रभाव अधिक होता है। इस वर्ग के परिवारों को बाढ़, भूकंप, सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण अपने क्षेत्रों से पलायन करना पड़ता है। इसके साथ ही शहरों में किसी बड़े प्रोजेक्ट, विकास कार्यों के लिए भी कमजोर वर्ग के लोगों का विस्थापन किया जाता है।

पलायन और विस्थापन की इस प्रक्रिया में पिछड़ी जातियों के परिवार, गरीबी के बीच जीवनयापन कर रहे लोगों के सामने पेयजल, साफ-सफाई, पर्याप्त खाद्यान्न की समस्याएं भी होती हैं। जलवायु परिवर्तन का नुकसान इस वर्ग के लोगों पर अपेक्षाकृत अधिक होता है। वंचित समुदायों के परिवार सामाजिक अन्याय के साथ ही शासन और समाज की अनदेखी से बुनियादी सुविधाओं के अभाव में अपना जीवन गुजारने पर मजबूर होते हैं। 

हमारे बीच जो समुदाय मूलभूत संसाधनों से वंचित रहते हुए झुग्गी बस्तियों, नदी – नालों के किनारे, औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास प्रदूषित वातावरण में अपनी जिंदगी चला रहे हैं, उनके लिए जलवायु परिवर्तन ने समस्याएं बढ़ा दी हैं। इसे ध्यान में रखते हुए सामाजिक सरोकार से जुड़े विषयों पर शोधपरक कार्य करने वाली संस्था “संगथ” ने 23 दिसम्बर 2024 को भोपाल में कार्यशाला का आयोजन किया। इसका विषय “जलवायु संकट : अनुभव और अपेक्षाएं, हाशिए से आवाजें” था। कार्यशाला में जलवायु परिवर्तन के कारण कमजोर वर्ग के लोगों, महिलाओं और बच्चों पर होने वाले दुष्प्रभाव और उनके समाधान पर चर्चा की गई।

इस कार्यशाला में राज्य के स्वास्थ्य विभाग की ओर से डा. राजेश सीसोदिया, ‘द एनालिसिस’ संस्था से ऋषभ श्रीवास्तव, ‘संगथ’ संस्था से डाक्टर अनंत भान, निधि, सुनील, मृन्मय,  हरिकिशन, ‘एका’ से सचिन श्रीवास्तव, नीटू सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता आरती पाराशर, सरस्वती, ‘फिया फाउंडेशन’ से पल्लव, कजलीखेड़ा गांव से अनिता, जोया, शमशा बी, मेहताब, रवीना, रिंकू, योगिता अहिरवार, राहुल पटेल, दुर्गा नगर से रुचि, अंकित के साथ ही वंचित समुदाय के बीच काम करने अनेक सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे। 

कार्यशाला में अपने विचार प्रकट करते हुए ‘संगथ’ संस्था की ओर से निधि ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का सर्वाधिक असर वंचित समुदाय की महिलाओं और उनके बच्चों पर होता है। हमें जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से वंचित समुदाय के लोगों को बचाने के लिए विशेष कार्य योजना बनाना चाहिए। इस अवसर पर ‘द एनलेसिस’ संस्था से ऋषभ श्रीवास्तव ने बताया कि मौसम में आए बदलाव के कारण गर्मी का असर बढ़ता जा रहा है ।

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मध्यप्रदेश में भी इसके कारण लोगों के स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ रहा है। ऋषभ ने बातचीत के दौरान कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी बड़े शहरों का ‘हीट एक्शन प्लान’ बनाने के निर्देश दिए हैं, लेकिन भोपाल सहित मध्यप्रदेश के अनेक शहरों में अभी तेज गर्मी से निपटने के लिए प्रभावी कार्य योजना पर काम नहीं किया जा रहा है। 

उन्होंने कहा कि हमें हीट-वेव से बचाव के लिए विशेष योजना बनाकर उस पर तत्काल काम शुरू करना होगा। इसके साथ ही समाज के अलग-अलग वर्गों पर जलवायु परिवर्तन का जो दुष्प्रभाव है, उसे ध्यान में रखना होगा। कमजोर वर्ग के लोगों का बेहतर स्वास्थ्य बना रहे, इसके लिए विशेष योजना बनाकर उस पर काम करना होगा।

इस अवसर पर ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन’ में ‘जलवायु परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य’ विषय के नोडल अधिकारी डॉ. राजेश सीसोदिया ने कहा कि शासन की ओर से जलवायु परिवर्तन को लेकर विशेष कार्यक्रम पर जोर दिया जा रहा है। गर्मी से बचाव के लिए ‘एडवाइजरी’ लगातार जारी की जाती है। ठंड से बचाव के लिए भी नागरिकों को सलाह दी जाती है। आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन के बारे में आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से महिलाओं को जागरूक किया जाएगा।

इस कार्यक्रम के दौरान सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी अपने अनुभव बताए। कार्यशाला के दौरान समूह चर्चा में जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से बचाव के लिए समस्या की पहचान उसके समाधान के संभावित उपाय को लेकर प्रस्तुति दी गई। इसके लिए पांच समूह बनाए गए थे जिन्होंने अपनी कार्ययोजना को प्रस्तुत किया। समूह चर्चा में इस बात पर सहमति बनी कि शासन, सामाजिक संस्थाओं और जनप्रतिनिधियों को मिलकर जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास तेज करना होंगे। (सप्रेस)

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