जलवायु परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित हो रहे हाशिए के समुदाय

प्रख्यात पर्यावरणविद और वैज्ञानिक सौम्या दत्ता का व्याख्‍यान

भोपाल। क्लाइमेट जस्टिस मुहिम, भोपाल द्वारा आयोजित “जलवायु न्याय, नीतियाँ और हाशिए के समुदाय” विषय पर परिचर्चा एकता परिषद कार्यालय, गांधी भवन भोपाल में आयोजित हुई। इसमें प्रख्यात पर्यावरणविद और वैज्ञानिक, पूर्व सलाहकार सदस्य, यूनाटेड नेशन क्लाइमेट टेक्नालाजी सेंटर और मूवमेंट फॉर एडवानसिंग अंडरस्टेंडिंग ऑफ सस्नेबिलिटी एंड म्यूच्वालिटी के ट्रस्टी सौम्या दत्ता मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित थे।

कार्यक्रम की शुरुआत विजय कुमार द्वारा विषय की भूमिका और महत्व पर प्रकाश डालते हुए की गई। उन्होंने कहा, “जलवायु परिवर्तन वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है, जिसका प्रभाव विशेष रूप से समाज के कमजोर वर्गों पर पड़ रहा है। मानवजाति जिस पर्यावरणीय विनाश के गंभीर खतरे का सामना कर रही है, उस पर समझ बनाने और जलवायु न्याय, नीतियों और हाशिए पर स्थित समुदायों के बीच संबंधों को समझना आज के समय में अत्यंत महत्वपूर्ण है।”

मुख्य वक्ता सौम्या दत्ता ने अपने संबोधन में कहा, “जलवायु परिवर्तन केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक और आर्थिक न्याय का मुद्दा भी है। हमें यह समझना होगा कि इसका प्रभाव समाज के विभिन्न वर्गों पर अलग-अलग तरह से पड़ता है। हाशिए के समुदाय, शहरी क्षेत्रों में  जैसे निर्माण श्रमिक, पथविक्रेता, कचरा बीनने वाले, कुली, रिक्शा चालक और गिग वर्कर जो इस संकट के लिए सबसे कम जिम्मेदार हैं, वे इससे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। इसी प्रकार इसमें ग्रामीण क्षेत्रों के खेतिहर मजदूर, छोटे किसान, कारीगर और मछुवारे शामिल हैं।  हमारी नीतियों और कार्यों में इस असमानता को ध्यान में रखना अत्यंत आवश्यक है।” हाशिए के समुदायों पर पढ़ने वाले असर का सही मूल्यांकन अत्यंत आवश्यक है। पीड़ित हाशिए के समुदायों के साथ खड़ा होना और उन्हे सहयोग और मजबूत करना नागरिक समाज का दायित्व है। 

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उन्होंने आगे कहा, “हमें ऐसी नीतियाँ बनानी होंगी जो न केवल पर्यावरण की रक्षा करें, बल्कि समाज के सभी वर्गों के हितों का भी ध्यान रखें। यह सुनिश्चित करना होगा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों में कोई भी पीछे न छूटे।”

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीवान ने अपने वक्तव्य में कहा कि “आज की यह परिचर्चा हमें जलवायु न्याय के महत्व को समझने में मदद करती है। यह हमारे लिए एक अवसर है कि हम अपनी जिम्मेदारियों को पहचानें और उन्हें पूरा करने के लिए कदम उठाएं। हमें सामूहिक रूप से काम करना होगा ताकि हम एक स्थायी और न्यायसंगत भविष्य की ओर बढ़ सकें।”

परिचर्चा के दौरान, प्रतिभागियों ने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए। एक प्रतिभागी ने पूछा, “क्या आप बता सकते हैं कि हाशिए के समुदायों को जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान से कैसे बचाया जा सकता है?”

इस पर सौम्या दत्ता ने जवाब दिया, “इसके लिए हमें कई स्तरों पर काम करना होगा। पहला, हमें इन समुदायों और नागरिक समाज को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के बारे में शिक्षित करना होगा। दूसरा, हमें उन्हें आपदाओं से निपटने के लिए तैयार करना होगा, जैसे कि आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण देना। तीसरा, हमें ऐसी नीतियाँ बनानी होंगी जो इन समुदायों को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करें।”

एक अन्य सवाल के जबाब में उन्होंने कहा कि “वर्तमान  नीतियाँ और क्लाइमेट एक्शन प्लान एक शुरुआत हैं, लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं। हमें और अधिक महत्वाकांक्षी व समावेशी लक्ष्य निर्धारित करने की आवश्यकता है, साथ ही इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए ठोस कार्य योजनाएँ बनानी होंगी।”

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परिचर्चा का संचालन राजेश कुमार ने किया। उन्होंने विभिन्न दृष्टिकोण  सामने लाने और  सार्थक संवाद स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस कार्यक्रम ने जलवायु न्याय, नीतियों और हाशिए के समुदायों के बीच संबंधों पर महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान की। परिचर्चा ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर समग्र दृष्टिकोण अपनाने और सभी हितधारकों को शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उपस्थित नागरिक समाज ने क्लाइमेट जस्टिस के मुद्दे पर मिलकर काम करने का निर्णय लिया।

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