अनेक धाराओं के सेतु थे, गणेश शंकर विद्यार्थी

भारत डोगरा

हमारी आजादी के आंदोलन में अनेक जीवट की शख्शियतों ने हिस्सेदारी की थी। उनमें से एक थे – गणेश शंकर विद्यार्थी। हमारी पत्रकारिता की शुरुआत विद्यार्थी जी सरीखे निष्ठावान संपादकों से हुई थी, लेकिन वे आजादी के एक ऐसे सिपाही भी थे जिन्हें गांधी, भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद और नेहरू जैसे तरह-तरह के व्यक्तित्वों का अटूट विश्वास भी प्राप्त था।

25 मार्च: गणेश शंकर विद्यार्थी पुण्यतिथि

गणेश शंकर विद्यार्थी को एक अमर स्वतंत्रता सेनानी व एक महान संपादक के रूप में याद किया ही जाता है, पर इसके साथ हम यह भी नहीं भूल सकते कि वे आजादी की दो धाराओं के बीच सेतु की अद्वितीय भूमिका निभाते थे। उन्हें महात्मा गांधी का भी विश्वास प्राप्त था तो शहीद भगत सिंह का भी पूर्ण विश्वास प्राप्त था। चन्द्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी उनसे सलाह लेते थे तो जवाहर लाल नेहरु कांग्रेस में उनकी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका देखते थे।

इसके अतिरिक्त उन्होंने एक अन्य स्तर पर भी सेतु का कार्य किया। उन्होंने आजादी की लड़ाई को मजदूरों और किसानों के संघर्षों से जोड़ा। वे ऐसे भारत के लिए समर्पित थे जो न्याय और समता पर आधारित हो, जिसमें शोषण के लिए कोई स्थान न हो। मजदूरों व किसानों के संघर्ष से जुड़े रहना उनके लिए स्वाभाविक था, उनके विचारों के बहुत अनुकूल था। आजादी की मुख्य लड़ाई में इस पक्ष की कभी-कभी उपेक्षा भी हो जाती थी। उन्होंने कम-से-कम अपने कार्यक्षेत्र में यह उपेक्षा नहीं होने दी व इस तरह आजादी की लड़ाई को मजदूरों व किसानों के संघर्षों से जोड़कर उन्होंने उसे और मजबूत किया।

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उनकी सेतु की भूमिका एक अन्य दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण थी। प्रायः बुद्धिजीवियों के संघर्षों  और मेहनतकशों के संघर्षों के बीच जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे काफी दूरी बढ़ जाती है। जहां अभिव्यक्ति की आजादी जैसे मुद्दे प्रमुख होते हैं वहां किसान-मजदूर की कठिनाईयों की बात पीछे रह जाती है, पर विद्यार्थी जी अभिव्यक्ति की आजादी की लड़ाई को निरंतरता से लड़ते हुए किसानों-मजदूरों के संघर्षों में भी निरंतर सक्रिय रहे।

प्रत्यक्ष ब्रिटिश राज के क्षेत्रों में जो आजादी की लड़ाई चल रही थी, राजों-रजवाड़ों के क्षेत्र के संघर्ष प्रायः उससे अलग रह जाते थे। राजों-रजवाड़ों के विरुद्ध आवाज उठाने पर कई बार अत्यधिक उत्पीड़न सहना पड़ता था व न्याय के दरवाजे भी पूरी तरह बंद रहते थे। ऐसी आवाजें दब न जाएं, उन्हें देश के अन्य भागों भी में सुना जाए, इसके लिए विशेष प्रयास की जरूरत थी। विद्यार्थीजी ने संपादक के रूप में व स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भरसक प्रयास किया कि इन दबी हुई आवाजों को देश के अधिकतम लोगों तक पहुंचाएं।

गणेश शंकर विद्यार्थी की जीवन-गाथा का अधिकांश समय तरह-तरह की कठिनाईयों से घिरा रहा, कभी जेल-यात्रा, तो कभी मुकदमा तो कभी आर्थिक संकट। इन सभी कठिनाईयों के बीच उन्होंने इतनी मेहनत व निष्ठा से कार्य किया कि निरंतर उनका आदर-सम्मान बढ़ता ही गया और बहुत कम उम्र में ही उन्होंने गांधी से भगत सिंह, नेहरु से आजाद तक आजादी की लड़ाई के तमाम महान नेताओं का विश्वास प्राप्त कर लिया था।

सभी धर्मों की एकता व सद्भावना के प्रति उनकी प्रतिबद्धता बहुत मजबूत थी। हिंदू, मुसलमानों एवं सभी समुदायों की एकता के वे सेतु थे। अंत तक उन्होंने अपनी प्रतिबद्धता निभाई। भगतसिंह, राजगुरु व सुखदेव की फांसी के बाद उभरे उग्र जन-आक्रोश को टालने की गरज से कानपुर में विदेशी शासकों ने सांप्रदायिक हिंसा भड़का दी। इस हिंसा को रोकने के लिए विद्यार्थीजी सक्रिय हुए व हिंसा से लोगों को बचाने के प्रयास में उन्होंने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

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वे आजादी की लड़ाई के साथ अभिव्यक्ति की आजादी के संघर्ष व न्याय पर आधारित समाज के संघर्ष के प्रमुख स्तंभ थे। विभिन्न क्षेत्रों में उनका योगदान और इसके लिए उनके निरंतरता से चलने वाले अथक प्रयास व संघर्ष आज भी प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत हैं।

जिन परिस्थितियों में गणेश शंकर विद्यार्थी का जीवन संघर्ष चला उसका अध्ययन हम आज करते हैं तो लगता है कि इतने कठिन हालातों में एक साथ अखबार निकालना, लेखन करना, आजादी की लड़ाई को नेतृत्व देना, किसानों व मजदूरों के संघर्ष से जुड़ना व निरंतरता से सांप्रदायिक सद्भावना के लिए कार्य करना एक बहुत बड़ी चुनौती था जिसे आज की स्थितियों में शायद ही कोई इतनी सफलता से निभा सके। बहुत से लोग तो कहेंगे कि यह सब एक साथ निरंतरता से निभाना संभव ही नहीं है, पर गणेश शंकर विद्यार्थी ने तो जीवन भर यह किया और निरंतरता से किया।

हालांकि शहीद भगत सिंह के बलिदानों को आज सब जानते हैं, पर यह बहुत कम लोग जानते हैं कि शहीद भगत सिंह के लिए भी गणेश शंकर विद्यार्थी एक पथ-प्रदर्शक की तरह थे। यह भूमिका निभाते हुए भी गणेश शंकर विद्यार्थी को महात्मा गांधी का बहुत सम्मान मिला। इससे पता चलता है कि भारत की आजादी की लड़ाई में गणेश शंकर विद्यार्थी की अपनी ही तरह की एक अति-विशिष्ट व अद्वितीय भूमिका थी। आज उनकी इस भूमिका को नए सिरे से पहचानने की व व्यापक स्तर पर जानने की जरूरत है, ताकि नई पीढ़ी के लिए भी व्यापक स्तर पर गणेश शंकर विद्यार्थी एक बड़े प्रेरणा स्रोत बने रहें। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जिस तरह की कठिनाईयों और चुनौतियों के दौर से देश आज गुजर रहा है उनमें गणेश शंकर विद्यार्थी का जीवन संदेश बहुत प्रासंगिक व महत्त्वपूर्ण है। (सप्रेस)

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