समान नागरिक संहिता को धर्म विशेष से जोड़कर नहीं देखें: चर्चा का यही सही समय

 ‘सेवा सुरभि’ एवं प्रेस क्लब द्वारा संवाद में शहर के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों की बेबाक राय

इंदौर, 9 जुलाई। समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर चर्चा करने का यही सही समय है। इस मुद्दे को किसी धर्म विशेष अथवा पार्टी से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। इससे किसी भी धर्म का नुकसान नहीं होगा। यही सही समय है, जब हम इस मुद्दे पर गुण, दोष के आधार पर विचार कर सकते हैं। केन्द्र सरकार समान नागरिक संहिता का जो मसौदा लेकर आ रही है, उसका रूप, स्वरूप क्या होगा, इस पर पहले से कोई धारणा बना लेना अथवा इसका विरोध करना सही नहीं होगा।

यह निष्कर्ष है आज की संगोष्‍ठी का, जिसका विषय था समान नागरिक संहिता। ‘संस्था सेवा सुरभि’ और इंदौर प्रेस क्लब ने मिलकर राजेन्द्र माथुर सभागृह में इस बहुचर्चित विषय पर शहर के प्रख्यात विधि विशेषज्ञों, शिक्षाविद, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि एवं सामाजिक क्षेत्र से जुड़े गणमान्य लोगों को आमंत्रित कर उनकी राय जानने का प्रयास किया।

अतिथि वक्ताओं में पूर्व राज्यपाल एवं न्यायमूर्ति वी.एस. कोकजे, पद्मश्री जनक पलटा, शहर काजी डॉ. इशरत अली, इंदौर डायोसिस के बिशप चाको, अभ्यास मंडल के रामेश्वर गुप्ता एवं शिवाजी मोहिते, इंदौर उत्थान अभियान के अध्यक्ष अजीतसिंह नारंग, वरिष्ठ अभिभाषक अजय बागड़िया, पूर्व उप महाधिवक्ता अभिनव धनोतकर, अभिभाषक सुश्री शन्नो शगुफ्ता खान, पत्रकार प्रवीण जोशी, शिक्षाविद एवं उद्योगपति अशोक बड़जात्या, आदिवासी संगठन के प्रतिनिधि पोरलाल खरते शामिल थे, जिन्होंने पूरी बेबाकी के साथ अपनी राय रखी।

समाज में भय का वातावरण बनाया जा रहा है

इस संवाद का शुभारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। प्रेस क्लब अध्यक्ष अरविंद तिवारी ने प्रारंभ में समान नागरिक संहिता पर केन्द्रित इस आयोजन की महत्ता बताई।  विषय प्रवर्तन वरिष्ठ पत्रकार अमित मंडलोई ने करते हुए कहा कि विविधता ही हमारी एकता है, जहां अलग-अलग परंपरा, बोली, भाषा, भूषा है, वहां समान नागरिक संहिता की बात करना समझ से परे है। हिन्दू धर्म में विविधता है तो मुस्लिम समाज में भी कई फिरके हैं। बीजेपी इसे इसीलिए ला रही है, क्योंकि वह उसका एजेंडा है। कुछ लोगों को लगता है कि समान नागरिक संहिता लागू हो गई तो अल्पसंख्यक काबू में आ जाएंगे या सरकार के सामने सरेंडर कर देंगे। समाज में भय का वातावरण बनाया जा रहा है, हालांकि गोवा में आज भी समान नागरिक संहिता लागू है।  

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देश के राज्यों में अपराधिक कानून अलग-अलग ऐसे में समान नागरिक संहिता की बात बेमानी

बिशप चाको ने कहा कि अभी से कोई धारणा बनाना ठीक नहीं होगा। पता नहीं आगे क्या होगा, यह अभी से आंकलन करना उचित नहीं है। अभिभाषक अजय बागड़िया ने कहा कि यूसीसी मोदी सरकार का राजनीतिक शगूफा है। जब अपराधिक कानून सीआरपीसी देश के राज्यों में अलग-अलग है तो इस स्थिति में समान नागरिक संहिता की बात बेमानी है। सरकार इतने वर्षों से क्या कर रही थी।

सामाजिक कार्यकर्ता अजीतसिंह नारंग ने कहा कि सिख धर्म में सबसे बड़ा राष्ट्र धर्म है। जब भी राष्ट्र पर संकट आया सिखों ने बलिदान देने में देर नहीं की। गुरूनानक देव ने भी मानव धर्म की बात की है। उन्होंने भी माना कि समाज में आर्थिक, सामाजिक असमानताए हैं।  धर्म के नाम पर नफरत फैलाई जा रही है। इसलिए आज समान नागरिक संहिता की जरूरत है।

विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसी तीन बातें यूसीसी में प्रमुख

उद्योगपति अशोक बड़ाजात्या  ने कहा कि कानून बनने के पहले ही उसका विरोध करना ठीक नहीं है। विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसी तीन बातें यूसीसी में प्रमुख है। हम धर्म सापेक्ष हैं,  निरपेक्ष नहीं।

अभिभाषक शगुफ्ता खान ने कहा कि कुरान शरिया 1400 साल पुराना है। कुरान की कई आयतें हैं, उनसे छेड़छाड़ नहीं कर सकते। सभी धर्मों के प्रमुखों को बैठकर इस पर चर्चा करना चाहिए। यदि किसी राज्य के पास शक्ति है तो वह इसे तुरंत लागू कर देगा। समान नागरिक संहिता संविधान के अनुसार अपेक्षित है, लेकिन इसे धर्मावलंबियों पर छोड़ देना चाहिए।

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आदिवासी समाज का प्रकृति और संस्कृति से अधिक जुड़ाव

आदिवासी समाज के पोरलाल खरते ने कहा कि आदिवासी समाज में आज भी लोकतंत्र है और महिला-पुरुष  विवाह के लिए स्वतंत्र है। आदिवासी समाज प्रकृति और संस्कृति से अधिक जुड़ा है। यह समाज चाहता है सबको हवा, पानी और अनाज मिले तथा आर्थिक भेदभाव समाप्त हो।

अभ्यास मंडल के शिवाजी मोहिते ने कहा कि नदियों की सफाई, पर्यावरण, मास्टर प्लान, आर्थिक मंदी और मंहगाई पर चर्चा करने के बजाय हम समान नागरिक संहिता पर चर्चा कर रहे है। इससे लगता है कि ये विषय किसी को खुश करने के लिए रखा गया है, जिसकी कोई जरूरत नहीं। उद्योगपति प्रमोद डफरिया ने कहा कि सकारात्मक सोच रखना चाहिए। समान नगरिक संहिता बन जाने से अच्छा ही होगा।

शहरकाजी डॉ. इशरत अली ने कहा कि कामन लॉ सबके बराबर है, लेकिन अब पर्सनल लॉ को डिस्टर्ब करने की बात हो रही है। अगर समाज शिक्षित होगा तो परिवार छोटे होंगे। इसका संबंध जाति से नहीं होकर शिक्षा से है। अब शिक्षा की अधिक जरूरत है।

पूर्व उपमहाधिवक्ता अभिनव घनोतकर ने कहा कि शिक्षा का अधिकार बन चुका है, लेकिन उस पर अमल नहीं हो रहा है। यह काम एक दिन में नहीं होगा। इसमें तीन साल लग जाएंगे। हर राज्य सरकार को बिल पास करना होगा उसके बाद लागू होगा।

सबको न्याय, सामाजिक सुधार और लिंग भेद नहीं होना चाहिए

भाजपा प्रवक्ता गोविंद मालू ने कहा कि हम खुले दिमाग से बात करें और समान नागरिक संहिता बनने दें। पद्मश्री जनक पलटा ने कहा कि सबको न्याय मिलना चाहिए, सामाजिक सुधार होना चाहिए और लिंग भेद नहीं होना चाहिए। अग्रवाल समाज की प्रतिभा मित्तल  ने कहा कि कोई भी संहिता बने, महिलाओं के सम्मान की पूरी रक्षा होना चाहिए। किशोर कोडवानी ने कहा कि यह चर्चा गलत समय पर हो रही है। मनुष्य के हाथ में नहीं कि वह किस जाति या परिवार में पैदा हो।

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1948 से यह विषय लंबित, विधेयक बनाने का यही उचित समय

संवाद का समापन करते हुए निष्कर्ष के रूप में न्यायमूर्ति वी.एस. कोकजे  ने कहा कि जब एक देश एक विधान की बात हो रही है तो समान नागरिक संहिता पर बात क्यों नहीं होना चाहिए। 1948 से यह विषय लंबित है, लेकिन इस पर चर्चा करने और विधेयक बनाने का यही सही समय है। हर कानून को धर्म के चश्मे से देखना बंद करना होगा। धर्म को हमे समझने की जरूरत है कि सबकी आस्था अलग-अलग है। समान नागरिक संहिता की बात डॉ. अम्बेडकर और के.एस. मुंशी ने भी की है। तलाक मुस्लिम समाज में होते हैं, हिन्दुओं में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी, लेकिन बाद में बन गई। हम एक-दूसरे से सीखते हैं फिर इतना विरोध क्यों। बाहर के देशों में तो हम अपने धर्म की रक्षा की बात नहीं करते, लेकिन अपने देश में खूब हायतौबा मचाते हैं। अगर समाज नागरिक संहिता विधेयक पास नहीं हुआ तो केन्द्र सरकार इसे अलग-अलग राज्यों में इसे पास करवाकर अपना एजेंडा पूरा कर सकती है।

अतिथियों का स्वागत संस्था सेवा सुरभि के संयोजक ओमप्रकाश नरेड़ा, अतुल शेठ, कुमार सिद्धार्थ, अरविंद जायसवाल, अनिल मंगल, प्रेस क्लब उपाध्यक्ष प्रदीप जोशी आदि ने किया। संचालन अतुल शेठ ने किया और आभार माना कुमार सिद्धार्थ ने।

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