दो हजार की नोट वापसी : आरबीआई की साख पर सवाल

अरविन्द सरदाना

दो हजार रुपए के नोटों की वापसी को सरकार और ‘आरबीआई’ यूं तो ‘क्लीन नोट’ यानि चार-पांच साल चल चुके कटे-फटे–गले नोटों को बदलने की सामान्य प्रक्रिया बता रहे हैं, लेकिन जिस तरह से इसे किया गया उसने ‘आरबीआई’ की साख पर थोड़ा-बहुत बट्टा तो लगाया ही है।

हाल ही में ‘रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया’ (आरबीआई) ने दो हजार की नोटबंदी करके अपनी साख को कमज़ोर किया है। भारतीय मुद्रा के इस बड़े नोट को वापस लेने का आदेश तर्कसंगत नहीं होने से लगता है ‘आरबीआई’ खुद को अपने ही मकड़जाल में फंसा रही है।

दो हजार के नोट को वापस लेने के आदेश में बुनियादी तौर पर कई खामियां हैं। यह देखा गया है कि पिछले कुछ वर्षों से 2000 के नोट का चलन कम हो रहा था और उसे धीरे-धीरे चलन से बाहर लाने की कोशिश की जा रही थी। यह ‘आरबीआई’ की ‘क्लीन नोट’ नीति के अंतर्गत उठाया गया कदम था। नतीजे में इस नोट की छपाई बंद कर दी गई और बैंकों द्वारा भी इसका उपयोग कम किया जाने लगा, साथ ही 500 के नोट की सप्लाई बढ़ा दी गई।

इन कदमों के तहत दो हजार के नोटों की संख्या 6.7 लाख करोड़ से घटकर 3.6 लाख करोड़ यानि कुल मुद्रा की 10 प्रतिशत रह गई है। यदि बैंकों को आदेश देकर इन नोटों को वापस लेते तो वे अपने आप कुछ वर्षों में कम, शायद 2-3 प्रतिशत ही रह जाते। यह इस बात से समझ सकते हैं कि एक नोट चार-पांच वर्ष तक ठीक रहता है। उसके बाद वह खराब होने लग़ता है। दो हजार के अधिकांश नोट पुराने हैं और इन्हें बाहर किया जा रहा था।

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जनता में इनका चलन कम करना था तो एक्सचेंज का ऐलान किया जा सकता था, पर यह चार महीने का कोई औचित्य नहीं था। यदि यह समय वर्ष भर का रखा जाता तो इस प्रकार भगदड़ नहीं मचती, न ही भय का माहौल बनता। ‘आरबीआई’ ने भगदड़ मचाई और अब कह रहे हैं कि भीड़ न लगाएँ। अलग-अलग बैंक अपने-अपने नियम का पालन कर रहे हैं और जनता परेशान है।

अंदाजा लगाइए कि 2000 के 181 करोड़ नोट अभी चलन में हैं। यदि आम लोगों को इन्हें चार महीनों में वापस करना है, तो यह बैंकों पर और जनता में एक हलचल पैदा करेगा ही। इतना कम समय देने से यह एक नोट बदलने का छोटा कारोबार ही खड़ा कर देगा। गरीब और बेरोज़गारों को अब इस धंधे में जुटा लिया जाएगा।

एक बार में केवल 20,000 तक, यानि एक समय में दस नोट बदले जाएंगे। यह एक विचित्र कदम है। एक व्यापारी के पास चार लाख की पूंजी 2000 के नोट में हो, जिसका उपयोग उसे कुछ समय बाद करना है तो उसे 500 के नोट में बदलने के लिए बीस बार बैंक की लाईन में खड़ा होना होगा। यह बेतुका है।

‘आरबीआई’ और जनता, सभी को मालूम है कि 2000 का नोट कोई रोज़ के खर्च के लिए नहीं रखता। जमा-पूंजी रखना और इसका बाद में उपयोग करना, मुद्रा का एक वाजिब गुण है। अर्थशास्त्र में पढ़ाया भी जाता है कि मुद्रा केवल विनिमय करने भर के लिए नहीं, पर एक जमा-पूंजी रखने का माध्यम भी है।

किसान, छोटा कारोबारी, व्यापारी, सभी कुछ-न-कुछ नगद रखते हैं जिसका उपयोग वे कुछ समय बाद सामान खरीदने के लिए करते हैं। यह उनका ‘वर्किंग कैपिटल’ है। अब यह पूंजी 500 के नोट में हो या 2000 के नोट में, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। 2000 का नोट रखना ज़्यादा आसान है। हमारे देश में खेती-किसानी, छोटे कारोबार और व्यापार नगद में ही चलता है।

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अर्थशास्त्र हमें समझाता है कि नोट के चलन के लिए कानूनी प्रावधान यानी ‘लीगल टेंडर’ होना एक आवश्यकता है। सबसे अहम बात है, मुद्रा या नोट पर जनता का विश्वास होना। हम मुद्रा का उपयोग कर पाते हैं, क्योंकि सभी इस बात पर विश्वास  करते हैं कि कोई भी इसे अस्वीकार नहीं करेगा। कानून के डर से नहीं पर जनता के विश्वास से इनका चलन संभव होता है। ‘आरबीआई’ के इस ऐलान से जनता का विश्वास टूटा है। अब बहुत से लोग एवं दुकानदार इसे लेने से मना कर सकते हैं। उनका तर्क वाजिब है कि ‘कोई दूसरा इसे स्वीकार नहीं करेगा’ या ‘बैंक के चक्कर लगाने होंगे’ या ‘खुले पैसे नहीं हैं।’  

यह कहाँ तक तर्कसंगत है कि ‘आरबीआई’ के ऐलान के अनुसार 30 सितंबर 2023 के बाद इसे जनता आपस में स्वीकार करे, परंतु बैंक शायद इसे स्वीकार नहीं करेंगे। जनता को विश्वास कैसे हो सकता है कि 30 सितंबर के बाद इस नोट पर कानूनी प्रावधान बना रहेगा। ‘आरबीआई’ को यह मालूम है, पर वह अपने ऐलान के जाल में फंसती जा रहा है।

अर्थशास्त्री कई वर्षो से यह समझा रहे हैं कि ‘काला धन’ नगद में बहुत कम होता है। इसका मुख्य स्वरूप प्रापर्टी, सोना, चांदी, बेनामी बैंक खाता, बेनामी कंपनी में रहता है। और-तो-और ‘काले धन’ का संबंध नोट से नहीं, अघोषित आय से होता है।

‘आरबीआई’ के काम का संबंध अघोषित आय से नहीं है, यह काम आयकर विभाग का है। ‘आरबीआई’ को ‘काले धन’ की खोज में उलझाकर उसकी साख को कम किया जा रहा है। अधिकांश नोट वापिस हो जाएँगे और ‘आरबीआई’ धूल में लठ चलाने वाली संस्था दिखेगी। (सप्रेस)

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